राजधानी में कुत्तों की नसबंदी के लिए बजट हुआ डबल, करीब 4 करोड़ होंगे खर्च
Amresh Kushwaha | Jun 10, 2026, 13:25 IST
कुत्तों की नसबंदी
भोपाल में आवारा कुत्तों की नसबंदी के नए टेंडर में बजट दोगुना और काम का लक्ष्य आधा करने पर गंभीर सवाल उठे हैं। इस रिपोर्ट में जानें नियमों में हुए बड़े बदलावों का पूरा सच...
मध्यप्रदेश की राजधानी में आवारा कुत्तों की आबादी पर लगाम लगाने के सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच एक बड़ा विरोधाभास सामने आया है। नगर निगम के जरिए मार्च 2026 में जारी किए गए आवारा कुत्तों की नसबंदी और एंटी-रेबीज टीकाकरण के नए टेंडर ने हलचल तेज कर दी है।
एक तरफ जहां आवारा कुत्तों का आतंक जस का तस है, वहीं दूसरी तरफ इस नए कॉन्ट्रैक्ट के तहत बजट को सीधे दोगुना से भी ज्यादा कर दिया गया है। चौंकाने वाली बात यह है कि काम के लक्ष्य को आधा कर दिया गया है। आइए समझते हैं कि इस नए टेंडर में ऐसा क्या है, जिस पर सवाल उठने शुरू हो गए हैं।
साल 2019 में जिस काम के लिए एक करोड़ 60 लाख रुपए का बजट आवंटित होता था। वहीं, इस साल 2026 में उसी काम का सालाना बजट बढ़ाकर तीन करोड़ 91 लाख रुपए कर दिया गया है। इतना ही नहीं, ठेके की अवधि को भी 12 महीने से बढ़ाकर सीधे 24 महीने (2 साल) कर दिया गया है। इसका सीधा मतलब यह है कि दो साल के भीतर जनता की गाढ़ी कमाई के करीब आठ करोड़ रुपए इस प्रोजेक्ट पर खर्च किए जाएंगे।
वहीं, असली पेंच इसके लक्ष्य में है। जहां पहले हर केंद्र पर प्रतिदिन न्यूनतम 40 कुत्तों की नसबंदी का लक्ष्य था, उसे इस नए टेंडर में घटाकर आधा यानी सिर्फ 20 कुत्ते प्रतिदिन कर दिया गया है। यानी बजट डबल और काम आधा!
2019 और 2026 के नियमों की तुलना करें तो एक बहुत बड़ा बदलाव एजेंसियों की जिम्मेदारी में देखने को मिलता है। साल 2019 के टेंडर में ठेका लेने वाली संस्था को खुद गली-मोहल्लों से कुत्तों को पकड़ना, जाल डालकर सुरक्षित सेंटर तक लाना और नसबंदी व इलाज के बाद उन्हें वापस उसी स्थान पर छोड़ना होता था।
वहीं, साल 2022-23 के बाद इस नियम को बदल दिया गया था। अब नए टेंडर के मुताबिक, कुत्ते पकड़ने की गाड़ियां, जाल और लेबर (श्रमिकों) का पूरा खर्च खुद भोपाल नगर निगम उठाएगा। बाहरी संस्थाओं को सिर्फ बने-बनाए सेंटरों में बैठकर नसबंदी और सर्जरी का काम करना होगा।
नए टेंडर के नियमों में एक और दिलचस्प क्लॉज जोड़ा गया है। एनिमल वेलफेयर बोर्ड ऑफ इंडिया की अनुशंसा का हवाला देते हुए साफ लिखा गया है कि कोई भी संस्था 1450 रुपए प्रति कुत्ता से कम की बोली नहीं लगा सकती।
नगर निगम के अधिकारियों का तर्क है कि यह दर एक्सपर्ट कमेटी की सिफारिश पर तय की गई है। वहीं, बड़ा सवाल यह उठता है कि जब न्यूनतम दर पहले से ही फिक्स कर दी गई है, तो टेंडर प्रक्रिया में प्रतिस्पर्धी बोली की गुंजाइश ही कितनी बची?
इस पूरे मामले में पारदर्शिता को लेकर कई सवाल खड़े हो रहे हैं, जिनका जवाब मिलना बाकी है:
बदलाव सिर्फ बजट और गाड़ियों तक सीमित नहीं है। साल 2019 के नियमों के मुताबिक, हर नसबंदी केंद्र पर कम से कम चार पशु चिकित्सक तैनात करना अनिवार्य था। इसे अब घटाकर सिर्फ दो कर दिया गया है।
इसके अलावा, अनुभव के नियमों में भी बड़ा खेल हुआ है। साल 2019 के टेंडर में देश के किसी भी स्थानीय निकाय का अनुभव मान्य था। वहीं, 2026 के नए टेंडर में शर्त रख दी गई कि संस्था के पास मध्य प्रदेश के ही निकायों में न्यूनतम तीन वर्ष का अनुभव और 20 हजार कुत्तों की नसबंदी का रिकॉर्ड होना चाहिए। इस एक शर्त ने राज्य के बाहर की कई बड़ी और अनुभवी संस्थाओं को रेस से बाहर कर दिया है।
इस टेंडर प्रक्रिया में कुल चार संस्थाओं ने हिस्सा लिया था:
फिलहाल मामला वित्तीय मूल्यांकन के स्तर पर है और अधिकारी रेट चार्ट की बारीकी से जांच कर रहे हैं। सूत्रों की मानें तो तीनों पात्र संस्थाओं को एक-एक सेंटर बांटने की तैयारी चल रही है।
इन तमाम सवालों और आरोपों पर टेंडर जारी करने वाले वेटनरी ऑफिसर डॉ. पीपी सिंह का पक्ष भी सामने आया है। उन्होंने सभी आरोपों को खारिज करते हुए कहा टेंडर की शर्तों में किसी भी तरह की मनमानी नहीं की गई है। पूरी प्रक्रिया पूरी तरह नियमानुसार है।
उन्होंने कहा कि पहले शहर में सिर्फ एक सेंटर पर चार डॉक्टर तैनात थे, जबकि अब तीन अलग-अलग सेंटर संचालित किए जा रहे हैं। ऐसे में प्रत्येक सेंटर के लिए दो डॉक्टर पूरी तरह पर्याप्त हैं। यदि हम डॉक्टरों की संख्या बढ़ाते हैं, तो नसबंदी और टीकाकरण की संख्या भी बढ़ानी होगी। वहीं, इसके लिए नगर निगम की क्षमता भी तो वैसी होनी चाहिए। फिलहाल हमारे तीनों सेंटरों की क्षमता 250-250 कुत्तों को रखने की है।
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CBI ने डेली बेसिस कर्मियों से लेकर कुत्तों की नसबंदी तक का रिकॉर्ड, कैंट बोर्ड कार्यालय में चल रही CBI की जांच
एक तरफ जहां आवारा कुत्तों का आतंक जस का तस है, वहीं दूसरी तरफ इस नए कॉन्ट्रैक्ट के तहत बजट को सीधे दोगुना से भी ज्यादा कर दिया गया है। चौंकाने वाली बात यह है कि काम के लक्ष्य को आधा कर दिया गया है। आइए समझते हैं कि इस नए टेंडर में ऐसा क्या है, जिस पर सवाल उठने शुरू हो गए हैं।
बजट डबल, काम का टारगेट आधा!
वहीं, असली पेंच इसके लक्ष्य में है। जहां पहले हर केंद्र पर प्रतिदिन न्यूनतम 40 कुत्तों की नसबंदी का लक्ष्य था, उसे इस नए टेंडर में घटाकर आधा यानी सिर्फ 20 कुत्ते प्रतिदिन कर दिया गया है। यानी बजट डबल और काम आधा!
संस्थाओं को सिर्फ सर्जरी का मलाईदार काम!
वहीं, साल 2022-23 के बाद इस नियम को बदल दिया गया था। अब नए टेंडर के मुताबिक, कुत्ते पकड़ने की गाड़ियां, जाल और लेबर (श्रमिकों) का पूरा खर्च खुद भोपाल नगर निगम उठाएगा। बाहरी संस्थाओं को सिर्फ बने-बनाए सेंटरों में बैठकर नसबंदी और सर्जरी का काम करना होगा।
1450 रुपए से कम की बोली पर पाबंदी
नगर निगम के अधिकारियों का तर्क है कि यह दर एक्सपर्ट कमेटी की सिफारिश पर तय की गई है। वहीं, बड़ा सवाल यह उठता है कि जब न्यूनतम दर पहले से ही फिक्स कर दी गई है, तो टेंडर प्रक्रिया में प्रतिस्पर्धी बोली की गुंजाइश ही कितनी बची?
टेंडर की शर्तों पर उठते 6 गंभीर सवाल
- जब पहले पूरी जिम्मेदारी निजी एजेंसी की थी, तो अब कुत्ते पकड़ने और छोड़ने का अतिरिक्त खर्च निगम क्यों भुगत रहा है?
- नसबंदी का लक्ष्य प्रतिदिन 40 से घटाकर 20 करने के बावजूद बजट को 1.60 करोड़ से बढ़ाकर 3.91 करोड़ क्यों किया गया?
- प्रति कुत्ता 1450 रुपए की न्यूनतम दर तय करने के पीछे की असली मजबूरी क्या थी?
- टेंडर में सिर्फ मध्य प्रदेश का ही अनुभव और 20 हजार नसबंदी की कड़ी शर्त क्यों जोड़ी गई?
- हर नसबंदी केंद्र पर डॉक्टरों की संख्या को चार से घटाकर दो क्यों कर दिया गया?
- नियमों को इतना ढीला करने और शर्तें घटाने से आखिर किस खास संस्था को फायदा पहुंचाने की कोशिश हो रही है?
डॉक्टर आधे, बाहरी राज्यों की संस्थाएं रेस से बाहर!
इसके अलावा, अनुभव के नियमों में भी बड़ा खेल हुआ है। साल 2019 के टेंडर में देश के किसी भी स्थानीय निकाय का अनुभव मान्य था। वहीं, 2026 के नए टेंडर में शर्त रख दी गई कि संस्था के पास मध्य प्रदेश के ही निकायों में न्यूनतम तीन वर्ष का अनुभव और 20 हजार कुत्तों की नसबंदी का रिकॉर्ड होना चाहिए। इस एक शर्त ने राज्य के बाहर की कई बड़ी और अनुभवी संस्थाओं को रेस से बाहर कर दिया है।
तीन संस्थाएं रेस में, 28 अप्रैल को खुली फाइनेंशियल बिड!
- द केयर ऑफ एनिमल एंड सोसायटी (The Care of Animal and Society)
- मां बगुलामुखी सेवा समिति (Maa Bagulamukhi Seva Samiti)
- एनिमल केयर फाउंडेशन (Animal Care Foundation)
- नवोदय वेट सोसायटी (Navodaya Vet Society)
फिलहाल मामला वित्तीय मूल्यांकन के स्तर पर है और अधिकारी रेट चार्ट की बारीकी से जांच कर रहे हैं। सूत्रों की मानें तो तीनों पात्र संस्थाओं को एक-एक सेंटर बांटने की तैयारी चल रही है।
कोई मनमानी नहीं, सब नियमों के तहत है
उन्होंने कहा कि पहले शहर में सिर्फ एक सेंटर पर चार डॉक्टर तैनात थे, जबकि अब तीन अलग-अलग सेंटर संचालित किए जा रहे हैं। ऐसे में प्रत्येक सेंटर के लिए दो डॉक्टर पूरी तरह पर्याप्त हैं। यदि हम डॉक्टरों की संख्या बढ़ाते हैं, तो नसबंदी और टीकाकरण की संख्या भी बढ़ानी होगी। वहीं, इसके लिए नगर निगम की क्षमता भी तो वैसी होनी चाहिए। फिलहाल हमारे तीनों सेंटरों की क्षमता 250-250 कुत्तों को रखने की है।
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