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NEWS IN SHORT :
-19 विभागों के जरिए 100 योजनाओं की मॉनिटरिंग फेल
-टोकन लेने में नेटवर्क बना रोड़ा, नहीं बिक रहा समय पर धान
-ऑनलॉइन अटेंडेस का दबाव, शिक्षक पेड़ पर चढ़ने को मजबूर
-रिपोर्ट सबमिट पर सरकार और कर्मचारियों में बढ़ रही रार
NEWS IN DETAIL :
ज़मीनी सिग्नल गायब
छत्तीसगढ़ में डिजिटल इंडिया, ई-गवर्नेंस और ऑनलाइन सेवाओं के दावों के बीच राज्य का बड़ा भू-भाग आज भी कमजोर नेटवर्क और कॉल ड्रॉप की समस्या से जूझ रहा है। बस्तर संभाग के बीजापुर, सुकमा, कांकेर, नारायणपुर और सरगुजा संभाग के कोरिया और जशपुर जैसे जिलों के कई गांव ऐसे हैं, जहां मोबाइल फोन केवल नाम के लिए हैं। कहीं कॉल के लिए पेड़ों पर चढ़ना पड़ता है तो कहीं पहाड़ी पर।
नेटवर्क को सुधारने के लिए छत्तीसगढ़ सरकार ने 5,000 नए मोबाइल टावरों की केंद्र से मांग की थी। लेकिन, 513 की ही स्वीकृति मिली, वह भी 4 जी नेटवर्क आधारित। मजबूत नेटवर्क नहीं होने से सरकार सिर्फ मैदानी क्षेत्र के कर्मचारियेां से ही ऑनलाइन अटेंडेंस और रिपोर्ट सबमिट का कह रही है। कई बार यहां भी नेटवर्क नहीं होने से दोनों के बीच विवाद की स्थिति बन जाती है। हालांकि, कुछ लोग कमजोर नेटवर्क का फायदा उठा करोड़ों की गड़बड़ियां कर रहे हैं। इसका उदाहरण बस्तर, सरगुजा, कर्वधा क्षेत्रों में गायब धान से लगाया जा सकता है।
19 विभाग-100 योजनाओं का संचालन
छत्तीसगढ़ सरकार 19 विभागों के जरिए लगभग 100 योजनाओं का संचालन करती है। इनकी मॉनिटरिंग के लिए अटल मॉनिटरिंग पोर्टल डैशबोर्ड बनवाया गया है। लेकिन, राज्य के बस्तर, सरगुजा, जशपुर, कोरिया, कांकेर, सुकमा, बीजापुर, नारायणपुर जैसे जिलों में आज भी सैकड़ों गांव ऐसे हैं, जहां मोबाइल नेटवर्क बेहद कमजोर या पूरी तरह नदारद हैं। ऐसे में वहां के डाटा पोर्टल पर आॅनलाइन अपलोड ही नहीं हो पाते।
किसान लाइन में, नेटवर्क गायब
वर्तमान में सरकारी धान खरीदी व्यवस्था पूरी तरह ऑनलाइन टोकन सिस्टम पर आधारित है। किसानों को टोकन मिलने के बाद ही समर्थन मूल्य पर धान बेचने का मौका मिलता है। नेटवर्क की समस्या के कारण कई गांवों में किसान समय पर टोकन डाउनलोड या अपडेट नहीं कर पा रहे हैं। नतीजा यह है कि किसान घंटों सहकारी समितियों के चक्कर लगाते रहते हैं। कभी सर्वर डाउन तो कभी नेटवर्क फेल होने की बात कहकर उन्हें वापस भेज दिया जाता है। किसानों की समस्या है कि नेटवर्क न होने से उनका टोकन समय पर अपडेट नहीं होता, जिससे खरीदी की तारीख निकल जाती है और उन्हें दोबारा प्रक्रिया शुरू करनी पड़ती है।
सरकारी कर्मचारियों की अटेंडेंस सिरदर्द
राज्य सरकार ने पारदर्शिता और अनुशासन के नाम पर सरकारी कर्मचारियों की उपस्थिति ऑनलाइन अटेंडेंस सिस्टम से जोड़ दी है। स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र, पंचायत कार्यालय और अन्य विभागों में कर्मचारियों को मोबाइल ऐप के जरिए हाजिरी लगानी होती है। लेकिन नेटवर्क नहीं होने से कई कर्मचारी समय पर अटेंडेंस दर्ज नहीं कर पाते। कुछ कर्मचारी इसका फायदा उठाकर लापरवाही करते है। छत्तीसगढ़ कर्मचारी अधिकारी फेडरेशन के संयोजक कमल वर्मा बता रहे हैं कि कई बार स्थिति अमानवीय बन जाती है। अटेंडेस लगाने शिक्षकों को कई बार पेड़ों पर चढ़ना पड़ता है।
आंगनबाड़ी कर्मी सबसे ज्यादा प्रभावित
मोबाइल नेटवर्क संकट का सबसे बड़ा असर आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं पर पड़ रहा है। पोषण ट्रैकर, बच्चों और गर्भवती महिलाओं का डेटा, टीकाकरण और उपस्थिति ऑनलाइन एंट्री के माध्यम से दर्ज की जाती है। लेकिन नेटवर्क नहीं होने से यह एंट्री समय पर नहीं हो पाती। आंगनबाड़ी संघ की प्रदेश अध्यक्ष पद्मावति साहू का कहना है कि समय पर एंट्री न होने पर उन्हें नोटिस, वेतन कटौती और काम में लापरवाही के आरोप झेलने पड़ते हैं। इससे मानसिक दबाव भी बढ़ रहा है।
योजनाएं डिजिटल, हकीकत अलग
नेटवर्क की कमी से आम जनता भी बुरी तरह प्रभावित है। पेंशन सत्यापन, राशन कार्ड से जुड़े काम, आधार अपडेट, बैंकिंग सेवाएं और ऑनलाइन भुगतान सब कुछ नेटवर्क पर निर्भर है। ग्रामीण इलाकों में लोग कई किलोमीटर दूर जाकर नेटवर्क वाले स्थान पर पहुंचते हैं, तब कहीं जाकर उनका काम होता है। फोन नहीं लगने के कारण उन्हें एंबुलेंस भी नहीं मिल पाती। ऐसे में बीमार को मोटरसाइकिल पर अस्पताल लाना पड़ता है।
जनप्रतिनिधियों का दबाव भी फेल
भरतपुर-सोनहत विधानसभा क्षेत्र ऐसा विधानसभा है, जिसके 337 गांव दो जिलों में हैं। यहां 47 गांवों में अभी भी मोबाइल नेटवर्क नहीं है। इसी तरह कांकेर जिले के दबेना गांव की आबादी हजार से अधिक है, लेकिन वहां नेटवर्क नहीं है, लोगों को एंबुलेंस या अन्य जरूरी सेवाओं के लिए कस्बों का सहारा लेना पड़ता है।
भरतपुर सोनहत विधायक रेणुका सिंह का कहना है कि इन गांवों में जाने से पता चलता है कि समस्या कितनी गंभीर है। दूसरी ओर, मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय कहते हैं कि प्रदेश में जनहितैषी योजनाओं का संचालन हो रहा है, अभी 513 टॉवर की स्वीकृति मिली है। चरणबद्ध तरीके से अन्य की स्वीकृति भी मिल जाएगी।
निष्कर्ष
छत्तीसगढ़ में मोबाइल नेटवर्क की समस्या अब प्रशासनिक सिरदर्द बन चुकी है। नेटवर्क नहीं होने से न सिर्फ जनता परेशान है, बल्कि सरकार की प्रमुख योजनाएं भी प्रभावित हो रही हैं। जब तक नेटवर्क को मूलभूत सुविधा मानकर ठोस और समयबद्ध कदम नहीं उठाए जाते, तब तक धान खरीदी से लेकर आंगनबाड़ी और सरकारी दफ्तरों तक, हर सिस्टम “नो नेटवर्क” की वजह से जूझता रहेगा।
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