समझें क्या है पूरा मामला
- मंत्रालय में अधिकारी-कर्मचारी परेशान
- मल्टीलेवल पार्किंग बनकर तैयार, फिर भी बंद
- NRDA काम अधूरा बता रहा, हैंडओवर नहीं
- सरकारी भवनों के नक्शे पर उठ रहे सवाल
छत्तीसगढ़ का सबसे ताकतवर भवन... यहीं मुख्यमंत्री बैठते हैं... मंत्री बैठते हैं... मुख्य सचिव से लेकर सचिव स्तर के अधिकारी बैठते हैं। रोज हजारों अधिकारी-कर्मचारी और विजिटर पहुंचते हैं। लेकिन हैरानी यह है कि पूरे मंत्रालय परिसर में आज भी व्यवस्थित पार्किंग नहीं है। करोड़ों रुपए खर्च कर मल्टीलेवल पार्किंग बनाई गई है, लेकिन बंद होने के कारण वह भी कबाड़ होती जा रही है। एनआरडीए का कहना है कि अभी काम बाकी है।
पार्किंग की जरूरत समझी गई थी
ऐसा नहीं है कि शासन ने समस्या को पहचाना नहीं था। करीब तीन साल पहले मंत्रालय के लिए मल्टीलेवल पार्किंग बनाने की स्वीकृति दी गई। परियोजना की लागत लगभग 5 करोड़ रुपए रखी गई। निर्माण की जिम्मेदारी एनआरडीए को सौंपी गई। करीब दो साल में काम भी पूरा हो गया। लेकिन NRDA (Naya Raipur Development Authority) अब तक हैंडओवर नहीं कर रहा है। चारों तरफ टीन शेड लगाकर रास्ता बंद कर दिया गया है और कार्यालय में ताला लगा हुआ है।
मंत्रालय के बाहर धूप में खड़ी है व्यवस्था
मंत्रालय परिसर में रोज सैकड़ों वाहन पहुंचते हैं। अधिकांश गाड़ियां खुले मैदान में खड़ी रहती हैं। इनमें मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव, मंत्री और सचिवों की गाड़ियां भी शामिल हैं। तेज धूप में वाहन तपते हैं। कई लोगों का कहना है कि गाड़ियों का रंग तक उड़ रहा है। बारिश के दिनों में स्थिति और खराब हो जाती है। लेकिन इस समस्या का स्थायी समाधान अब तक नहीं निकल पाया है।
मंत्रालय लगातार लिख रहा पत्र
मामले में मंत्रालय ने कई बार एनआरडीए को पत्र लिखा है। पार्किंग को जल्द हैंडओवर करने का आग्रह किया गया है। अधिकारियों का तर्क है कि गाड़ियों को सुरक्षित रखने के लिए छायादार व्यवस्था जरूरी है। मंत्रालय के दोनों प्रवेश द्वारों तक वाहन खड़े हो जाते हैं। इससे सुरक्षा और व्यवस्था दोनों प्रभावित होती हैं।
पार्किंग बनी, लेकिन उपयोग शुरू नहीं हुआ
सबसे बड़ा सवाल यही है। जब पार्किंग तैयार हो चुकी है तो उसका उपयोग क्यों नहीं हो रहा? मंत्रालय का दावा है कि पार्किंग को तत्काल हैंडओवर किया जाना चाहिए। लेकिन एनआरडीए अब तक इसे सौंपने को तैयार नहीं है। नतीजा यह है कि करोड़ों रुपए की सरकारी संपत्ति बेकार खड़ी हुई है।
विजिटर्स को भी नुकसान
मंत्रालय (CG Ministry) आने वाले लोगों की परेशानी अलग है। पार्किंग के अभाव में वे उपलब्ध जगहों पर वाहन खड़े करते हैं। व्यवस्था नहीं होने के कारण कई लोग सड़क किनारे गाड़ियां पार्क कर देते हैं। ऐसे में मंत्रालय की सुरक्षा व्यवस्था वाहन की तस्वीर लेकर यातायात विभाग को भेज देती है और उनका ई-चालान तक कट जाता है। सवाल यह है कि जब पार्किंग का ढांचा मौजूद है तो नागरिकों को इसकी कीमत क्यों चुकानी पड़ रही है?
एनआरडीए का अपना तर्क
मामले में एनआरडीए का अपना पक्ष है। एनआरडीए के सीईओ चंदन कुमार का कहना है कि परियोजना अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। मल्टीलेवल पार्किंग के ऊपर अतिरिक्त कार्यालय भवन निर्माण की योजना है। इसके लिए प्रस्ताव तैयार किया जा रहा है। स्वीकृति मिलने के बाद आगे का काम होगा। इसलिए अभी हैंडओवर संभव नहीं है।
पूरा अटल नगर परेशान
पार्किंग की समस्या केवल मंत्रालय तक सीमित नहीं है। इंद्रावती भवन सहित कई सरकारी कार्यालयों में यही स्थिति दिखाई देती है। पिछले कुछ वर्षों में बने अनेक भवनों में भी पर्याप्त पार्किंग व्यवस्था नहीं है। वाहन खुले क्षेत्रों में खड़े किए जा रहे हैं। गर्मी और बारिश में परेशानी और बढ़ जाती है। कुछ जगह शेड जरूर बनाए गए हैं, लेकिन वे पर्याप्त नहीं हैं। मजबूरी में अधिकारी-कर्मचारियों को अव्यवस्थित स्थानों पर वाहन खड़े करने पड़ते हैं।
नक्शा मंजूर हुआ तो पार्किंग कहां गई?
यहीं से सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है। क्या इन भवनों के नक्शों में पार्किंग का प्रावधान नहीं था? यदि नहीं था तो मंजूरी कैसे मिली? और यदि प्रावधान था तो निर्माण क्यों नहीं हुआ? आखिर किस स्तर पर नियमों की अनदेखी हुई? इन सवालों का जवाब किसी विभाग के पास नहीं दिखता।
आम लोगों पर नियम, सरकार पर छूट क्यों?
निजी बिल्डरों और कॉलोनाइजरों को पार्किंग नियमों का पालन नहीं करने पर नोटिस मिलते हैं। नक्शे रोके जाते हैं। निर्माण पर कार्रवाई होती है। लेकिन सरकारी भवनों के मामले में वही सख्ती क्यों दिखाई नहीं देती? क्या नियम सिर्फ आम लोगों के लिए हैं?
करोड़ों खर्च, फिर भी जवाबदेही नहीं
पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल जवाबदेही का है। करोड़ों रुपए खर्च हुए। ढांचा बन गया। समस्या बनी हुई है। मंत्रालय परेशान है, लेकिन एनआरडीए राहत देने के मूड में नहीं दिख रहा है। अब देखना यह है कि पहले पार्किंग शुरू होती है या फिर इस मुद्दे पर जिम्मेदारी तय होती है।
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