छत्तीसगढ़ की चिट्ठी : बुलडोजर से डस्टबिन तक, इस हफ्ते छत्तीसगढ़ में क्यों मचा बवाल

Rajesh Lahoti | Jul 05, 2026, 16:02 IST
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बुलडोज़र से लेकर कूड़ेदान तक - हंगामा
बुलडोज़र से लेकर कूड़ेदान तक - हंगामा

छत्तीसगढ़ में नकटी गांव में बुलडोजर कार्रवाई, रायपुर में डस्टबिन खरीदी विवाद, हसदेव जंगल की कटाई, कोरिया ट्रिपल मर्डर की सीबीआई जांच और मंत्रियों के फोन बिल जैसे प्रशासनिक विवादों ने सरकार को घेरा।

छत्तीसगढ़ में गुजरा सप्ताह विकास, प्रशासन और राजनीति के विवादों में रहा। नकटी गांव पर बुलडोजर कार्रवाई से लेकर रायपुर नगर निगम की डस्टबिन खरीदी, हसदेव के जंगल, कोरिया ट्रिपल मर्डर की सीबीआई जांच और मंत्रियों के टेलीफोन बिल तक कई मामलों ने सरकार को कठघरे में खड़ा किया। हाईकोर्ट ने ओबीसी आयोग की सीमाएं तय कीं तो सरकारी एसी के मेंटेनेंस खर्च ने भी सवाल खड़े कर दिए। इतने विवादों के बीचआखिर जवाबदेही किसकी तय होगी।

अतिक्रमण और राजनीति का बुलडोजर

नकटी गांव इन दिनों नक्शे से ज्यादा राजनीति में दिखाई दे रहा है। एक तरफ सरकार कह रही है कि विधायक निवास बनेंगे, इसलिए जमीन खाली करानी जरूरी थी। दूसरी तरफ लोगों की दुनिया बुलडोजर के आगे बिखर गई। कार्रवाई भी ऐसी कि 14 बुलडोजर, 4000 जवान, 250 कोटवार और सैकड़ों अधिकारी… मानो किसी सीमा पर सैन्य अभियान चल रहा हो। सवाल यह नहीं कि सरकारी जमीन खाली कराई जाए या नहीं। अतिक्रमण है ये सही है, लेकिन क्या बारिश का यह समय बुलडोजर चलाने के लिए सही था।

सबसे बड़ा विरोधाभास उन मकानों को लेकर है जिन्हें कभी सरकारी योजनाओं से पक्का कराया गया और अब वही सरकार उन्हें अवैध बताकर गिरा रही है। राजनीति ने भी मौका नहीं छोड़ा। विपक्ष को मुद्दा मिल गया और सत्ता को सफाई। गांव वालों को सिर्फ मलबा मिला। नकटी की कहानी यही बता रही है कि हमारे यहां विकास का मतलब अक्सर नक्शे पर नई कॉलोनी और जमीन पर नया विस्थापन होता है। अब देखना यह है कि विधायक निवास पहले बनता है या इस घटना का राजनीतिक स्मारक।

कूड़ा कम, कीमत ज्यादा…

स्वच्छता अभियान का मकसद शहर से कचरा हटाना है, लेकिन रायपुर नगर निगम की डस्टबिन खरीदी ने खुद कई सवालों का ढेर लगा दिया है। आरोप है कि जो डस्टबिन थोक बाजार में करीब डेढ़ सौ रुपए में मिल सकती थी, उसे 235 रुपए से ज्यादा में खरीदा गया। फर्क सुनने में छोटा लगता है, लेकिन जब खरीद 1.60 लाख डस्टबिन की हो तो यही अंतर करोड़ों की कहानी लिख देता है। विपक्ष इसे घोटाला बता रहा है, जबकि प्रशासन से जवाब मांगा जा रहा है कि आखिर ऐसी कौन-सी विशेष डस्टबिन थी, जिसकी कीमत बाजार से कहीं ज्यादा हो गई।

शहर की गंदगी रखने वाला डस्टबिन अब खुद राजनीतिक गंदगी का कंटेनर बन गया है। जनता पूछ रही है कि अगर खरीद थोक में हुई थी तो कीमत खुदरा से भी ज्यादा कैसे पहुंच गई? सरकारी खरीद में अक्सर कहा जाता है कि नियमों का पालन हुआ है, लेकिन जनता अब पूछ रही है कि नियमों का पालन हुआ या सिर्फ बिलों का भुगतान? आखिर स्वच्छता अभियान की असली शुरुआत डस्टबिन से होगी या खरीद प्रक्रिया की सफाई से?

पेड़ कटेंगे तो बिजली मिलेगी

हसदेव के जंगलों में पेड़ों से ज्यादा बयान गिर रहे हैं। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय कह रहे हैं कि पेड़ काटने की अनुमति पिछली सरकार ने दी थी, जबकि कांग्रेस का दावा है कि उसने जंगल बचाने के लिए विधानसभा में संकल्प पारित किया था। यानी जंगल वहीं खड़ा है, लेकिन जिम्मेदारी का पेड़ दोनों दल एक-दूसरे के आंगन में लगा रहे हैं। करोड़ों की खदान, लाखों पेड़ और बिजली की जरूरत। इन तीनों के बीच राजनीति ने चौथा कोण जोड़ दिया है।

मजेदार बात यह है कि सत्ता बदलते ही वही परियोजना पर्यावरण विरोधी या विकास समर्थक बन जाती है। जनता समझ नहीं पा रही कि असली पर्यावरण प्रेमी कौन है और असली खनन समर्थक कौन। जंगल के हाथी शायद इस बहस से ज्यादा उलझन में होंगे कि आखिर उन्हें बचाने का दावा करने वाले भी वही हैं और खदान की फाइल आगे बढ़ाने वाले भी। हसदेव अब सिर्फ जंगल नहीं, राजनीति का ऐसा आईना बन गया है जिसमें हर दल दूसरे का चेहरा देखता है और अपना नहीं।

रेत की रंजिश, सीबीआई की एंट्री

कोरिया का ट्रिपल मर्डर केस सिर्फ तीन हत्याओं का मामला नहीं रहा, बल्कि अवैध रेत कारोबार और सत्ता की संवेदनशील राजनीति का प्रतीक बन गया है। भाजपा नेता समेत तीन लोगों को जिंदा जलाने की घटना ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया था। अब राज्य सरकार ने मामले की जांच सीबीआई को सौंपने की सिफारिश कर दी है। मतलब अब कहानी स्थानीय थाने से निकलकर दिल्ली की फाइलों में पहुंचेगी।

रेत वैसे तो नदी से निकलती है, लेकिन उसके पीछे की राजनीति अक्सर राजधानी तक पहुंच जाती है। सवाल सिर्फ यह नहीं कि हत्या किसने की, बल्कि यह भी कि अवैध खनन का नेटवर्क कितना गहरा है। सीबीआई की एंट्री के बाद कई लोगों की धड़कनें बढ़ना तय है। हालांकि जनता को अनुभव यह भी है कि सीबीआई जांच का मतलब अक्सर लंबी कहानी होता है। फिर भी उम्मीद यही रहेगी कि इस बार रेत की परत हटे तो सिर्फ अपराधी नहीं, पूरा तंत्र भी दिखाई दे।

मंत्री का टेलीफोन, बिल पर संग्राम

मंत्रियों की टेबल पर रखे फोन बजते रहे, बिल भरते रहे, लेकिन किसी को यह पता नहीं था कि आखिर भुगतान किस नियम से हो रहा है। अब ट्रेजरी ने सवाल पूछ लिया तो पूरा प्रशासनिक तंत्र जवाब खोज रहा है। गृह विभाग कहता है हमारी जिम्मेदारी नहीं, सामान्य प्रशासन विभाग कहता है आदेश नहीं मिला। यानी वर्षों तक सरकारी फोन पर बातचीत होती रही और नियम शायद हमेशा होल्ड पर रहा।

सबसे दिलचस्प बात यह है कि मंत्री बंगलों के बिजली, पानी और रखरखाव का विभाग तय है, लेकिन फोन बिल का कोई आधिकारिक ठिकाना ही नहीं मिला। यह सरकारी व्यवस्था का ऐसा कॉल है जिसमें नेटवर्क पूरा था, लेकिन दस्तावेज गायब थे। अब मुख्यमंत्री सचिवालय में मंथन चल रहा है कि भविष्य का बिल कौन भरे और पुराने भुगतान का हिसाब कौन देगा। सरकारी फाइलों की यही खूबी है। जब तक कोई सवाल न पूछे, सब कुछ व्यवस्थित दिखता है।

ओबीसी आयोग को हाईकोर्ट की नसीहत

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक फैसले के जरिए सिर्फ एक आदेश नहीं पलटा, बल्कि आयोगों की संवैधानिक सीमा भी याद दिला दी। मामला हार्वेस्टर के सौदे से शुरू हुआ, लेकिन पहुंच गया इस सवाल तक कि आयोग आखिर कर क्या सकता है। आयोग ने पैसे की वसूली का निर्देश दे दिया, जबकि कोर्ट ने साफ कहा कि सलाह देना और न्याय सुनाना दो अलग-अलग काम हैं। हमारे यहां कई संस्थाएं धीरे-धीरे अपनी मूल भूमिका से आगे बढ़ने लगती हैं।

सलाहकार संस्था भी कभी-कभी खुद को अदालत समझ बैठती है। हाईकोर्ट ने यही कहा कि जांच करने की शक्ति मिलने का मतलब यह नहीं कि फैसला भी वही सुनाया जाए। यह फैसला सिर्फ पिछड़ा वर्ग आयोग के लिए नहीं, बल्कि उन सभी आयोगों के लिए संदेश है जो अपने अधिकार क्षेत्र को थोड़ा ज्यादा क्रिएटिव तरीके से समझने लगते हैं। आखिर कानून में भी लक्ष्मण रेखा होती है और उसे पार करने पर न्यायपालिका याद दिला ही देती है कि संविधान में हर संस्था की अपनी कुर्सी तय है।

एसी से महंगा उसका मेंटेनेंस

सरकारी खरीद में कभी-कभी ऐसे आंकड़े सामने आते हैं कि अच्छा खासा गणितज्ञ भी हैरान रह जाए। रायपुर के ट्राइबल रिसर्च इंस्टीट्यूट में एक एसी की कीमत करीब 78 हजार रुपए और उसका सालभर का मेंटेनेंस 81 हजार रुपए से ज्यादा बताया गया। यानी मशीन से ज्यादा उसकी सेवा की कीमत। अगर यही गणित घरों में लागू हो जाए तो लोग नया एसी खरीदने के बजाय हर साल नया घर खरीदने की सोच लें। विभाग का कहना है कि यह कॉम्प्रिहेंसिव एएमसी है, जिसमें सर्विस, गैस और स्पेयर पार्ट्स शामिल हैं, लेकिन तकनीकी जानकार भी इतनी बड़ी राशि को असामान्य बता रहे हैं।

पूरे अनुबंध की रकम करीब 25 लाख रुपए बताई जा रही है, इसलिए सवाल सिर्फ एक एसी का नहीं, पूरी प्रक्रिया का है। सरकारी खर्च में मितव्ययिता की बातें अक्सर भाषणों में सुनाई देती हैं, लेकिन फाइलों में कभी-कभी गणित अलग ही निकल आता है। अब सबकी निगाह इस पर है कि मामला सिर्फ ठंडी हवा का है या गर्म सवालों का भी। आखिर सरकारी एसी ठंडा रहेगा या इस अनुबंध की जांच में कई कुर्सियां गर्म होंगी?

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