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रायपुर. नक्सलवाद के खिलाफ भारत की जंग अब अपने निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है। तेलंगाना पुलिस और सुरक्षा बलों को एक ऐसी ऐतिहासिक कामयाबी मिली है, जिसने प्रतिबंधित संगठन की नींव हिला दी है।
संगठन के सबसे बड़े चेहरों में से एक और महासचिव थिप्पिरी तिरुपति उर्फ देवजी ने अपने खास संग्राम समेत 14 साथियों के साथ हथियार डाल दिए हैं। यह सरेंडर केवल कुछ लोगों का आत्मसमर्पण नहीं है, बल्कि उस हिंसक विचारधारा की हार है, जिसने दशकों तक निर्दोषों का खून बहाया।
हालांकि मीडिया में यह खबर आग की तरह फैली हुई है, लेकिन तेलंगाना पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों ने अभी तक इसकी "आधिकारिक पुष्टि" नहीं की है। माना जा रहा है कि अगले 1-2 दिनों में मुख्यमंत्री या डीजीपी की उपस्थिति में एक बड़ी प्रेस कॉन्फ्रेंस कर इन्हें मीडिया के सामने पेश किया जा सकता है।
पहाड़ों और जंगलों में सालों तक राज करने वाले खूंखार चेहरों ने अब शांति चुनी है। सुरक्षा बलों की बढ़ती दबिश और सटीक रणनीति ने इन बड़े नक्सलियों को आत्मसमर्पण कराया है।
उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने क्या कहा?
बड़े नक्सली कमांडर देवा के आत्मसमर्पण पर उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा ने कहा कि बसव राजू के न्यूट्रलाइज होने के बाद देवजी बड़ा नक्सली था, जिसने सरेंडर किया है। देवजी ने तेलंगाना में सरेंडर किया है, ऐसी सूचना मिली है। कुछ नाम और शेष हैं, जो निष्क्रिय है, उन्हें भी सरेंडर कराया जाएगा। मुख्य धारा से वो जुड़े, इसमें काम किया जा रहा है। बैंक की राशि, शादी-विवाह, खेती करें। इसकी व्यवस्था भी कराई जा रही है।
आतंक के पोस्टर बॉय का अंत
एक करोड़ रुपए के इनामी देवजी और संग्राम का सरेंडर होना माओवादियों पर अब तक का सबसे घातक प्रहार है। देवजी कोई साधारण कैडर नहीं था। वह संगठन का थिंक-टैंक और पोलित ब्यूरो सदस्य था।
मई 2025 में बसवराजू की मौत के बाद देवजी ने ही संगठन की कमान संभाली थी। रणनीतिक रूप से माहिर माने जाने वाले इस नक्सली का आत्मसमर्पण यह बताता है कि अब 'लाल आतंक' के शीर्ष नेतृत्व में भी भगदड़ मच चुकी है।
टूटी कड़ियां: बड़े सरेंडर का सिलसिला
पिछले एक साल में सुरक्षा बलों के 'ऑपरेशन कगार' और सरकार की सख्त घेराबंदी ने बड़े-बड़े सूरमाओं को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया है। देवजी के पहले भी कई 'करोड़पति' नक्सलियों ने अपनी जान बचाने के लिए सफेद झंडा दिखाया है।
मल्लो जुला वेणुगोपाल (भूपति): अक्टूबर 2025 में 1 करोड़ के इस इनामी नेता ने 60 कैडरों के साथ महाराष्ट्र में हथियार डाले।
सुजाता (1 करोड़ इनामी): सितंबर 2025 में केंद्रीय कमेटी की सदस्य सुजाता ने सरेंडर कर संगठन के महिला विंग को अनाथ कर दिया।
वारसे देवा: जनवरी 2026 में हिडमा के सबसे भरोसेमंद कमांडर ने सरेंडर किया, जिससे छत्तीसगढ़ और तेलंगाना सीमा पर नक्सलियों का नेटवर्क ध्वस्त हो गया।
अब कितने नक्सली बचे हैं?
सुरक्षा एजेंसियों के ताजा आंकड़ों के अनुसार, कभी हजारों की संख्या में रहने वाले सक्रिय माओवादियों की संख्या अब सिमटकर महज 400 से 500 के करीब रह गई है।
शीर्ष नेतृत्व: केंद्रीय कमेटी के 20 से अधिक सदस्य या तो मारे जा चुके हैं या सरेंडर कर चुके हैं। अब केवल 5-7 प्रमुख नेता ही बचे हैं जो जंगलों में छिपते फिर रहे हैं।
प्रभाव क्षेत्र: लाल गलियारा (Red Corridor) जो कभी 10 राज्यों में फैला था, अब छत्तीसगढ़ के बस्तर के कुछ अबूझमाड़ इलाकों और ओडिशा-आंध्र की सीमाओं तक ही सीमित रह गया है।
विचारधारा का पतन और सरकार का प्रहार
गृह मंत्रालय के नक्सल मुक्त भारत 2026 के संकल्प ने नक्सलियों को दो रास्तों पर खड़ा कर दिया है, या तो गोली खाओ या सरेंडर करो। देवजी ने अपने बयान में स्वीकार किया कि अब संगठन के पास न तो नई भर्ती हो रही है और न ही जनता का समर्थन बचा है। नक्सलियों के बीच आपसी कलह और सुरक्षा बलों के बढ़ते ड्रोन और टेक-सर्वेलांस ने उनके सुरक्षित ठिकानों को श्मशान बना दिया है।
आखरी कील नक्सल ताबूत में
देवजी का सरेंडर नक्सली आंदोलन(छत्तीसगढ़ नक्सली सरेंडर) के ताबूत में आखिरी कील साबित हो सकता है। यह उन भटके हुए युवाओं के लिए एक कड़ा संदेश है कि बंदूक की नली से निकलने वाली क्रांति अब खुद ही दम तोड़ चुकी है।
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