फंड की कमी में फंसा कैंसर का इलाज: MP में हर साल 80 हजार मरीज बढ़ रहे, सरकारी मशीनें बंकरों में कैद
Amresh Kushwaha | Oct 05, 2026, 11:05 IST
MP में सरकारी सुस्ती से कैंसर मरीजों की बढ़ रही मुश्किलें
मध्यप्रदेश में हर साल करीब 80 हजार नए कैंसर मरीज सामने आ रहे हैं। कैंसर का इलाज अब भी निजी अस्पतालों पर टिका है। सरकारी मेडिकल कॉलेज में मार्च 2022 से लीनियर एक्सेलेरेटर लगाने की प्रक्रिया चली। चार साल बाद इंदौर, जबलपुर, रीवा और ग्वालियर में मशीनें पहुंचीं। जीएमसी भोपाल अब भी इंतजार में है। वजह फंड की कमी बताई जा रही है।
मध्य प्रदेश के कैंसर मरीज (Madhya Pradesh cancer patients) इस देरी की मार झेल रहे हैं। सरकारी विकल्प कम हैं और कैंसर का इलाज निजी अस्पतालों में महंगा है। जिन अस्पतालों में मशीन पहुंची, वहां भी इलाज शुरू होने में समय लगेगा।
एमपी में हर साल करीब 80 हजार नए कैंसर मरीज जुड़ रहे हैं। इलाज के लिए इन मरीजों की निर्भरता महंगे निजी अस्पतालों पर है।
आईसीएमआर (Indian Council of Medical Research) के आंकड़ों में भी यही तस्वीर है। ये आंकड़े एनसीआरपी (National Cancer Registry Programme) के हैं। राज्य में 2020 में नए कैंसर मामलों की संख्या 77 हजार 888 थी। साल 2026 में यह 85 हजार अनुमानित है।
लीनियर एक्सेलेरेटर मशीन को संक्षेप में लिनेक कहते हैं। यह हाई-एनर्जी एक्स-रे या इलेक्ट्रॉन बीम (बीम यानी किरणों की पतली धार) का इस्तेमाल करती है। इनसे ट्यूमर (कैंसर की गांठ) को ज्यादा सटीकता से निशाना बनाया जाता है। आसपास के स्वस्थ ऊतकों (टिश्यू) पर रेडिएशन (विकिरण यानी तेज किरणें) का असर कम होता है।
भोपाल में अभी सरकारी क्षेत्र में सिर्फ AIIMS Bhopal में यह सुविधा है। चार से पांच निजी अस्पतालों में भी यह उपलब्ध है।
अब जरा पीछे चलते हैं, साल 2022 में।
फरवरी 2022 में राज्यसभा में सरकार का जवाब आया था। उसके मुताबिक प्रदेश के किसी राज्य संचालित सरकारी अस्पताल में लीनियर एक्सेलेरेटर नहीं था। अपवाद सिर्फ एम्स भोपाल (All India Institute of Medical Sciences) था।
तब सरकार ने राज्य में नई लिनेक मशीनें लगाने की योजना बताई थी। मार्च 2022 में सरकारी मेडिकल कॉलेजों में इसकी प्रक्रिया शुरू हुई थी। साल 2023 में पांच मेडिकल कॉलेजों में मशीन लगाने की घोषणा हुई थी।
2024 में खरीद के लिए टेंडर (सरकारी खरीद की बोली) निकला था। स्वास्थ्य विभाग ने अप्रैल 2026 तक मेडिकल कॉलेजों को खरीद आदेश नहीं दिए थे। सितंबर 2026 में इंदौर, जबलपुर, रीवा और ग्वालियर में मशीनें पहुंचीं।
यानी जरूरत सामने आने के चार साल बाद मशीनें पहुंचीं।
तो भोपाल क्यों पीछे रह गया? जीएमसी भोपाल (Gandhi Medical College) को अब तक मशीन नहीं मिली है। बताया जा रहा है कि फंड उपलब्ध नहीं है। जबकि अस्पतालों में इस मशीन के बंकर (मशीन रखने का खास सुरक्षित कमरा) तैयार हो चुके हैं।
यानी मामला अब बजट और सरकार के फैसले पर टिका है।
क्या मशीन पहुंचते ही इलाज शुरू हो जाता है? ऐसा नहीं होता। पहले मशीन को जोड़ा जाता है। फिर तकनीकी जांच और कैलिब्रेशन (मशीन की सटीकता जांचना) होता है। जरूरी सुरक्षा मंजूरियां भी चाहिए। इसके बाद ही मरीजों पर इस्तेमाल हो सकेगा।
जबलपुर में छह महीने और लगेंगे। अनुमान है कि तब मशीन पूरी तरह चालू होगी।
एक मशीन की कीमत करीब 46.7 करोड़ रुपए है। तुलना के लिए निजी इलाज को 20 हजार रुपए मानें। तब यह रकम करीब 23 हजार इलाज के बराबर है।
कैंसर के इलाज (Cancer treatment) का खर्च निजी अस्पतालों में काफी ज्यादा है। निजी अस्पताल में एक बार का इलाज 20 से 25 हजार रुपए का है। सरकारी अस्पताल में यही खर्च सिर्फ पांच से छह हजार रुपए है। यानी फर्क करीब चार गुना तक है।
सोचिए, एक आम परिवार के लिए 20 हजार रुपए कितना बड़ा खर्च है।
कैंसर मरीजों की परेशानी सिर्फ इलाज के खर्च तक सीमित नहीं है। बाहर इलाज कराने जाएं तो आने-जाने, ठहरने और खाने का खर्च अलग लगता है। साथ जाने वाले परिजन का खर्च भी इसमें जुड़ता है।
एम्स भोपाल पर पहले से मरीजों का बहुत दबाव है। जीएमसी भोपाल में सुविधा शुरू होने से मरीजों को सहूलियत मिल सकती है।
अब सबकी नजर सरकार के फैसले पर है। डीन ने जल्द निर्णय की बात कही है।
कैंसर का इलाज महंगा होने पर परिवार कर्ज और परेशानी में फंस सकते हैं। सरकारी सुविधा आने में देरी हो तो बोझ मरीजों पर आता है। सुप्रीम कोर्ट ने स्वास्थ्य को इसी अधिकार का हिस्सा माना है। पाठकों के लिए जरूरी है कि वे सरकार की जवाबदेही और अपने अधिकार समझें।
मध्य प्रदेश में कैंसर मरीज कितने हैं?
आईसीएमआर (Indian Council of Medical Research) के आंकड़ों में भी यही तस्वीर है। ये आंकड़े एनसीआरपी (National Cancer Registry Programme) के हैं। राज्य में 2020 में नए कैंसर मामलों की संख्या 77 हजार 888 थी। साल 2026 में यह 85 हजार अनुमानित है।
लीनियर एक्सेलेरेटर क्या है?
भोपाल में अभी सरकारी क्षेत्र में सिर्फ AIIMS Bhopal में यह सुविधा है। चार से पांच निजी अस्पतालों में भी यह उपलब्ध है।
सरकारी मेडिकल कॉलेज में देरी क्यों?
फरवरी 2022 में राज्यसभा में सरकार का जवाब आया था। उसके मुताबिक प्रदेश के किसी राज्य संचालित सरकारी अस्पताल में लीनियर एक्सेलेरेटर नहीं था। अपवाद सिर्फ एम्स भोपाल (All India Institute of Medical Sciences) था।
तब सरकार ने राज्य में नई लिनेक मशीनें लगाने की योजना बताई थी। मार्च 2022 में सरकारी मेडिकल कॉलेजों में इसकी प्रक्रिया शुरू हुई थी। साल 2023 में पांच मेडिकल कॉलेजों में मशीन लगाने की घोषणा हुई थी।
2024 में खरीद के लिए टेंडर (सरकारी खरीद की बोली) निकला था। स्वास्थ्य विभाग ने अप्रैल 2026 तक मेडिकल कॉलेजों को खरीद आदेश नहीं दिए थे। सितंबर 2026 में इंदौर, जबलपुर, रीवा और ग्वालियर में मशीनें पहुंचीं।
यानी जरूरत सामने आने के चार साल बाद मशीनें पहुंचीं।
जीएमसी भोपाल क्यों रह गया खाली?
बजट पर क्या बोलीं जीएमसी डीन?
"इस संबंध में सरकार से बातचीत की जा रही है। बजट को लेकर वरिष्ठ अधिकारियों से चर्चा की जा रही है। जल्द ही इस संबंध में निर्णय किया जाएगा।"
By: – डॉ. कविता एन सिंह, डीन, जीएमसी भोपाल
इलाज शुरू होने में कितना समय?
जबलपुर में छह महीने और लगेंगे। अनुमान है कि तब मशीन पूरी तरह चालू होगी।
एक मशीन की कीमत करीब 46.7 करोड़ रुपए है। तुलना के लिए निजी इलाज को 20 हजार रुपए मानें। तब यह रकम करीब 23 हजार इलाज के बराबर है।
कैंसर का इलाज कितना महंगा?
सोचिए, एक आम परिवार के लिए 20 हजार रुपए कितना बड़ा खर्च है।
कैंसर मरीजों की परेशानी क्या है?
एम्स भोपाल पर पहले से मरीजों का बहुत दबाव है। जीएमसी भोपाल में सुविधा शुरू होने से मरीजों को सहूलियत मिल सकती है।
अब सबकी नजर सरकार के फैसले पर है। डीन ने जल्द निर्णय की बात कही है।
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