एमपी के स्कूलों का चौंकाने वाला आंकड़ा, 14 साल में गायब हो गए 50 लाख छात्र, इधर सहायता राशि लगातार हुई जारी

Sanjay Dhiman | Aug 27, 2025, 11:11 IST
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rao uday pratap singh
Photograph: (the sootr)

मध्यप्रदेश में बीते 15 सालों में सरकारी और निजी स्कूलों से 50.72 लाख बच्चे गायब हो गए हैं। 2010-11 में 1.05 करोड़ बच्चे सरकारी स्कूलों में थे, जो 2025-26 तक घटकर 54.58 लाख रह गए। इन आंकड़ों के बावजूद 1617 करोड़ रुपये का क्या हुआ।

मध्यप्रदेश में पिछले 15 सालों में सरकारी और निजी स्कूलों से 50.72 लाख बच्चे गायब हो गए हैं, यह आंकड़ा विधानसभा में पेश किए गए सरकारी दस्तावेज़ों से सामने आया है। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, 2010-11 में 1 करोड़ 5 लाख 30 हजार बच्चे पहली से आठवीं क्लास तक पढ़ रहे थे।

2025-26 तक यह संख्या घटकर केवल 54 लाख 58 हजार रह गई है। निजी स्कूलों में भी नामांकन में कमी आई है, यहां 48.94 लाख से घटकर अब 43.93 लाख बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ रहे हैं।

एक ओर तो प्रदेश के स्कूलों में बच्चों की संख्या में गिरावट दर्ज की गई, दूसरी और इनके लिए जारी होने वाली विभिन्न योजनाओं की राशि में कमी नहीं आई। इस 15 सालों में बच्चों के लिए 1617 करोड़ रुपए जारी किए गए, लेकिन जब बच्चे ही स्कूलों में मौजूद नहीं थे तो फिर इन रूपयों का क्या हुआ, जांच का विषय है।

सरकारी स्कूलों में बच्चों की संख्या में गिरावट

मध्यप्रदेश में सरकारी स्कूलों में बच्चों की संख्या में भारी गिरावट आई है। एक तरफ जहां 2010-11 में बच्चों की संख्या 1.05 करोड़ थी, वहीं अब यह आंकड़ा घटकर 54.58 लाख रह गया है। यह गिरावट एक गंभीर सवाल खड़ा करती है कि इतने बड़े पैमाने पर बच्चों का नामांकन क्यों कम हुआ और सरकार ने इसपर क्या कदम उठाए।

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निजी स्कूलों में बच्चों की संख्या में भी कमी

निजी स्कूलों में भी स्थिति कुछ वैसी ही है। 2010-11 में 48.94 लाख बच्चे निजी स्कूलों में थे, जो अब घटकर 43.93 लाख रह गए हैं। यह भी एक संकेत है कि शिक्षा क्षेत्र में कुछ गड़बड़ी हो सकती है, जो बच्चों के नामांकन में गिरावट का कारण बनी है।

14 साल में जारी हुए 1617 करोड़ रुपए

मध्यप्रदेश सरकार ने 14 साल के दौरान मिड-डे मील, यूनिफॉर्म और किताबों के लिए 1617 करोड़ रुपए जारी किए थे। इन आंकड़ों के अनुसार, एक छात्र पर औसतन 3000 रुपए खर्च होते हैं। लेकिन, सवाल यह है कि इतनी बड़ी रकम का क्या हुआ? क्या ये पैसे सही तरीके से उपयोग किए गए थे या कहीं भ्रष्टाचार के कारण ये पैसे ग़ायब हो गए?

हर साल गायब हो जाते हैं 3.85 लाख बच्चे

विधानसभा में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार हर साल मध्यप्रदेश शिक्षा विभाग के सरकारी और निजी स्कूलों से 3.85 लाख बच्चे स्कूलों से गायब हो जाते हैं, या यू कहें की स्कूल छोड़ देते हैं। कोविड काल में यह संख्या बढ़ गई थी, 14 सालों में 50 लाख से अधिक बच्चों ने स्कूल छोड़ दिया, इधर एक ओर जहां स्कूलों से बच्चे कम हो रहे थे, तो दूसरी ओर स्कूलों को मिलने वाली राशि कम नहीं हो रही है।

इन 14 सालों में 16 सौ करोड़ से अधिक की राशि बच्चों की अलग-अलग योजनाओं के लिए जारी की गई, जिसमें से एक बड़ा अमाउंट बच्चों तक पहुंचा ही नहीं। जो एक बडे़ भ्रष्टाचार की ओर इशारा करता है।

एमपी के स्कूलों से बच्चों के गायब होने व राशि खर्च को ऐसे समझें



50.72 लाख बच्चे गायब: मध्यप्रदेश में पिछले 15 सालों में सरकारी और निजी स्कूलों से 50.72 लाख बच्चे गायब हो गए हैं, जिससे बच्चों के नामांकन में बड़ी गिरावट आई है।

1617 करोड़ रुपए का ग़ायब होना: इन बच्चों के लिए 14 साल में 1617 करोड़ रुपए जारी किए गए, लेकिन सवाल यह है कि ये पैसे कहां गए और क्या सही तरीके से इनका उपयोग हुआ था?

कैग की रिपोर्ट: 2016 में कैग (नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक) ने मध्यप्रदेश के नामांकन आंकड़ों पर सवाल उठाए थे और इसे भरोसेमंद नहीं माना था।

बच्चों का ड्रॉप आउट: विशेषज्ञों का कहना है कि इतने बड़े पैमाने पर बच्चों का ड्रॉप आउट संभव नहीं हो सकता और संभवतः फर्जी नामांकन हुए हैं।

संविधान का उल्लंघन: संविधान के अनुच्छेद 45 के तहत 1960 तक बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा देने का लक्ष्य था, लेकिन मध्यप्रदेश में अब भी ये लक्ष्य पूरा नहीं हो पाया है।

शिक्षा मंत्री ने माना, आंकड़ों को सुधारा गया

2016 की एक रिपोर्ट में कैग (नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक) ने मध्यप्रदेश के नामांकन और स्कूल छोड़ने वाले बच्चों के आंकड़ों पर सवाल उठाए थे। 2021 में तत्कालीन शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार ने इस तथ्य को स्वीकार किया था कि चाइल्ड ट्रैकिंग के माध्यम से डेटा को सुधारा गया है, जो पहले फर्जी था।

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छात्र अपनी इच्छा से नहीं छोड़ते स्कूल

शिक्षाविद डॉ. अनिल सद्गोपाल के अनुसार, बच्चे कभी अपनी इच्छा से स्कूल नहीं छोड़ते। इसके बजाय उन्हें शिक्षा व्यवस्था से बाहर धकेल दिया जाता है। उनके मुताबिक, गलत तरीके से बच्चों के नामांकन रजिस्टर में प्रविष्टियां की जाती हैं और इन बच्चों के नाम पर मिलने वाली राशि को हड़पने के लिए यह सब किया जाता है।

शिक्षा मंत्री बोले पालकों की पसंद निजी स्कूल

मध्यप्रदेश के स्कूलों में तेजी से घटती स्कूली बच्चों की संख्या को लेकर स्कूल शिक्षा मंत्री राव उदय प्रताप सिंह का कहना है कि सरकारी स्कूलों में सुविधाएं और शिक्षा का स्तर बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे है, लेकिन मध्यप्रदेश में घटती जन्मदर और पैरेंट का निजी स्कूलों को सरकारी पर तवज्जों देना एक प्रमुख कारण है।

उन्होंने कहा कि जब तक लोगों को यह बात समझ में आती है कि सरकारी स्कूलों से भी बेहतर परिणाम मिल रहे है, काफी देर हो चुकी होती है। फिर भी सरकार लगातार सरकारी स्कूलों में शिक्षा और सुविधाओं का स्तर सुधारने में लगी है। जल्द इसके परिणाम भी सामने आएंगे।

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