झीरम कांड के आरोपियों के नाम
झीरम केस के फैसले पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में सुनवाई, आरोपियों के खिलाफ सबूतों की होगी समीक्षा
Harrison Masih | Sept 25, 2026, 15:09 IST
झीरम केस के फैसले पर हाईकोर्ट में सुनवाई
झीरम घाटी नक्सली हमले के मामले में 10 दोषियों को दी गई मौत की सजा का मामला अब छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में समीक्षा के लिए पहुंच गया है। उच्च न्यायालय की डिवीजन बेंच इस मामले में ट्रायल कोर्ट के निर्णय और सबूतों का पुनरावलोकन करेगी। यदि दोषियों की ओर से अपील की जाती है, तो सुनवाई की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।
छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित झीरम घाटी नक्सली हमले मामले में 10 दोषियों को सुनाई गई मौत की सजा अब हाईकोर्ट की न्यायिक समीक्षा के दायरे में आ गई है। जगदलपुर की NIA स्पेशल कोर्ट ने फांसी की सजा की पुष्टि के लिए पूरा मामला छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट भेज दिया है। हाईकोर्ट में इसे क्रिमिनल रेफरेंस यानी डेथ रेफरेंस के रूप में दर्ज किया गया है।
अब हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ट्रायल कोर्ट के फैसले, मामले में पेश किए गए सबूत, गवाहों के बयान और दोषसिद्धि के आधार की समीक्षा करेगी। हाईकोर्ट की पुष्टि के बिना ट्रायल कोर्ट की ओर से सुनाई गई मौत की सजा लागू नहीं की जा सकती।
25 मई 2013 को बस्तर की झीरम घाटी में कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा के काफिले पर बड़ा नक्सली हमला हुआ था। इस हमले में कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं समेत 29 लोगों की मौत हुई थी।
करीब 13 साल तक चली सुनवाई के बाद जगदलपुर की NIA स्पेशल कोर्ट ने 5 सितंबर 2026 को मामले में सुनवाई का सामना कर रहे सभी 10 आरोपियों को दोषी करार दिया था। इसके बाद 16 सितंबर 2026 को अदालत ने सभी 10 दोषियों को मौत की सजा सुनाई।
अब इस फैसले पर अंतिम न्यायिक मुहर लगाने की प्रक्रिया हाईकोर्ट में शुरू हो गई है।
कानून के मुताबिक ट्रायल कोर्ट या सेशन कोर्ट द्वारा मौत की सजा सुनाए जाने के बाद मामले को हाईकोर्ट भेजना जरूरी होता है। पुराने CrPC की धारा 366 के तहत मौत की सजा तब तक लागू नहीं की जा सकती, जब तक हाईकोर्ट उसकी पुष्टि न कर दे।
वर्तमान BNSS की धारा 407 में भी इसी तरह का प्रावधान है। इसलिए NIA स्पेशल कोर्ट के फैसले के बाद झीरम मामले का अगला महत्वपूर्ण पड़ाव अब छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट है।
डेथ रेफरेंस पर सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट के सामने ट्रायल कोर्ट का पूरा रिकॉर्ड रखा जाएगा। इसमें शामिल होंगे:
अभियोजन पक्ष की ओर से पेश किए गए सबूत
मौत की सजा वाले मामलों में हाईकोर्ट के पास केवल सजा की पुष्टि करने का विकल्प नहीं होता। पुराने CrPC के तहत हाईकोर्ट सजा में बदलाव कर सकता है, दोषसिद्धि को बदल या खत्म कर सकता है, नए सिरे से ट्रायल का आदेश दे सकता है या आरोपी को बरी भी कर सकता है।
यानी झीरम मामले में NIA स्पेशल कोर्ट का फैसला हाईकोर्ट की समीक्षा के अधीन है।
झीरम मामले में NIA स्पेशल कोर्ट ने पहले 5 सितंबर को आरोपियों को दोषी ठहराया और उसके बाद 16 सितंबर को सजा के बिंदु पर सुनवाई करते हुए सभी 10 दोषियों को मौत की सजा सुनाई।
रिपोर्टों के मुताबिक ट्रायल के दौरान 101 गवाहों के बयान दर्ज किए गए। मामले में शुरुआत में 11 आरोपियों के खिलाफ सुनवाई शुरू हुई थी, लेकिन ट्रायल के दौरान एक आरोपी की मौत हो गई।
NIA स्पेशल कोर्ट ने 10 दोषियों को मौत की सजा सुनाई है-
डेथ रेफरेंस की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ट्रायल कोर्ट के फैसले और पूरे रिकॉर्ड की समीक्षा करेगा। दोषियों की ओर से अलग से अपील भी दायर की जा सकती है।
फिलहाल NIA स्पेशल कोर्ट द्वारा सुनाई गई मौत की सजा को अंतिम नहीं माना जा सकता। हाईकोर्ट की पुष्टि के बाद ही फांसी की सजा प्रभावी हो सकती है।
इस तरह 13 साल पुराने झीरम घाटी मामले में अब न्यायिक प्रक्रिया का अगला और अहम चरण छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में शुरू हो गया है।
अब हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ट्रायल कोर्ट के फैसले, मामले में पेश किए गए सबूत, गवाहों के बयान और दोषसिद्धि के आधार की समीक्षा करेगी। हाईकोर्ट की पुष्टि के बिना ट्रायल कोर्ट की ओर से सुनाई गई मौत की सजा लागू नहीं की जा सकती।
13 साल पुराने मामले में अब हाईकोर्ट की बारी
करीब 13 साल तक चली सुनवाई के बाद जगदलपुर की NIA स्पेशल कोर्ट ने 5 सितंबर 2026 को मामले में सुनवाई का सामना कर रहे सभी 10 आरोपियों को दोषी करार दिया था। इसके बाद 16 सितंबर 2026 को अदालत ने सभी 10 दोषियों को मौत की सजा सुनाई।
अब इस फैसले पर अंतिम न्यायिक मुहर लगाने की प्रक्रिया हाईकोर्ट में शुरू हो गई है।
क्यों हाईकोर्ट भेजा जाता है मौत की सजा का मामला?
वर्तमान BNSS की धारा 407 में भी इसी तरह का प्रावधान है। इसलिए NIA स्पेशल कोर्ट के फैसले के बाद झीरम मामले का अगला महत्वपूर्ण पड़ाव अब छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट है।
हाईकोर्ट में किन बिंदुओं पर होगी सुनवाई?
अभियोजन पक्ष की ओर से पेश किए गए सबूत
- गवाहों के बयान
- दस्तावेज और अन्य साक्ष्य
- आरोपियों के खिलाफ दोषसिद्धि के आधार
- मौत की सजा देने के लिए ट्रायल कोर्ट द्वारा बताए गए कारण
हाईकोर्ट के पास क्या-क्या विकल्प हैं?
यानी झीरम मामले में NIA स्पेशल कोर्ट का फैसला हाईकोर्ट की समीक्षा के अधीन है।
पहले दोषसिद्धि, फिर सुनाई गई मौत की सजा
रिपोर्टों के मुताबिक ट्रायल के दौरान 101 गवाहों के बयान दर्ज किए गए। मामले में शुरुआत में 11 आरोपियों के खिलाफ सुनवाई शुरू हुई थी, लेकिन ट्रायल के दौरान एक आरोपी की मौत हो गई।
इन 10 दोषियों को सुनाई गई है मौत की सजा
अब आगे क्या होगा?
फिलहाल NIA स्पेशल कोर्ट द्वारा सुनाई गई मौत की सजा को अंतिम नहीं माना जा सकता। हाईकोर्ट की पुष्टि के बाद ही फांसी की सजा प्रभावी हो सकती है।
इस तरह 13 साल पुराने झीरम घाटी मामले में अब न्यायिक प्रक्रिया का अगला और अहम चरण छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में शुरू हो गया है।
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