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Photograph: (THESOOTR)
भोपाल नगर निगम में भ्रष्टाचार की ऐसी गंदगी फैली हुई है, जिसे साफ करने की बजाय अधिकारियों ने उसे और बढ़ावा दिया है। हाल ही में महापौर और नगर निगम आयुक्त हरेन्द्र नारायण के खिलाफ भ्रष्टाचार के गंभीर मामले सामने आए हैं।
नगर निगम आयुक्त हरेन्द्र नारायण ने नियमों का उल्लंघन करते हुए चंचलेश गिरहरे की तैनाती की, जो एक सहायक यंत्री थे, लेकिन उन्हें मूल पद से चार पद की प्रशासनिक पदोन्नति दी गई।
चंचलेश गिरहरे की तैनाती पर उठ रहे सवाल
यह पूरा मामला नगर निगम के नियमों के खिलाफ है। मूल रूप से सहायक यंत्री चंचलेश गिरहरे नगर निगम भोपाल के स्थायी कर्मचारी नहीं थे। इसके बावजूद आयुक्त ने उन्हें बिना अनुमति के प्रशासनिक विभागों का प्रभारी बना दिया।
इसे लेकर आवेदनकर्ता राम पाराशर ने EOW में शिकायत करते हुए जांच और कार्रवाई की मांग की है।
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महापौर के रिश्तेदारों को ठेके देने का मामला भी
अब बात करते हैं ठेके की, जो महापौर मालती राय के रिश्तेदारों को दिए गए। यह ठेके पूरी तरह से भ्रष्टाचार के खेल को उजागर करते हैं। कुछ फर्मों को 6 गाड़ियों का ठेका दिया गया, लेकिन महापौर के रिश्तेदारों को 17 गाड़ियां दी गईं।
कानून विशेषज्ञ बताते हैं कि यह सीधे तौर पर "conflict of interest" (हितों का टकराव) का मामला बनता है। इस पूरे मामले में नगर निगम आयुक्त की भूमिका संदेहास्पद नजर आती है, क्योंकि उन्होंने नियमों का उल्लंघन कर निजी लाभ के लिए इस भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया।
क्यों जरूरी है जांच
शिकायतकर्ता राम पाराशर के मुताबिक, नगर निगम में इस तरह के गोरखधंधे की तत्काल जांच की जरूरत है। भारतीय न्याय संहिता BNS 2023 की धारा 467, 336, 340, 61 (2) और PC एक्ट की धारा 13 (1)(D) और 13 (2) के तहत आयुक्त हरेन्द्र नारायण और भोपाल महापौर के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज किया जाना चाहिए। यह स्थिति बेहद गंभीर है और इसे नजरअंदाज करना नगर निगम भोपाल के हितों से खिलवाड़ होगा।
इसके अलावा, महापौर मालती राय से जुड़े रिश्तेदारों और फर्मों को दिए गए ठेके की जांच करना अत्यंत महत्वपूर्ण है। इससे साफ होगा कि कैसे प्रशासन के उच्च पदों पर बैठे अधिकारियों ने नियमों को ताक पर रखकर अपने निजी लाभ के लिए भ्रष्टाचार किया।
ठेके देने में कैसे की गई गड़बड़ी?अब सवाल उठता है कि इन ठेकों को कैसे तय किया गया? अगर सभी ट्रेवल एजेंसी इंपैनल हैं, तो फिर कुछ कंपनियों को ज्यादा गाड़ियों का ठेका क्यों दिया गया? क्या महापौर के रिश्तेदारों को एक विशेष तवज्जो दी गई? यदि हां, तो क्यों? 1. गाड़ियों की संख्या तय करने का आधारक्या सभी ट्रैवल एजेंसी इंपैनल हैं, फिर कुछ कंपनियों को अधिक गाड़ियां क्यों दी गईं? अगर सभी को समान रूप से गाड़ियां दी जातीं, तो यह तर्कसंगत होता, लेकिन यहां कोई स्पष्ट कारण नहीं दिखता है। 2. राय श्री ट्रेवल्स का महापौर से संबंधइस कंपनी का महापौर के परिवार से सीधा संबंध बताया जा रहा है। क्या यह रिश्ता भ्रष्टाचार को जन्म दे रहा है? क्या इस फर्म को महापौर के परिवार के लाभ के लिए ठेका दिया गया? 3. ठेके में पारदर्शिता की कमीमहापौर के रिश्तेदारों को 17 गाड़ियां दी गईं, जबकि अन्य फर्मों को केवल 6 गाड़ियां दी गईं। यह असमान वितरण क्या नियमों के खिलाफ है? क्या यह महापौर के परिवार से जुड़े फर्मों के पक्ष में एक जुगाड़ है? |
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आयुक्त की भूमिका पर सवाल
आयुक्त हरेन्द्र नारायण पर आरोप है कि उन्होंने नियमों को ताक पर रखकर महापौर के रिश्तेदारों को ठेके दिए। यह स्पष्ट रूप से भ्रष्टाचार का मामला है और इसमें बड़े पैमाने पर वित्तीय अनियमितताएं हो सकती हैं। ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या हरेन्द्र नारायण ने जानबूझकर यह काम किया?
तत्काल कार्रवाई की मांग
शिकायतकर्ता ने शासन से अपील है कि वे महापौर को तुरंत इस्तीफा देने का निर्देश दें और नगर निगम आयुक्त हरेन्द्र नारायण को उनके पद से हटाएं। इसके साथ ही इस पूरे ठेके में वित्तीय अनियमितताओं की जांच के लिए ईओडब्ल्यू (EOW) को कार्रवाई करने का आदेश दें। इस भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए पूरी तरह से पारदर्शिता की आवश्यकता है।
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इंदौर में भी गलत तरीके से नियुक्ति का मामला...
बता दें कि इंदौर नगर निगम में भी इसी तरह से गलत तरीके से नियुक्ति का मामला सामने आया था। जिसमें आरोप है कि अधिकारियों ने एक संविदा सिविल इंजीनियर को नियमित पद पर नियुक्त किया और उसे कई अधिकार दिए। सहायक इंजीनियर देवेश कोठारी पर आरोप है कि उन्होंने संविदा सेवक होने के बावजूद भवन अधिकारी के रूप में 250 नक्शे अवैध रूप से डिजिटल हस्ताक्षर के जरिए पास किए।
पूर्व पार्षद ने लोकायुक्त में कराई थी शिकायत दर्ज
पूर्व पार्षद दिलीप कौशल ने लोकायुक्त में शिकायत दर्ज कराई थी, जिसमें उन्होंने बताया कि देवेश कोठारी ने जोन क्रमांक 13 में भवन अधिकारी के पद पर रहते हुए कई नियमों का उल्लंघन किया। आरोप है कि उन्होंने अवैध निर्माण को नजरअंदाज किया और बिल्डरों से पैसे कमाए। इसके अलावा, किसी भी भवन से अवैध निर्माण हटाने की कोई कार्रवाई नहीं की गई। इसको लेकर इंदौर लोकायुक्त ने पूर्व नगर निगम आयुक्त हर्षिका सिंह और स्मार्ट सिटी सीईओ दिव्यांक सिंह के खिलाफ जांच के लिए प्रकरण दर्ज किया है।
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