महंगे इलाज से मिलेगी मुक्ति: कैंसर की 110 दवाएं 70% तक होंगी सस्ती, MP में हर साल बढ़ रहे हैं 80 हजार नए मरीज

Amresh Kushwaha | Oct 09, 2026, 08:35 IST
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कैंसर की दवाओं पर केंद्र का बड़ा फैसला।
कैंसर की दवाओं पर केंद्र का बड़ा फैसला।

कैंसर का इलाज कई परिवारों पर भारी आर्थिक बोझ डालता है। अब केंद्र सरकार ने कैंसर की दवाओं पर ट्रेड मार्जिन 30 फीसदी तक सीमित करने का फैसला किया है। इससे कैंसर की 110 दवाएं सस्ती हो सकती हैं। सरकार के अनुमान से मरीजों के सालाना 2500 करोड़ रुपए बचेंगे।

बता दें कि मध्यप्रदेश कैंसर मरीज भी हर साल 80 हजार से ज्यादा सामने आ रहे हैं। वहीं, केंद्र सरकार के इस फैसले से इन मरीजों को इलाज के लिए आर्थिक राहत मिल सकती है। नई व्यवस्था इसी महीने लागू हो सकती है।

कैंसर की 110 दवाएं होंगी सस्ती

नए फैसले से कैंसर की 110 दवाओं की कीमत घट सकती है। रिपोर्ट के मुताबिक कुछ दवाएं 70 फीसदी तक सस्ती हो सकती हैं। यह राहत सभी दवाओं पर बराबर होगी, ऐसा नहीं कहा गया है।

सरकार का अनुमान है कि इस फैसले से मरीजों के सालाना करीब 2500 करोड़ रुपए बचेंगे। नई व्यवस्था इसी महीने लागू हो सकती है। पर इसकी आधिकारिक तारीख अभी सामने नहीं आई है।

मान लीजिए किसी दवा का दाम काफी घट जाए। तब मरीज के परिवार का मासिक खर्च भी कम हो सकता है। वहीं, इसका असली असर दुकानों पर नई कीमत लागू होने के बाद दिखेगा।

ट्रेड मार्जिन क्या है?

दवा कंपनी अपनी दवा विक्रेता को बेचती है। विक्रेता वही दवा मरीज को बेचता है। दोनों कीमतों के बीच का फर्क विक्रेता का मुनाफा होता है। इसी को ट्रेड मार्जिन कहते हैं।

एक और शब्द अहम है। पीटीआर यानी खुदरा विक्रेता मूल्य (Price to Retailer) वह कीमत है, जिस पर विक्रेता को दवा मिलती है। कैंसर दवाओं के पीटीआर और एमआरपी के बीच भारी अंतर पर सवाल उठे थे। इन्हीं सवालों के बाद यह राहत मिलने जा रही है।

MP में कैंसर इलाज पर फंड का ग्रहण: 80 हजार मरीज बेहाल, सरकारी मशीनें बंकरों में कैद | Fund Crisis Halts Cancer Treatment in MP: 80,000 Patients Suffering, Govt Machines Stuck in Bunkers
फंड की कमी में फंसा कैंसर का इलाज: MP में हर साल 80 हजार मरीज बढ़ रहे, सरकारी मशीनें बंकरों में कैद
05 Oct 2026 ,
By Amresh Kushwaha
मध्यप्रदेश में हर साल करीब 80 हजार नए कैंसर मरीज सामने आ रहे हैं। कैंसर का इलाज अब भी निजी अस्पतालों पर टिका है। सरकारी मेडिकल कॉलेज में मार्च 2022 से लीनियर एक्सेलेरेटर लगाने की प्रक्रिया चली। चार साल बाद इंदौर, जबलपुर, रीवा और ग्वालियर में मशीनें पहुंचीं। जीएमसी भोपाल अब भी इंतजार में है। वजह फंड की कमी बताई जा रही है।
मध्यप्रदेश में हर साल करीब 80 हजार नए कैंसर मरीज सामने आ रहे हैं। कैंसर का इलाज अब भी निजी अस्पतालों पर टिका है। सरकारी मेडिकल कॉलेज में मार्च 2022 से लीनियर एक्सेलेरेटर लगाने की प्रक्रिया चली। चार साल बाद इंदौर, जबलपुर, रीवा और ग्वालियर में मशीनें पहुंचीं। जीएमसी भोपाल अब भी इंतजार में है। वजह फंड की कमी बताई जा रही है।

2700 की दवा 27 हजार में?

इसी मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने 29 सितंबर को सख्त टिप्पणी की थी। कोर्ट ने कैंसर की सभी दवाओं पर एक समान 16 फीसदी मार्जिन की वकालत की। यह बात केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कही गई। कोर्ट ने कहा था, यह तो लूट है।

कोर्ट ने उदाहरण भी दिया थे। एक कैंसर दवा का एमआरपी 27 हजार रुपए है। पर खुदरा विक्रेताओं को वह दवा 2700 रुपए में मिलती है। यानी दोनों कीमतों में दस गुना का फर्क है।

पर सरकारी सूत्रों का कहना है कि मौजूदा फैसला अदालत के मामले से जुड़ा नहीं है। उनके मुताबिक इस पर 2019 से काम चल रहा है। इसलिए इसे अदालत की टिप्पणी का सीधा नतीजा नहीं माना जाना चाहिए।

साल 2019 में एनपीपीए (National Pharmaceutical Pricing Authority) ने 42 कैंसर दवाओं पर 30 फीसदी की सीमा लगाई थी। कर्नाटक हाईकोर्ट ने बाद में उस सीमा को बरकरार रखा था। अब यह सीमा बढ़ाकर 110 दवाओं पर लागू करने की बात है।

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कैंसर की एडवांस स्टेज में भी नेक्स्ट जनरेशन सीक्वेंसिंग यानी NGS तकनीक नई उम्मीद बन रही है। यह जीन म्यूटेशन का पता लगाकर सटीक इलाज करती है। एक्सपर्ट के मुताबिक इससे साइड इफेक्ट कम होते हैं और मरीजों की उम्र बढ़ती है। जानिए यह प्रिसिजन मेडिसिन कैसे काम करती है और इसके क्या फायदे हैं।
कैंसर की एडवांस स्टेज में भी नेक्स्ट जनरेशन सीक्वेंसिंग यानी NGS तकनीक नई उम्मीद बन रही है। यह जीन म्यूटेशन का पता लगाकर सटीक इलाज करती है। एक्सपर्ट के मुताबिक इससे साइड इफेक्ट कम होते हैं और मरीजों की उम्र बढ़ती है। जानिए यह प्रिसिजन मेडिसिन कैसे काम करती है और इसके क्या फायदे हैं।

35 पेटेंट वाली दवाएं

कैंसर की दवाओं में 35 दवाएं पेटेंट वाली हैं। पेटेंट का मतलब होता है किसी कंपनी को दवा बनाने और बेचने का खास अधिकार। ऐसी दवाएं आमतौर पर ज्यादा महंगी होती हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक एक समिति इस पर काम करेगी। वह ब्रांडेड और जेनरिक दवाओं की सूची तय करेगी। घरेलू और आयातित दवाओं की सूची और कीमतें भी वही तय करेगी। संशोधित दरें अस्पतालों में भी लागू होंगी।

मध्यप्रदे में कैंसर के मरीज

मध्यप्रदेश में 2025 में कैंसर के 88 हजार 297 नए मामले सामने आए थे। ये आंकड़े केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने लोकसभा में रखे थे। साल 2021 में अनुमानित मामले 79 हजार 871 थे। यानी पांच साल में करीब 8400 की बढ़ोतरी हुई है।

इसी साल प्रदेश में कैंसर से 48 हजार 694 मौतें हुई हैं। इसका मतलब है कि हर दिन औसतन 133 लोगों की जान गई है। नए मरीजों के मामले में प्रदेश देश के टॉप 10 राज्यों में है। मौतों में वह सातवें नंबर पर है।

ऐसे में दवाओं की कीमत घटना खास मायने रखता है। खासकर उन परिवारों के लिए, जिन पर इलाज का खर्च भारी पड़ता है।

मरीजों को कितना फायदा?

सरकार का अनुमान है कि मरीजों के सालाना करीब 2500 करोड़ रुपए बचेंगे। यह अनुमान केंद्र सरकार का है। असली फायदा इस पर टिका है कि दुकानों पर नई कीमतें कब दिखेंगी। साथ ही यह देखना होगा कि 110 दवाओं में कौन सी दवाएं शामिल हैं। जब तक सूची सामने नहीं आती, तब तक किसी दवा के बारे में पक्का दावा करना ठीक नहीं होगा।

अब आगे क्या होगा?

फिलहाल सबकी नजर नई व्यवस्था की अधिसूचना पर है। अभी 110 दवाओं की सूची आना बाकी है। कीमतें किस तारीख से घटेंगी, यह भी साफ नहीं है।

जिन मरीजों का इलाज चल रहा है, वे अपने डॉक्टर और विक्रेता से नई कीमत पूछ सकते हैं। दवा बंद करने या बदलने का फैसला खुद न लें। यह फैसला हमेशा डॉक्टर की सलाह से ही करें।

FAQs

  1. कैंसर की कितनी दवाएं सस्ती हो सकती हैं?
    केंद्र के फैसले से कैंसर की 110 दवाओं की कीमतें घटने की उम्मीद है। रिपोर्ट के मुताबिक कुछ दवाएं 70 फीसदी तक सस्ती हो सकती हैं। यह सभी दवाओं पर बराबर लागू होगा, ऐसा नहीं बताया गया है।
  2. ट्रेड मार्जिन क्या है और नया नियम क्या है?
    ट्रेड मार्जिन कंपनी से खुदरा बिक्री तक होने वाला मुनाफा है। नए फैसले में इसे अधिकतम खुदरा मूल्य यानी एमआरपी के 30 फीसदी तक सीमित किया गया है। नई व्यवस्था इसी महीने लागू हो सकती है।
  3. मध्य प्रदेश में कैंसर के कितने मरीज बढ़ रहे हैं?
    2025 में प्रदेश में कैंसर के 88,297 नए मामले आए। साल 2021 में अनुमानित मामले 79,871 थे। इसी साल कैंसर से 48,694 मौतें हुईं, यानी रोज औसतन 133 मौतें।
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