देवी-देवताओं के नाम पर बलि प्रथा को लेकर बोले धीरेंद्र शास्त्री-एक मां बेटे की बलि कैसे ले सकती है?
Aman Vaishnav | Sept 10, 2026, 14:55 IST
धीरेंद्र शास्त्री का बयान
बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर पं. धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने देवी-देवताओं के नाम पर होने वाली बलि प्रथा पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि जो मां अपने बच्चों की रक्षा करती है, वह बेटे की बलि कैसे ले सकती है? अगर मां दुर्गा को बलि चाहिए होगी, तो वह खुद ले लेंगी।
बलि प्रथा पर बोले शास्त्री...
शास्त्री ने कहा कि अगर मां दुर्गा को खुद बलि लेनी होगी तो वे खुद ले लेंगी। किसी और को यह अधिकार नहीं है। उनका कहना था कि हर जीव को जीने का हक है।
धीरेंद्र शास्त्री ने साफ किया कि यह उनका निजी मत है। उन्होंने कहा, हमें बलि प्रथा अच्छी नहीं लगती। हो सकता है किसी और को अच्छी लगे। यह हर व्यक्ति की अपनी सोच है।
बंगाल विवाद पर सफाई
बागेश्वर धाम धीरेंद्र कृष्ण शास्त्रीने पूजा पंडालों के आसपास मांस-मछली की बिक्री और सेवन रोकने की अपील की थी। साथ ही मांसाहार करने वालों को पाखंडी भी कह दिया था। इसी शब्द ने विवाद खड़ा कर दिया।
बयान के बाद उनके खिलाफ पुलिस में शिकायत भी दर्ज कराई गई। भाजपा और कांग्रेस समेत कई नेताओं ने इसका विरोध किया।
ग्लासगो में शास्त्री ने इस पूरे मामले पर सफाई दी। उन्होंने कहा कि उनकी बातों का गलत अर्थ निकाला गया। उन्होंने बताया कि वे खुद बंगाली हैं।
शास्त्री ने कहा कि वे स्वामी विवेकानंद, रामकृष्ण परमहंस और बामाखेपा को मानने वाले हैं। यानी बंगाल की परंपरा से उनका गहरा जुड़ाव है।
किसी के खाने पर रोक नहीं
कथावाचक धीरेंद्र शास्त्रीने कहा कि जिन्हें मांस खाना है, वे अपने घर पर खाएं। किसी के भोजन या जीने के तरीके पर रोक लगाना उनका काम नहीं है।
साथ ही उन्होंने यह भी जोड़ा कि एक धार्मिक गुरु होने के नाते वे जीव हिंसा और बलि प्रथा के खिलाफ जरूर बोलेंगे। उनका विरोध व्यक्तिगत खान-पान से नहीं, बल्कि बलि प्रथा से है।
भाजपा नेता ने भी दी प्रतिक्रिया
उनका कहना था कि किसी बाहरी धार्मिक या राजनीतिक व्यक्ति को यह तय करने का अधिकार नहीं है कि लोग क्या खाएं या क्या पहनें। उन्होंने यह भी बताया कि बंगाल में मां काली को बकरे के मांस का भोग भी लगाया जाता है।
बंगाल में बलि प्रथा की परंपरा
हालांकि यह हर दुर्गा पूजा पंडाल में होने वाली अनिवार्य परंपरा नहीं है। कई जगहों पर पशु बलि की जगह कद्दू या दूसरी वस्तुओं की प्रतीकात्मक बलि दी जाती है।
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