कोंडागांव की बेटी हेमबती का वर्ल्ड स्कूल जूडो गेम्स के लिए चयन, ब्राजील में भारतीय टीम का करेंगी नेतृत्व
Umeshwari Baghel | Oct 04, 2026, 14:19 IST
कोंडागांव से ब्राजील पहुंची 17 साल की हेमबती
छत्तीसगढ़ के कोंडागांव जिले की 17 साल की हेमबती नाग अब ब्राजील में भारत के लिए जूडो खेलेंगी। बड़ेकनेरा गांव की रहने वाली हेमबती का चयन वर्ल्ड स्कूल जूडो गेम्स के लिए हुआ है। दिसंबर में होने वाली इस प्रतियोगिता में वह पहली बार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उतरेंगी। हेमबती की यह उपलब्धि इसलिए भी खास है क्योंकि उनका सफर आसान नहीं रहा।
10 साल की उम्र में उनके माता-पिता का निधन हो गया था। इसके बाद उन्हें बालिका गृह में रहना पड़ा। यहीं से उनकी जिंदगी में जूडो की एंट्री हुई। कुछ साल पहले तक जिस लड़की के सामने आगे की जिंदगी को लेकर कई मुश्किलें थीं, वही आज भारत की जर्सी पहनने की तैयारी कर रही है।
माता-पिता को खोने के बाद हेमबती बालिका गृह पहुंचीं। वहीं उन्हें जूडो सीखने का मौका मिला। शुरुआत सामान्य ट्रेनिंग से हुई थी, लेकिन धीरे-धीरे उनकी दिलचस्पी बढ़ती गई।
उन्होंने अभ्यास जारी रखा और स्थानीय प्रतियोगिताओं में उतरना शुरू किया। यहां अच्छे प्रदर्शन के बाद उन्हें राज्य स्तर पर मौका मिला। फिर राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं तक उनका सफर पहुंचा।
सात साल में हेमबती ने अपने खेल में लगातार सुधार किया। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने ट्रेनिंग नहीं छोड़ी। जूडो उनके लिए केवल खेल नहीं रहा, बल्कि आगे बढ़ने का रास्ता बन गया।
हेमबती 40 किलो वजन वर्ग में खेलती हैं। वर्ष 2022 से 2026 के बीच उन्होंने लगातार छत्तीसगढ़ की तरफ से जूडो प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया। इस दौरान उन्होंने कई पदक भी जीते।
उनका प्रदर्शन लगातार बेहतर होता गया। इसी वजह से उन्हें बड़े स्तर के मुकाबलों में भी मौके मिले। अब इसी सफर की सबसे बड़ी उपलब्धि वर्ल्ड स्कूल जूडो गेम्स में चयन के रूप में सामने आई है।
वर्ल्ड स्कूल जूडो गेम्स के लिए चयन ट्रायल भोपाल में हुआ था। यह ट्रायल भारतीय खेल प्राधिकरण के सेंटर ऑफ एक्सीलेंस में आयोजित किया गया। हेमबती के कोच घनश्याम ठाकुर वहां मौजूद थे।
ट्रायल के नियमों के कारण वह मुकाबले के दौरान सीधे निर्देश नहीं दे सकते थे। ऐसी स्थिति में साई सेंटर के कोच शैलेंद्र यादव ने हेमबती का मार्गदर्शन किया। हेमबती ने दबाव के बीच भी अपना खेल नहीं बिगड़ने दिया। उन्होंने मुकाबले में स्वर्ण पदक जीता। इसी जीत के साथ उनका ब्राजील जाने का रास्ता साफ हो गया।
हेमबती की ट्रेनिंग में सिर्फ ताकत पर जोर नहीं रहा। उन्होंने अपनी गलतियों से भी काफी सीखा है। एक घरेलू मुकाबले में हार मिलने के बाद उन्होंने अपनी रणनीति बदली। अगली प्रतियोगिता में वह नए तरीके से उतरीं और बेहतर प्रदर्शन किया। इस बदलाव का फायदा उन्हें आगे के मुकाबलों में मिला।
जूडो में सामने वाले खिलाड़ी की चाल समझना जरूरी होता है। सही समय पर तकनीक लगाना भी उतना ही अहम है। हेमबती ने लगातार अभ्यास के जरिए इन चीजों पर काम किया।
छत्तीसगढ़ के पूर्व राष्ट्रीय खिलाड़ी और जूडो एसोसिएशन के सचिव अरुण द्विवेदी के मुताबिक हेमबती की सबसे बड़ी ताकत उनका आत्मविश्वास है। उनका कहना है कि बड़े मुकाबलों के दौरान भी हेमबती ज्यादा घबराती नहीं हैं।
वह पहले सामने वाले खिलाड़ी को समझती हैं। इसके बाद अपनी तकनीक का इस्तेमाल करती हैं। 40 किलो वर्ग में खेलने वाली हेमबती के लिए यह शांत रवैया कई मुकाबलों में फायदेमंद साबित हुआ है।
वर्ल्ड स्कूल प्रतियोगिता के चयन से पहले भी हेमबती ने कई अहम मुकाबले जीते। उन्होंने प्री-क्वार्टर फाइनल से लेकर सेमीफाइनल तक लगातार अच्छा प्रदर्शन किया।
इन मुकाबलों में तकनीक और धैर्य दोनों उनके काम आए। लगातार जीत के साथ उन्होंने चयन की अपनी दावेदारी मजबूत की। अब उनके सामने घरेलू नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी होंगे। यह उनके करियर का अब तक का सबसे बड़ा मुकाबला होगा।
दिसंबर में ब्राजील में होने वाले वर्ल्ड स्कूल जूडो गेम्स हेमबती के लिए पहला अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट होगा। बड़ेकनेरा जैसे नक्सल प्रभावित इलाके से निकलकर इस स्तर तक पहुंचना उनके लिए बड़ा बदलाव है।
10 साल की उम्र में माता-पिता को खोने के बाद बालिका गृह से शुरू हुई उनकी नई जिंदगी अब अंतरराष्ट्रीय खेल मंच तक पहुंच गई है। हेमबती अब ब्राजील में भारत की तरफ से उतरेंगी। उनका लक्ष्य अच्छा प्रदर्शन करना और आगे भी जूडो में देश के लिए खेलना है।
सात साल पहले शुरू हुई ट्रेनिंग ने उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी। अब दिसंबर का मुकाबला उनके लिए केवल एक टूर्नामेंट नहीं होगा। यह उस लंबे सफर का अगला पड़ाव होगा जो बालिका गृह की जूडो मैट से शुरू होकर ब्राजील तक पहुंचा है।
FAQ
बालिका गृह में पहली बार जूडो से जुड़ीं
उन्होंने अभ्यास जारी रखा और स्थानीय प्रतियोगिताओं में उतरना शुरू किया। यहां अच्छे प्रदर्शन के बाद उन्हें राज्य स्तर पर मौका मिला। फिर राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं तक उनका सफर पहुंचा।
सात साल में हेमबती ने अपने खेल में लगातार सुधार किया। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने ट्रेनिंग नहीं छोड़ी। जूडो उनके लिए केवल खेल नहीं रहा, बल्कि आगे बढ़ने का रास्ता बन गया।
2022 से लगातार छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधित्व
उनका प्रदर्शन लगातार बेहतर होता गया। इसी वजह से उन्हें बड़े स्तर के मुकाबलों में भी मौके मिले। अब इसी सफर की सबसे बड़ी उपलब्धि वर्ल्ड स्कूल जूडो गेम्स में चयन के रूप में सामने आई है।
भोपाल के ट्रायल में जीता स्वर्ण पदक
ट्रायल के नियमों के कारण वह मुकाबले के दौरान सीधे निर्देश नहीं दे सकते थे। ऐसी स्थिति में साई सेंटर के कोच शैलेंद्र यादव ने हेमबती का मार्गदर्शन किया। हेमबती ने दबाव के बीच भी अपना खेल नहीं बिगड़ने दिया। उन्होंने मुकाबले में स्वर्ण पदक जीता। इसी जीत के साथ उनका ब्राजील जाने का रास्ता साफ हो गया।
हार के बाद खेल में किया बदलाव
जूडो में सामने वाले खिलाड़ी की चाल समझना जरूरी होता है। सही समय पर तकनीक लगाना भी उतना ही अहम है। हेमबती ने लगातार अभ्यास के जरिए इन चीजों पर काम किया।
बड़े मुकाबलों में भी रहती हैं शांत
वह पहले सामने वाले खिलाड़ी को समझती हैं। इसके बाद अपनी तकनीक का इस्तेमाल करती हैं। 40 किलो वर्ग में खेलने वाली हेमबती के लिए यह शांत रवैया कई मुकाबलों में फायदेमंद साबित हुआ है।
प्री-क्वार्टर से सेमीफाइनल तक बनाई बढ़त
इन मुकाबलों में तकनीक और धैर्य दोनों उनके काम आए। लगातार जीत के साथ उन्होंने चयन की अपनी दावेदारी मजबूत की। अब उनके सामने घरेलू नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी होंगे। यह उनके करियर का अब तक का सबसे बड़ा मुकाबला होगा।
पहली बार देश के लिए अंतरराष्ट्रीय मैट पर उतरेंगी
10 साल की उम्र में माता-पिता को खोने के बाद बालिका गृह से शुरू हुई उनकी नई जिंदगी अब अंतरराष्ट्रीय खेल मंच तक पहुंच गई है। हेमबती अब ब्राजील में भारत की तरफ से उतरेंगी। उनका लक्ष्य अच्छा प्रदर्शन करना और आगे भी जूडो में देश के लिए खेलना है।
सात साल पहले शुरू हुई ट्रेनिंग ने उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी। अब दिसंबर का मुकाबला उनके लिए केवल एक टूर्नामेंट नहीं होगा। यह उस लंबे सफर का अगला पड़ाव होगा जो बालिका गृह की जूडो मैट से शुरू होकर ब्राजील तक पहुंचा है।
FAQ
- हेमबती का जूडो करियर कैसे शुरू हुआ?
हेमबती का जूडो करियर तब शुरू हुआ जब वह 10 साल की थीं और माता-पिता के निधन के बाद बालिका गृह में रहने लगीं। वहां उन्हें जूडो सीखने का अवसर मिला और उन्होंने धीरे-धीरे इस खेल में रुचि विकसित की। - हेमबती ने किस प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक जीता?
हेमबती ने वर्ल्ड स्कूल जूडो गेम्स के चयन ट्रायल में भोपाल में स्वर्ण पदक जीता, जिससे उनका ब्राजील जाने का रास्ता साफ हो गया। - हेमबती का अगला बड़ा मुकाबला कब है?
हेमबती का अगला बड़ा मुकाबला दिसंबर में होने वाले वर्ल्ड स्कूल जूडो गेम्स में है, जो उनके लिए पहला अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट होगा।
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