आरक्षण बढ़ाने पर सरकारों को अदालतों से झटका, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ से लेकर तमिलनाडु तक जानें कहां कितनी सीमा?
Ram Krishna Gautam | Oct 19, 2026, 21:53 IST
राज्य सरकारों की आरक्षण पर कोर्ट में कानूनी लड़ाई।
मध्यप्रदेश में 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण की लड़ाई सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई है। राज्य सरकार ने हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दी है। यह विवाद अब दूसरे राज्यों के पुराने मामलों की याद दिला रहा है। बिहार और महाराष्ट्र में आरक्षण बढ़ाने वाले कानून अदालतों में रद्द हो चुके हैं। छत्तीसगढ़ में भी ऐसा विवाद सामने आया था। दूसरी तरफ तमिलनाडु में 69 फीसदी आरक्षण लागू है।
आरक्षण बढ़ाने पर सरकारों को अदालतों से झटका, मध्यप्रदेश से तमिलनाडु तक कहां कितनी सीमा?
मध्यप्रदेश में 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण की लड़ाई सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई है। राज्य सरकार ने हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दी है। यह विवाद अब दूसरे राज्यों के पुराने मामलों की याद दिला रहा है। बिहार और महाराष्ट्र में आरक्षण बढ़ाने वाले कानून अदालतों में रद्द हो चुके हैं। छत्तीसगढ़ में भी ऐसा विवाद सामने आया था। दूसरी तरफ तमिलनाडु में 69 फीसदी आरक्षण लागू है।
सवाल है कि आखिर अलग-अलग राज्यों में इतने अलग नतीजे क्यों हैं?
मध्यप्रदेश में ओबीसी आरक्षण की कहानी 2019 से जुड़ी है। तत्कालीन कमलनाथ सरकार ने ओबीसी आरक्षण 14 से 27 फीसदी किया था। सरकार ने इसके पीछे पिछड़े वर्ग की बड़ी आबादी का तर्क दिया था।
फैसले के खिलाफ हाई कोर्ट में याचिकाएं दाखिल हुई थीं। याचिकाकर्ताओं ने आरक्षण की संवैधानिक सीमा का सवाल उठाया था। इसके बाद मामला लंबे समय तक अदालत में चलता रहा।
अब 9 अक्टूबर 2026 को हाई कोर्ट का फैसला आने के बाद मामला फिर गरमा गया है। मध्यप्रदेश सरकार ने इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका यानी SLP दाखिल कर दी है। बीजेपी के प्रदेश ओबीसी मोर्चा अध्यक्ष पवन पाटीदार ने भी अलग से याचिका लगाई है।
खास बात यह है कि ओबीसी आरक्षण बढ़ाने का फैसला कांग्रेस सरकार ने लिया था। अब बीजेपी सरकार इस मामले को सुप्रीम कोर्ट लेकर पहुंची है। यानी ओबीसी आरक्षण का मुद्दा सिर्फ बीजेपी और कांग्रेस की राजनीति तक सीमित नहीं है। इससे प्रदेश के बड़े सामाजिक वर्ग की उम्मीदें और सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे युवाओं का भविष्य भी जुड़ा है।
अब समझिए कि आरक्षण की 50 फीसदी सीमा आखिर तय कैसे हुई। साल 1992 में सुप्रीम कोर्ट ने इंद्रा साहनी बनाम भारत सरकार मामले में एक बड़ा फैसला सुनाया था। इसे मंडल आयोग से जुड़ा फैसला भी कहा जाता है। इसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सामान्य तौर पर आरक्षण 50 फीसदी से ज्यादा नहीं होना चाहिए। हालांकि, अदालत ने कुछ खास परिस्थितियों में इस सीमा से आगे जाने की छूट भी दी थी।
किसी वर्ग की बड़ी आबादी आरक्षण बढ़ाने का अकेला आधार नहीं है। सरकारों को संवैधानिक नियमों के अनुसार फैसले का औचित्य साबित करना होता है।
OBC Reservation यानी अन्य पिछड़ा वर्ग आरक्षण इसी कानूनी बहस का हिस्सा है। MP OBC Reservation के मामले में भी यही संवैधानिक सवाल उठे हैं।
अब जानते हैं उन राज्यों के बारे में, जहां आरक्षण बढ़ाने के फैसले अदालतों में फंस गए हैं।
अब बात करते हैं बिहार की। यहां साल 2023 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सरकार ने जाति आधारित सर्वेक्षण कराया था। इसके आंकड़े सामने आने के बाद सरकार ने आरक्षण बढ़ाने का फैसला लिया था। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़ा और अत्यंत पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण बढ़ाकर कुल 65 फीसदी कर दिया गया था। वहीं, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग यानी EWS का 10 फीसदी आरक्षण जोड़ने पर यह आंकड़ा 75 फीसदी तक पहुंच गया था।
सरकार का कहना था कि समाज की वास्तविक स्थिति और अलग-अलग वर्गों की हिस्सेदारी को देखते हुए आरक्षण बढ़ाना जरूरी है। हालांकि, जून 2024 में पटना हाई कोर्ट ने इस फैसले को झटका दिया था। अदालत ने 65 फीसदी आरक्षण वाले कानूनी संशोधनों को असंवैधानिक मानते हुए रद्द कर दिया था। अदालत ने समानता के अधिकार और आरक्षण की तय सीमा जैसे मुद्दों पर विचार किया था।
इस फैसले के बाद एक बड़ा सवाल उठा। क्या किसी जाति की आबादी ज्यादा होने से उसे उसी हिसाब से आरक्षण मिल सकता है? कानूनी तौर पर इसका जवाब इतना आसान नहीं है क्योंकि आरक्षण तय करते समय सिर्फ आबादी नहीं देखी जाती। उस वर्ग का पिछड़ापन, सरकारी नौकरियों में उसकी हिस्सेदारी और संविधान के नियम भी महत्वपूर्ण होते हैं।
अब बात करते हैं महाराष्ट्र की। यहां मराठा आरक्षण को लेकर कई सालों से विवाद चल रहा है। साल 2018 में महाराष्ट्र सरकार ने मराठा समुदाय के लिए अलग से आरक्षण देने का फैसला किया था। हालांकि, मई 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून को असंवैधानिक बताते हुए रद्द कर दिया था। अदालत ने कहा कि सरकार 50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण देने के लिए जरूरी खास परिस्थितियों को साबित नहीं कर पाई थी। इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने 1992 के इंद्रा साहनी मामले में तय की गई सामान्य सीमा को भी बरकरार रखा था।
हालांकि, महाराष्ट्र सरकार ने इसके बाद भी कोशिश नहीं छोड़ी थी। फरवरी 2024 में सरकार ने मराठा समुदाय को सरकारी नौकरियों और शिक्षा में 10 फीसदी आरक्षण देने के लिए नया कानून बनाया था। इस कानून को भी अदालत में चुनौती दी गई थी। महाराष्ट्र का मामला बताता है कि किसी समाज की पुरानी मांग और सरकार की सहमति से ही आरक्षण लागू नहीं हो जाता है। इसके लिए कानून का संविधान के नियमों पर खरा उतरना भी जरूरी है।
अब बात करते हैं छत्तीसगढ़ की। यहां भी आरक्षण बढ़ाने को लेकर बड़ा विवाद हो चुका है। साल 2012 में आरक्षण की नई व्यवस्था लागू होने के बाद कुल आरक्षण 58 फीसदी तक पहुंच गया था। लेकिन सितंबर 2022 में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने इस व्यवस्था को असंवैधानिक बताते हुए रद्द कर दिया था।
इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था। मई 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले पर अंतरिम रोक लगा दी थी। इससे सरकारी भर्तियों और चयन प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का रास्ता खुल गया था। हालांकि, यह राहत अस्थायी थी। इसका मतलब यह नहीं था कि आरक्षण का विवाद पूरी तरह खत्म हो गया था।
इसके बाद छत्तीसगढ़ में आरक्षण बढ़ाकर 76 फीसदी करने की भी कोशिश हुई थी। इसके लिए कानून बनाने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई थी। छत्तीसगढ़ का मामला बताता है कि सिर्फ विधानसभा में कानून पास करने से आरक्षण का रास्ता साफ नहीं होता है। इसमें राज्यपाल की भूमिका, संविधान के नियम और अदालत का फैसला भी अहम होते हैं।
अब बात करते हैं तमिलनाडु की, जहां 69 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था लंबे समय से लागू है। सवाल यह है कि जब दूसरे राज्यों में 50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण पर विवाद हो रहा है, तो तमिलनाडु में यह व्यवस्था कैसे चल रही है?
तमिलनाडु में लंबे समय से 69 फीसदी आरक्षण लागू है। अब सवाल यह है कि जब दूसरे राज्यों में 50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण देने के फैसले अदालतों में रद्द हो गए, तो तमिलनाडु में 69 फीसदी आरक्षण कैसे चल रहा है?
दरअसल, इसके पीछे एक खास कानूनी वजह है। तमिलनाडु सरकार ने साल 1993 में आरक्षण को लेकर कानून बनाया था। इसके बाद 1994 में इस कानून को संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल कर दिया गया था।
नौवीं अनुसूची में शामिल कानूनों को संविधान के तहत खास सुरक्षा मिलती है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि इन कानूनों को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती है। साल 2007 में सुप्रीम कोर्ट ने आईआर कोएल्हो मामले में साफ कहा था कि 24 अप्रैल 1973 के बाद नौवीं अनुसूची में शामिल किए गए कानूनों की भी जांच हो सकती है। अदालत यह देख सकती है कि कहीं ये कानून संविधान के मूल ढांचे के खिलाफ तो नहीं हैं।
यानी तमिलनाडु में 69 फीसदी आरक्षण लागू होने का मतलब यह नहीं है कि दूसरे राज्य भी आसानी से आरक्षण बढ़ाकर 69 या 75 फीसदी कर सकते हैं। इसके लिए संविधान के नियमों और कानूनी शर्तों का पालन करना जरूरी है।
अब एक और बड़ा सवाल उठता है। जब आरक्षण की सीमा 50 फीसदी है, तो आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग यानी EWS को 10 फीसदी आरक्षण कैसे मिल रहा है?
दरअसल, इसके पीछे एक अलग कानूनी व्यवस्था है। साल 2019 में संविधान में 103वां संशोधन किया गया था। इसके जरिए आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए अधिकतम 10 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था की गई थी।
नवंबर 2022 में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने भी बहुमत से इस संशोधन को सही ठहराया था। यानी EWS आरक्षण किसी सामान्य राज्य कानून से नहीं, बल्कि संविधान में किए गए खास संशोधन से लागू हुआ है।
इसका मतलब यह नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट ने हर तरह के आरक्षण के लिए 50 फीसदी की सीमा खत्म कर दी है। बाकी आरक्षण व्यवस्थाओं पर लागू संवैधानिक नियम और शर्तें अब भी महत्वपूर्ण हैं।
अब मध्यप्रदेश में 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण के मामले पर सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही अहम होगी। अदालत यह देख सकती है कि सरकार ने किस आधार पर आरक्षण बढ़ाया था। इसके लिए सरकार ने कौन-कौन से आंकड़े और कानूनी तर्क पेश किए हैं? दूसरे राज्यों में आए फैसलों को भी देखा जा सकता है। हालांकि, हर राज्य के हालात और कानून अलग होते हैं।
इस मामले का सीधा असर सरकारी नौकरी और पढ़ाई के अवसरों पर पड़ सकता है। आरक्षण बढ़ने या घटने से अलग-अलग वर्गों के उम्मीदवारों की हिस्सेदारी बदल सकती है।
यहां एक और सवाल उठता है। यदि सरकारी विभागों में खाली पदों पर भर्ती ही नहीं होगी, तो सिर्फ आरक्षण बढ़ाने से युवाओं को नौकरी कैसे मिलेगी? इसलिए आरक्षण के साथ सरकारी भर्तियां होना भी जरूरी है।
फिलहाल मध्यप्रदेश में 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण की लड़ाई सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुकी है। अब आगे की सुनवाई और अदालत के फैसले से ही साफ होगा कि प्रदेश में आरक्षण की कानूनी स्थिति क्या होगी।
मध्यप्रदेश में ओबीसी आरक्षण का विवाद लाखों अभ्यर्थियों के लिए महत्वपूर्ण है। यह केवल आरक्षण प्रतिशत का सवाल नहीं है। इसके साथ सरकारी नौकरियों में हिस्सेदारी और समान अवसर का मुद्दा जुड़ा है। बिहार, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ के मामले अदालतों की भूमिका समझाते हैं। तमिलनाडु का उदाहरण अलग कानूनी स्थिति दिखाता है। संविधान सामाजिक न्याय और समानता दोनों को महत्व देता है। सरकारों को आरक्षण संबंधी कानून बनाते समय इन संवैधानिक सिद्धांतों का पालन करना होता है।
मध्यप्रदेश में 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण की लड़ाई सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई है। राज्य सरकार ने हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दी है। यह विवाद अब दूसरे राज्यों के पुराने मामलों की याद दिला रहा है। बिहार और महाराष्ट्र में आरक्षण बढ़ाने वाले कानून अदालतों में रद्द हो चुके हैं। छत्तीसगढ़ में भी ऐसा विवाद सामने आया था। दूसरी तरफ तमिलनाडु में 69 फीसदी आरक्षण लागू है।
सवाल है कि आखिर अलग-अलग राज्यों में इतने अलग नतीजे क्यों हैं?
मध्यप्रदेश में विवाद क्यों बढ़ा?
फैसले के खिलाफ हाई कोर्ट में याचिकाएं दाखिल हुई थीं। याचिकाकर्ताओं ने आरक्षण की संवैधानिक सीमा का सवाल उठाया था। इसके बाद मामला लंबे समय तक अदालत में चलता रहा।
हाई कोर्ट ने क्या फैसला दिया?
खास बात यह है कि ओबीसी आरक्षण बढ़ाने का फैसला कांग्रेस सरकार ने लिया था। अब बीजेपी सरकार इस मामले को सुप्रीम कोर्ट लेकर पहुंची है। यानी ओबीसी आरक्षण का मुद्दा सिर्फ बीजेपी और कांग्रेस की राजनीति तक सीमित नहीं है। इससे प्रदेश के बड़े सामाजिक वर्ग की उम्मीदें और सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे युवाओं का भविष्य भी जुड़ा है।
आरक्षण की 50 फीसदी सीमा क्या है?
क्या आबादी से बढ़ सकता है आरक्षण?
OBC Reservation यानी अन्य पिछड़ा वर्ग आरक्षण इसी कानूनी बहस का हिस्सा है। MP OBC Reservation के मामले में भी यही संवैधानिक सवाल उठे हैं।
अब जानते हैं उन राज्यों के बारे में, जहां आरक्षण बढ़ाने के फैसले अदालतों में फंस गए हैं।
बिहार का आरक्षण कानून क्यों रद्द हुआ?
सरकार का कहना था कि समाज की वास्तविक स्थिति और अलग-अलग वर्गों की हिस्सेदारी को देखते हुए आरक्षण बढ़ाना जरूरी है। हालांकि, जून 2024 में पटना हाई कोर्ट ने इस फैसले को झटका दिया था। अदालत ने 65 फीसदी आरक्षण वाले कानूनी संशोधनों को असंवैधानिक मानते हुए रद्द कर दिया था। अदालत ने समानता के अधिकार और आरक्षण की तय सीमा जैसे मुद्दों पर विचार किया था।
इस फैसले के बाद एक बड़ा सवाल उठा। क्या किसी जाति की आबादी ज्यादा होने से उसे उसी हिसाब से आरक्षण मिल सकता है? कानूनी तौर पर इसका जवाब इतना आसान नहीं है क्योंकि आरक्षण तय करते समय सिर्फ आबादी नहीं देखी जाती। उस वर्ग का पिछड़ापन, सरकारी नौकरियों में उसकी हिस्सेदारी और संविधान के नियम भी महत्वपूर्ण होते हैं।
महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण क्यों अटका?
क्या महाराष्ट्र ने फिर कानून बनाया?
छत्तीसगढ़ में 58 फीसदी का विवाद
इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था। मई 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले पर अंतरिम रोक लगा दी थी। इससे सरकारी भर्तियों और चयन प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का रास्ता खुल गया था। हालांकि, यह राहत अस्थायी थी। इसका मतलब यह नहीं था कि आरक्षण का विवाद पूरी तरह खत्म हो गया था।
इसके बाद छत्तीसगढ़ में आरक्षण बढ़ाकर 76 फीसदी करने की भी कोशिश हुई थी। इसके लिए कानून बनाने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई थी। छत्तीसगढ़ का मामला बताता है कि सिर्फ विधानसभा में कानून पास करने से आरक्षण का रास्ता साफ नहीं होता है। इसमें राज्यपाल की भूमिका, संविधान के नियम और अदालत का फैसला भी अहम होते हैं।
तमिलनाडु में 69 फीसदी आरक्षण कैसे?
तमिलनाडु में लंबे समय से 69 फीसदी आरक्षण लागू है। अब सवाल यह है कि जब दूसरे राज्यों में 50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण देने के फैसले अदालतों में रद्द हो गए, तो तमिलनाडु में 69 फीसदी आरक्षण कैसे चल रहा है?
दरअसल, इसके पीछे एक खास कानूनी वजह है। तमिलनाडु सरकार ने साल 1993 में आरक्षण को लेकर कानून बनाया था। इसके बाद 1994 में इस कानून को संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल कर दिया गया था।
नौवीं अनुसूची से क्या संरक्षण मिला?
यानी तमिलनाडु में 69 फीसदी आरक्षण लागू होने का मतलब यह नहीं है कि दूसरे राज्य भी आसानी से आरक्षण बढ़ाकर 69 या 75 फीसदी कर सकते हैं। इसके लिए संविधान के नियमों और कानूनी शर्तों का पालन करना जरूरी है।
ईडब्ल्यूएस को 10 फीसदी कैसे मिला?
दरअसल, इसके पीछे एक अलग कानूनी व्यवस्था है। साल 2019 में संविधान में 103वां संशोधन किया गया था। इसके जरिए आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए अधिकतम 10 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था की गई थी।
नवंबर 2022 में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने भी बहुमत से इस संशोधन को सही ठहराया था। यानी EWS आरक्षण किसी सामान्य राज्य कानून से नहीं, बल्कि संविधान में किए गए खास संशोधन से लागू हुआ है।
इसका मतलब यह नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट ने हर तरह के आरक्षण के लिए 50 फीसदी की सीमा खत्म कर दी है। बाकी आरक्षण व्यवस्थाओं पर लागू संवैधानिक नियम और शर्तें अब भी महत्वपूर्ण हैं।
मध्यप्रदेश में अब आगे क्या होगा?
इस मामले का सीधा असर सरकारी नौकरी और पढ़ाई के अवसरों पर पड़ सकता है। आरक्षण बढ़ने या घटने से अलग-अलग वर्गों के उम्मीदवारों की हिस्सेदारी बदल सकती है।
यहां एक और सवाल उठता है। यदि सरकारी विभागों में खाली पदों पर भर्ती ही नहीं होगी, तो सिर्फ आरक्षण बढ़ाने से युवाओं को नौकरी कैसे मिलेगी? इसलिए आरक्षण के साथ सरकारी भर्तियां होना भी जरूरी है।
फिलहाल मध्यप्रदेश में 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण की लड़ाई सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुकी है। अब आगे की सुनवाई और अदालत के फैसले से ही साफ होगा कि प्रदेश में आरक्षण की कानूनी स्थिति क्या होगी।
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