छत्तीसगढ़ में संस्कृति और साहित्य का संगम, पुरखौती मुक्तांगन बना देशभर के रचनाकारों का मंच

The Sootr | Jan 25, 2026, 13:15 IST
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raipur sahitya utsav 2026
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रायपुर के पुरखौती मुक्तांगन में साहित्य उत्सव 2026 का भव्य आयोजन हुआ। मुख्यमंत्री की इस पहल से छत्तीसगढ़ की कला और साहित्य को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिली है।

Raipur. मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय प्रदेश की संस्कृति और साहित्य को बढ़ावा देने के लिए लगातार कदम उठा रहे हैं। इसी कड़ी में छत्तीसगढ़की साहित्यिक और सांस्कृतिक पहचान को नई ऊर्जा देने की दिशा में रायपुर में आयोजित साहित्य उत्सव 2026 बड़ा आयोजन बनकर सामने आया है।

तीन दिनों तक चले इस उत्सव ने साहित्य, संस्कृति और विचारों को एक साथ जोड़ने का काम किया। राज्य सरकार का मानना है कि छत्तीसगढ़ की समृद्ध साहित्यिक और सांस्कृतिक परंपरा को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच पर मजबूत पहचान दिलाना जरूरी है। इसी सोच के साथ रायपुर साहित्य उत्सव 2026 का आयोजन किया गया।

23, 24 और 25 जनवरी को पुरखौती मुक्तांगन में आयोजित इस उत्सव में देश और प्रदेश के ख्यातिप्राप्त लेखक, कवि, विचारक, बुद्धिजीवी और साहित्य प्रेमियों ने बड़ी संख्या में भाग लिया। पूरे आयोजन के दौरान परिसर में साहित्यिक चर्चा, कविता पाठ, सांस्कृतिक प्रस्तुतियां और संवाद का लगातार माहौल बना रहा। तीन दिनों तक यह स्थान साहित्य और संस्कृति का जीवंत केंद्र बना रहा।

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साहित्य और विचारों का बड़ा मंच

रायपुर साहित्य उत्सव 2026 में देश और प्रदेश के 120 ख्यातिप्राप्त साहित्यकार, बुद्धिजीवी और रचनाकार शामिल हुए। तीन दिनों में कुल 42 सत्र आयोजित किए गए। इन सत्रों में समकालीन सामाजिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक विषयों पर विस्तार से चर्चा हुई। बदलते समाज, नई पीढ़ी की सोच, साहित्य की भूमिका और भारतीय संस्कृति जैसे विषयों पर वक्ताओं ने अपने विचार रखे।

उत्सव में लेखिका और पत्रकार शिखा वार्ष्णेय, लेखक और कवि कमलेश कमल, डॉ. गोपाल कमल और नवगीत के प्रमुख रचनाकार डॉ.बुद्धिनाथ मिश्र ने अपनी रचनाओं से श्रोताओं को प्रभावित किया। इन सत्रों में बड़ी संख्या में साहित्य प्रेमी मौजूद रहे और पूरे समय गंभीरता और उत्साह दोनों दिखाई दिया।

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देश के नामी साहित्यकारों की मौजूदगी

साहित्य उत्सव में कई प्रसिद्ध साहित्यकारों और रचनाकारों की मौजूदगी ने आयोजन की गरिमा बढ़ाई। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी के संचालक विकास दवे, प्रसिद्ध लेखक अजय के. पांडे, चर्चित उपन्यासकार इंदिरा दांगी, लेखिका सोनाली मिश्र, हिंदी साहित्य की विदुषी जयश्री रॉय, फोटोग्राफर और लेखिका डॉ. कायनात काजी और लेखक-वक्ता अनिल पांडेय ने अलग-अलग सत्रों में भाग लिया।
इन साहित्यकारों ने अपने अनुभव साझा किए और साहित्य के बदलते स्वरूप पर विस्तार से बात की। युवा लेखकों और छात्रों के लिए यह सत्र खास आकर्षण का केंद्र रहे।

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साहित्य और लोक संस्कृति को मिला मंच

मुख्यमंत्री साय के निर्देश पर उत्सव में छत्तीसगढ़ी भाषा और लोक संस्कृति को विशेष महत्व दिया गया। छत्तीसगढ़ी कविता और लोकगीतों के लिए अलग सत्र आयोजित किए गए। इन सत्रों में स्थानीय भाषा और संस्कृति की झलक साफ दिखाई दी।
छत्तीसगढ़ी बोली के प्रमुख कवि रामेश्वर वैष्णव, रामेश्वर शर्मा, मीर अली मीर और शशि सुरेंद्र दुबे उपस्थित रहे। इन कवियों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से छत्तीसगढ़ की जमीन, संस्कृति और समाज की झलक पेश की। लोकगीत सत्र में डॉ. पी.सी. लाल यादव, शकुंतला तरार, बिहारीलाल साहू और डॉ. विनय कुमार पाठक ने अपनी प्रस्तुतियां दीं। इन प्रस्तुतियों ने उत्सव में सांस्कृतिक रंग भर दिया।

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साहित्यिक मंडप बने आकर्षण का केंद्र

उत्सव में बनाए गए साहित्यिक मंडप भी लोगों के आकर्षण का केंद्र रहे। इन मंडपों का नाम प्रतिष्ठित साहित्यकारों के नाम पर रखा गया था। मुख्य मंडप का नाम ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित छत्तीसगढ़ के साहित्यकार स्वर्गीय विनोद कुमार शुक्ल के नाम पर रखा गया। इसके अलावा अन्य मंडपों का नाम पं. श्यामलाल चतुर्वेदी, लाला जगदलपुरी और अनिरुद्ध नीरव के नाम पर रखा गया। इससे आयोजन को साहित्यिक परंपरा से जोड़ने का संदेश भी दिया गया।

वाजपेयी की स्मृति में काव्य पाठ

उत्सव के दौरान 24 जनवरी को पूर्व प्रधानमंत्री और भारत रत्न स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी की स्मृति में विशेष काव्य पाठ का आयोजन किया गया। इस सत्र में कई कवियों ने अपनी रचनाएं प्रस्तुत कीं।

इस अवसर पर डॉ.बुद्धिनाथ मिश्र, अजय सहाब, अमन अक्षर, डॉ. अंशु जोशी, त्रिलोकचंद्र महावर, हर्षराज हर्ष, डॉ. अजय पाठक और राहुल अवस्थी ने अपनी कविताएं सुनाईं। इस सत्र में श्रोताओं की बड़ी मौजूदगी रही और पूरे माहौल में साहित्यिक भावनाएं महसूस की गईं।

साहित्यिक पहचान को मजबूत करने की कोशिश

राज्य सरकार का मानना है कि छत्तीसगढ़ की साहित्यिक और सांस्कृतिक पहचान बहुत समृद्ध रही है। इस पहचान को नए दौर में मजबूत बनाने की जरूरत है। रायपुर साहित्य उत्सव जैसे आयोजन इसी दिशा में बड़ा कदम माने जा रहे हैं। सरकार की कोशिश है कि राज्य के साहित्यकारों और कलाकारों को बड़ा मंच मिले और नई पीढ़ी साहित्य और संस्कृति से जुड़े। ऐसे आयोजनों से राज्य की सांस्कृतिक पहचान मजबूत होने की उम्मीद जताई जा रही है।

तीन दिन तक बना रहा उत्सव का माहौल

तीन दिनों तक चले इस आयोजन में बड़ी संख्या में साहित्य प्रेमी, छात्र, शोधार्थी और आम लोग पहुंचे। अलग-अलग सत्रों में चर्चा, संवाद और रचनात्मक प्रस्तुतियां होती रहीं। पुरखौती मुक्तांगन का पूरा परिसर साहित्यिक गतिविधियों से भरा रहा। कुल मिलाकर रायपुर साहित्य उत्सव 2026 छत्तीसगढ़ के लिए साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में महत्वपूर्ण आयोजन बनकर सामने आया। इस आयोजन ने राज्य की साहित्यिक परंपरा को नई पहचान देने की दिशा में मजबूत प्रयास किया है।
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