भोपाल के स्कूली बच्चों में हाई ब्लड प्रेशर की सच्ची तस्वीर, AIIMS की नई स्टडी
Manya Jain | Dec 27, 2025, 17:53 IST
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AIIMS Bhopal ने 10 से 18 साल के 824 स्कूल बच्चों पर रिसर्च की और पाया कि सिर्फ लगभग 1.4 प्रतिशत में ही सच में हाई ब्लड प्रेशर था, जबकि पहले देश स्तर पर करीब 7–8 प्रतिशत का अनुमान लगाया जाता रहा है। स्टडी कहती है, सही और दोहराई जांच बहुत जरूरी है।
5 प्वाइंट में समझें क्या है पूरा मामला
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AIIMS Bhopal की टीम ने इन बच्चों की स्थिति को समझने की कोशिश की। टीम का मानना था कि बच्चों में हाइपरहाईटेंशनशन के डर को कम किया जाए। सही जानकारी और आंकड़े सामने लाए जाएं ताकि इसके बारे में सही समझ बनी सके।
यह रिसर्च इस बात पर केंद्रित था कि बच्चों के स्वास्थ्य के बारे में जागरूकता (medicines for diabetes and blood pressure) बढ़ाई जाए। यह जरूरी है कि बच्चों को सही जानकारी मिले ताकि वे खुद अपनी सेहत का ध्यान रख सकें।
स्टडी में कौन बच्चे शामिल हुए और कैसे जांच हुई
हर बच्चे को तीन अलग दिनों पर स्कूल में ही जांच के लिए बुलाया गया। हर विजिट के बीच लगभग एक सप्ताह का अंतर रखा गया ताकि रूटीन जीवन चल सके। हर विजिट पर ब्लड प्रेशर तीन बार नापा गया, यानी कुल नौ रीडिंग तैयार हुईं। इन सभी रीडिंग को अंतरराष्ट्रीय पीडियाट्रिक चार्ट के अनुसार वर्गीकृत किया गया।
कितने बच्चों में सच में निकला हाई ब्लड प्रेशर
करीब 2.6 प्रतिशत लड़के हाइपरटेंशन की श्रेणी में आए। लड़कियों में यह दर सिर्फ लगभग 0.2 प्रतिशत रही, यानी संख्या काफी कम रही। यह अंतर बताता है कि स्कूल हेल्थ प्रोग्राम में लड़कों की स्क्रीनिंग पर खास ध्यान चाहिए।
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एक दिन में ली गई रीडिंग क्यों भटका सकती है
अगर ऐसे में सिर्फ पहली विजिट की रीडिंग पर फैसला हो, तो गलती बढ़ जाती है। कई बच्चों को हाइपरटेंसिव मान लिया जाता है, जबकि आगे की रीडिंग सामान्य आती। भोपाल की टीम ने जब तीन विजिट के आंकड़ों को जोड़ा, तो मामलों की संख्या घट गई। यहीं से संदेश निकला कि बच्चों के लिए एक बार की जांच कभी काफी नहीं हो सकती।
मोटापा, खानपान और दूसरे छिपे कारण
इससे संकेत मिला कि सिर्फ वजन देखकर जोखिम का अनुमान लगाना सही नहीं होगा। टीम का मानना है कि शहर के स्कूलों में खानपान की आदतें भी अहम हैं।
ज्यादा नमक वाला जंक फूड, पैकेट स्नैक्स और सॉफ्ट ड्रिंक जैसे कारण असर डाल सकते हैं। पढ़ाई का दबाव और पारिवारिक तनाव भी किशोरों के ब्लड प्रेशर को धीरे-धीरे बदल सकते हैं। अगर परिवार में पहले से हाई बीपी हो, तो बच्चे का जोखिम और बढ़ सकता है।
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हाइपरटेंशन टैग देना आसान काम नहीं
इसके लिए सही चार्ट और आयु आधारित मानकों का उपयोग भी जरूरी बताया गया है। रिसर्चकर्ता चाहते हैं कि राष्ट्रीय और राज्य हेल्थ प्रोग्राम इस मॉडल को अपनाएं। स्कूल हेल्थ चेकअप में एक बार की जगह मल्टी विजिट प्लान बनाया जाए।
जहां संभव हो, वहां 24 घंटे की एंबुलेटरी मॉनिटरिंग पर भी विचार करने की बात आई है। इससे उन बच्चों को पकड़ा जा सकेगा, जिनका बीपी सिर्फ घर या स्कूल से बाहर बढ़ता है।
माता पिता और स्कूल क्या सीख सकते हैं
वरना आगे चलकर दिल और किडनी से जुड़ी दिक्कतें बढ़ने की आशंका रहती है। माता-पिता के लिए संदेश है कि वे नियमित बीपी जांच से डरें नहीं। लेकिन एक रीडिंग ऊंची आने पर तुरंत घबराएं भी नहीं और दोहराई जांच कराएं।
स्कूलों के लिए जरूरी है कि हेल्थ कैंप में बीपी मापने की प्रक्रिया को बेहतर बनाया जाए। रिकॉर्ड अच्छे से रखें, ताकि जरूरत पड़ने पर डॉक्टर को पूरी हिस्ट्री मिल सके।
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बच्चों के लिए आसान और काम की आदतें
दिन भर में पर्याप्त पानी पीना भी ब्लड प्रेशर संतुलित रखने में सहायक है। मोबाइल और स्क्रीन टाइम घटाकर खुला खेल और हल्की एक्सरसाइज बढ़ाना फायदेमंद है। हर दिन कम से कम आधा घंटा तेज चलना या खेलना दिल के लिए अच्छा माना गया है।
नींद पूरी लेना, देर रात तक जागने की आदत छोड़ना भी बीपी पर सकारात्मक असर डालता है। अगर डॉक्टर ने फॉलो अप विजिट कहा है, तो कोई विजिट मिस न करना सबसे जरूरी है।
रिसर्च टीम और स्रोतों को क्रेडिट
इस खबर में उपयोग किए गए सभी प्रमुख तथ्य टाइम्स ऑफ इंडिया भोपाल सिटी रिपोर्ट से लिए गए हैं। साथ ही बीएमसी पीडियाट्रिक्स के मूल रिसर्च पेपर और हेल्थ गाइडलाइन लेखों पर भी आधारित हैं।
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