बिना सबूत पति पर नपुंसकता का आरोप मानसिक क्रूरता,हाईकोर्ट ने रद्द किया फैमिली कोर्ट का फैसला

Harrison Masih | Jul 17, 2025, 12:46 IST
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High Court cancels family court decision divorce case the sootr
High Court cancels family court decision divorce case the sootr

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने पत्नी द्वारा बिना मेडिकल सबूत के नपुंसकता का आरोप लगाने को मानसिक क्रूरता मानते हुए पति को तलाक की अनुमति दी। हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया।

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एक तलाक के मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है, जो वैवाहिक जीवन में मानसिक क्रूरता की परिभाषा को स्पष्ट करता है। अदालत ने माना कि यदि कोई पत्नी अपने पति पर बिना किसी चिकित्सकीय प्रमाण के नपुंसकता जैसे गंभीर आरोप लगाती है, तो यह "मानसिक क्रूरता" की श्रेणी में आता है और वैध तलाक का आधार बन सकता है।

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मामला क्या था?

यह केस जांजगीर-चांपा जिले के एक शिक्षाकर्मी से जुड़ा है, जिसकी शादी 2 जून 2013 को बलरामपुर जिले की एक महिला से हुई थी। पति बैकुंठपुर के चरचा कॉलरी में कार्यरत था और पत्नी एक आंगनबाड़ी कार्यकर्ता है। शादी के कुछ समय बाद ही पत्नी ने पति से या तो नौकरी छोड़ने या ट्रांसफर करवाने का दबाव डालना शुरू कर दिया।

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रिश्तों में दरार 2017 से ही दोनों के बीच रिश्ते पूरी तरह बिगड़ गए और वे अलग-अलग रहने लगे। वर्ष 2022 में पति ने फैमिली कोर्ट में तलाक की अर्जी दी। पत्नी ने जवाब में पति पर यौन अक्षमता का आरोप लगाया लेकिन यह भी स्वीकार किया कि उसके पास कोई मेडिकल सबूत नहीं है।


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हाई कोर्ट की सुनवाई और फैसला

पति ने यह भी कहा कि पत्नी ने उस पर पड़ोस की महिला से अवैध संबंध रखने का झूठा इल्जाम लगाया, जिससे उसकी सामाजिक छवि खराब हुई।

रिश्तों को सुधारने के प्रयास के दौरान सामाजिक बैठक में भी पत्नी ने झगड़ा किया और अपने जीजा से बदसलूकी की। हाई कोर्ट ने माना कि यह सारे व्यवहार मानसिक रूप से पति को कष्ट पहुंचाने वाले हैं और इसे मानसिक क्रूरता माना जाएगा।

अंततः हाई कोर्ट ने कहा कि "बिना प्रमाण गंभीर आरोप लगाने से न केवल व्यक्ति की प्रतिष्ठा धूमिल होती है, बल्कि यह मानसिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित करता है। ऐसे विवाह को बनाए रखना कानून के अनुरूप नहीं होगा।"

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हाईकोर्ट फैसले की 5 प्रमुख बातें:

गंभीर आरोप बिना सबूत मानसिक क्रूरता:
पत्नी ने पति पर नपुंसकता का आरोप लगाया, लेकिन मेडिकल प्रमाण नहीं दे सकी। कोर्ट ने इसे मानसिक अत्याचार माना।

पति की सामाजिक छवि पर आघात:
पति ने बताया कि पत्नी ने उस पर पड़ोस की महिला से अवैध संबंधों का झूठा आरोप लगाया, जिससे उसकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा।

संबंधों में लगातार तनाव:
शादी के कुछ साल बाद से ही रिश्तों में तनाव था। 2017 से दोनों अलग-अलग रह रहे थे।

सुलह की कोशिशें हुईं नाकाम:
सामाजिक बैठक में रिश्ते सुधारने की कोशिश की गई, लेकिन पत्नी ने वहां भी झगड़ा किया और अपने ही रिश्तेदार से बदसलूकी की।

हाई कोर्ट ने तलाक को बताया न्यायोचित:
हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले को रद्द कर पति को तलाक की अनुमति दी, कहा कि ऐसे आरोप रिश्ते को असहनीय बना देते हैं।



नतीजा

फैमिली कोर्ट द्वारा तलाक याचिका खारिज करने के फैसले को हाई कोर्ट ने रद्द कर दिया और पति को तलाक देने की अनुमति दे दी।

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