समझें क्या है पूरा मामला
चिकित्सा शिक्षा विभाग ने 12 प्रोफेसरों का तबादला बदला है। इन डॉक्टरों को पहले नए मेडिकल कॉलेजों में भेजा गया था। इसका मकसद नए कॉलेजों को जल्द मान्यता दिलाना था। इस फैसले से पुराने कॉलेजों की पीजी सीटें खतरे में थीं। अब विभाग ने अपनी गलती सुधारी और नया आदेश जारी किया है।
विभाग का नया आदेश
रायपुर चिकित्सा शिक्षा विभाग ने एक अहम फैसला लिया है। यह फैसला मेडिकल कॉलेजों के प्रोफेसरों से जुड़ा है। विभाग ने 11 अगस्त को एक नया आदेश जारी किया। इसमें 12 प्रोफेसरों की पोस्टिंग में बड़ा बदलाव किया गया। यह बदलाव 25 जून को हुए प्रमोशन के बाद हुआ है।
क्यों बदला गया फैसला
जून में कई डॉक्टरों को दूरस्थ मेडिकल कॉलेजों में भेजा गया। इसका मुख्य कारण नए कॉलेजों में खाली पद भरना था। विभाग चाहता था कि नए कॉलेजों को जल्द मान्यता मिले। इस जल्दबाजी में एक बहुत बड़ी चूक हो गई। अफसरों ने तबादलों से पहले जरूरी परीक्षण ही नहीं किया।
पीजी सीटों पर संकट
सीनियर प्रोफेसरों को पुराने कॉलेजों से हटा दिया गया था। किसी ने नहीं देखा कि इसका पीजी (PG - Post Graduate) सीटों पर क्या असर पड़ेगा। कुल 45 डॉक्टरों को प्रमोशन देकर नए कॉलेजों में भेजा गया था। इसके बाद आला अफसरों ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई। तब जाकर विभाग ने इस पूरे मामले का परीक्षण कराया।
सामने आई चौंकाने वाली बात
जब मामले की जांच हुई तो चौंकाने वाली स्थिति दिखी। रायपुर और बिलासपुर के मेडिकल कॉलेजों पर बुरा असर पड़ा था। यहां फोरेंसिक और फिजियोलॉजी विभाग के प्रोफेसरों का तबादला हुआ था। इससे वहां की पीजी सीटें ही खत्म होने वाली थीं। यह पुराने और स्थापित मेडिकल कॉलेजों के लिए बड़ा झटका था।
रायपुर कॉलेज का हाल
रायपुर के फोरेंसिक मेडिसिन विभाग की हालत खराब हो गई थी। इस विभाग में केवल एक ही सीनियर प्रोफेसर कार्यरत हैं। उन्हीं के कारण कॉलेज को पीजी की तीन सीटें मिली हैं। अगर उनका तबादला हो जाता तो विभाग में कोई प्रोफेसर नहीं बचता। ऐसे में ये तीनों पीजी सीटें हमेशा के लिए खत्म हो जातीं।
![CG मेडिकल कॉलेज ट्रांसफर]()
CG मेडिकल कॉलेज ट्रांसफर
बिलासपुर की स्थिति
बिलासपुर मेडिकल कॉलेज में भी कुछ ऐसा ही हाल था। वहां फिजियोलॉजी विभाग के प्रोफेसर का तबादला कर दिया गया था। उनके जाने से वहां भी एक भी प्रोफेसर नहीं बचता। इस कारण बिलासपुर में भी पीजी सीटें लैप्स हो जातीं। यानी नए कॉलेजों के चक्कर में पुराने कॉलेजों का भारी नुकसान हो रहा था।
विभाग को सुधारनी पड़ी गलती
पीजी सीटों पर संकट देखकर विभाग तुरंत हरकत में आया। परीक्षण के बाद उन्हें अपनी बड़ी गलती का अहसास हुआ। इसके बाद चिकित्सा शिक्षा विभाग ने अपना फैसला वापस लिया। उन्होंने अपने ही पुराने आदेश में जरूरी संशोधन कर दिया। अब कई डॉक्टरों को पुराने कॉलेजों में ही वापस जगह मिली है।
किनकी बदली गई पोस्टिंग
संशोधित आदेश में कुल 12 डॉक्टरों के नाम शामिल किए गए हैं। डॉ. स्निग्धा जैन बंसल को रायपुर में ही रखा गया है। डॉ. मनीष पाटिल और डॉ. नितिन वले को दुर्ग भेजा गया है। डॉ. शशिकला कोसम को कबीरधाम जिले में पदस्थ किया गया है। डॉ. राजीव रतन जैन को रायपुर कैंसर संस्थान मिला है।
इनको भी मिली नई जगह
डॉ. नरेन्द्र नरसिंह को महासमुंद जिले में पोस्टिंग मिली है। डॉ. विशाल कलकर्णी को कांकेर के मेडिकल कॉलेज भेजा गया है। डॉ. केशव कश्यप को बिलासपुर मेडिकल कॉलेज में पदस्थ किया गया है। डॉ. चंद्रपाल भगत और डॉ. अजय हलवाई को दुर्ग भेजा गया है।
दुर्ग और महासमुंद में पदस्थापना
दुर्ग मेडिकल कॉलेज में सबसे ज्यादा डॉक्टरों को भेजा गया है। डॉ. विवेक शर्मा को भी दुर्ग में ही पदस्थ किया गया है। डॉ. राजेन्द्र रात्रे को महासमुंद जिले में नई जिम्मेदारी मिली है। इस तरह कुल 12 डॉक्टरों की पोस्टिंग में बड़ा बदलाव हुआ है। इससे पुराने कॉलेजों की पीजी सीटें भी अब पूरी तरह सुरक्षित हो गई हैं।
मान्यता के कड़े नियम
मेडिकल कॉलेजों को चलाने के लिए कड़े नियम होते हैं। पीजी सीटों के लिए अनुभवी प्रोफेसरों का होना बहुत जरूरी है। अगर पर्याप्त शिक्षक नहीं होते हैं तो सीधे मान्यता रद्द हो जाती है। इसीलिए पुराने कॉलेजों में सीनियर शिक्षकों का रहना काफी आवश्यक है।
कॉलेजों में संतुलन
नए मेडिकल कॉलेजों को भी अच्छे शिक्षकों की जरूरत होती है। लेकिन यह पुराने कॉलेजों की कीमत पर कभी नहीं होना चाहिए। विभाग को अब तबादले से पहले हर छोटे पहलू को देखना होगा। इससे भविष्य में ऐसी किसी भी परेशानी से आसानी से बचा जा सकेगा। छात्रों की अच्छी पढ़ाई के लिए यह बहुत जरूरी है।
जल्दबाजी का फैसला
प्रमोशन के बाद खाली पदों को भरना एक सामान्य प्रक्रिया है। लेकिन विभाग ने जमीनी हकीकत को पूरी तरह से नजरअंदाज किया। सीनियर प्रोफेसरों को हटाने से पूरा शिक्षण सिस्टम बिगड़ने वाला था। विभाग के आला अफसरों की समय पर नजर पड़ने से बचाव हुआ। अन्यथा मेडिकल छात्रों को इसका बहुत बड़ा नुकसान उठाना पड़ता।
छात्रों पर था बड़ा खतरा
अगर पीजी सीटें खत्म हो जातीं तो छात्रों का भारी नुकसान होता। मेडिकल की पढ़ाई करने वाले छात्रों के अवसर अचानक कम हो जाते। राज्य में विशेषज्ञ डॉक्टरों की भारी कमी हो सकती थी। इसलिए इस फैसले को सुधारना राज्य के स्वास्थ्य सिस्टम के लिए जरूरी था। सही समय पर लिए गए फैसले ने बड़े संकट को टाल दिया।
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