कभी कांग्रेस की धुरी थे दिग्विजय सिंह, क्या अब अपनी ही पार्टी में हाशिए पर हैं?

Ravi Kant Dixit | Jun 16, 2026, 10:44 IST
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दिग्विजय सिंह
दिग्विजय सिंह

क्या मध्यप्रदेश कांग्रेस में खत्म हो रहा दिग्विजय सिंह का दौर? प्रेस कॉन्फ्रेंस में सरेआम टोकने से लेकर नई पीढ़ी को आगे लाने की रणनीति तक इन 5 बड़े घटनाक्रमों से आसानी से समझिए कि कैसे पार्टी में सत्ता का केंद्र बदल रहा है।

भोपाल. क्या मध्यप्रदेश कांग्रेस में सब कुछ सामान्य है? यदि हाल के घटनाक्रमों, नेताओं के बयानों और पार्टी के भीतर पैदा हुई परिस्थितियों को जोड़कर देखा जाए, तो तस्वीर कुछ और ही कहानी कहती है।

यह दास्तां किसी सामान्य नेता की नहीं, बल्कि उस शख्स की है, जिसने एक दशक तक मध्यप्रदेश की सत्ता संभाली। संगठन को खड़ा किया। हजारों कार्यकर्ताओं की फौज तैयार की। साथ ही लंबे अरसे तक कांग्रेस की राजनीति का सबसे प्रभावशाली चेहरा बना रहा। यह कहानी है दिग्विजय सिंह की।

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मध्यप्रदेश कांग्रेस में एक समय ऐसा था, जब दिग्विजय सिंह की सहमति के बिना कोई बड़ा राजनीतिक फैसला सोचना भी मुश्किल होता था। आज वही दिग्विजय सिंह अपनी ही पार्टी के भीतर लगातार ऐसे घटनाक्रमों के केंद्र में दिखाई दे रहे हैं, जो यह संकेत दे रहे हैं कि उनका राजनीतिक प्रभाव पहले जैसा नहीं रह गया है।

सवाल यह है कि क्या कांग्रेस में नेतृत्व परिवर्तन की प्रक्रिया के बीच दिग्विजय सिंह धीरे-धीरे हाशिए पर धकेले जा रहे हैं। या फिर यह केवल परिस्थिति जन्य घटनाएं हैं?

द सूत्र के इस एक्सप्लेनर में सिलसिलेवार तरीके से जानें पूरा मामला...

एक प्रेस कॉन्फ्रेंस, जिसने खड़े किए सवाल?

हाल ही में एक विवाद राज्यसभा चुनाव के दौरान सामने आया है। मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द होने के बाद कांग्रेस ने अपना पक्ष रखने और डैमेज कंट्रोल के लिए प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई थी। इसका मकसद विवाद को शांत करना था लेकिन नतीजा बिल्कुल उल्टा निकला।

प्रेस कॉन्फ्रेंस के बीच दिग्विजय सिंह ने मीनाक्षी का नामांकन पत्र भरवाने वाले जेपी धनोपिया से मीडिया के सामने कुछ स्पष्टीकरण देने के लिए कहा।

इसी दौरान उनके पास में बैठे प्रदेश प्रभारी हरीश चौधरी ने उन्हें बीच में रोकते हुए कहा, हम कर लेंगे। यह बात भले छोटी थी, पर उसके राजनीतिक मायने बड़े निकाले गए।

कैमरों के सामने दिग्विजय सिंह स्पष्ट रूप से असहज दिखाई दिए। उन्होंने हाथ जोड़कर जवाब दिया और माहौल अचानक बदल गया।

मामला यहीं नहीं रुका। इसके बाद प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने स्थिति संभालने की कोशिश की। उन्होंने दिग्विजय सिंह से मीडिया के सामने अपनी बात रखने का अनुरोध किया, पर दिग्विजय ने नाराजगी भरे अंदाज में बोलने से इनकार कर दिया।

इस घटनाक्रम का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ। भाजपा नेताओं ने इसे कांग्रेस की अंदरूनी लड़ाई का नया उदाहरण बताया। साथ ही कहा कि पार्टी में अभी भी सिर-फुटौव्वल का दौर जारी है।

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कार्यकर्ता भी खुलकर मैदान में उतरे

इस घटना का असर केवल सोशल मीडिया तक सीमित नहीं रहा। भोपाल में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने इसका विरोध किया। प्रदेश प्रभारी हरीश चौधरी का पुतला भी जलाया गया।

प्रदर्शन कर रहे कार्यकर्ताओं का कहना था कि सार्वजनिक मंच पर दिग्विजय के प्रति कथित रूप से प्रदर्शित असम्मानजनक व्यवहार ने उनकी भावनाओं को आहत किया है। उनका तर्क था कि मध्यप्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं का सम्मान बनाए रखना संगठन की जिम्मेदारी है।

बीजेपी ने क्या कहा...?

बीजेपी के प्रदेश प्रवक्ता हितेश वाजपेयी ने एक्स पर पोस्ट कर लिखा कि दिग्विजय सिंह निःसंदेह प्रदेश के 10 वर्ष मुख्यमंत्री रहे हैं। दिग्विजय कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हैं और राष्ट्रीय पटल पर कांग्रेस के मजबूत हस्ताक्षर भी हैं।

हितेश वाजपेयी ने कहा कि इस सबके बावजूद जिस प्रकार से हरीश चौधरी ने दिग्विजय का मीडिया के सामने मंच पर जो अपमान किया है, वह बहुत सस्ता व्यवहार उन्होंने किया है। वह निंदनीय है। किसी भी कीमत पर इसे मध्यप्रदेश द्वारा बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए।

वाजपेयी ने आगे लिखा कि मुझे लगता है कि कांग्रेस केंद्रीय नेतृत्व शीघ्र ही हरीश चौधरी और जीतू पटवारी को उनके इस घृणित व्यवहार को लेकर उनके पदों से मुक्त करेगा ऐसी खबरें आ रही हैं।

वाजपेयी ने लिखा यदि ऐसा होता है तो वाकई में यह ठीक होगा। क्योंकि हमारे चाहे जितने भी राजनीतिक मतभेदों के बावजूद भी दिग्विजय सिंह का इस प्रकार सार्वजनिक अपमान कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी हरीश चौधरी को नहीं करना था।

जब मंच से ही कहा: गुरु गुड़ रह गया, चेला शक्कर हो गया

हालिया विवाद कोई पहली घटना नहीं है। इससे पहले भी ऐसे अवसर आए हैं, जब दिग्विजय सिंह की टिप्पणियों को कांग्रेस के भीतर बदलते शक्ति संतुलन के संकेत के रूप में देखा गया है।

पिछले दिनों भोपाल में आयोजित बैठक के दौरान दिग्विजय ने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी पर तंज कसा था। दिग्विजय सिंह ने कहा था कि संगठन में जीतू की पकड़ उनसे ज्यादा मजबूत हो गई है। इसी क्रम में उन्होंने मंच से कहा था, गुरु गुड़ रह गया और चेला शक्कर हो गया।

तब बैठक में इसे हंसी-मजाक के रूप में लिया गया और ठहाके लगे, पर राजनीतिक गलियारों में इस बयान की अलग व्याख्या हुई। कई लोगों ने इसे कांग्रेस के भीतर बदलती शक्ति की सार्वजनिक स्वीकारोक्ति के रूप में बयां किया।

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दिग्विजय जाए भाड़ में...

जून 2025 में दिग्विजय सिंह का एक बयान काफी चर्चा में रहा था। उन्होंने कहा था कि दिग्विजय जाए भाड़ में कांग्रेस से जोड़ो। यह बयान उस समय आया था, जब जिला अध्यक्षों की नियुक्ति प्रक्रिया में उन्हें नजरअंदाज किए जाने की चर्चा चल रही थी।

दिग्विजय सिंह ने कहा था कि भाजपा से आए नेताओं को पद देने के बजाय पुराने और समर्पित कांग्रेस कार्यकर्ताओं को अवसर दिया जाना चाहिए। राजनीतिक विश्लेषकों ने इस बयान को सामान्य टिप्पणी नहीं माना।

कई जानकारों ने इसे दिग्विजय द्वारा अपनी घटती भूमिका की अप्रत्यक्ष स्वीकारोक्ति के रूप में देखा था।

बेटे को पद, पर समर्थकों ने इसे सम्मान नहीं माना

इसके बाद एक और घटनाक्रम ने राजनीतिक चर्चाओं को हवा दी। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने दिग्विजय सिंह के पुत्र और विधायक जयवर्धन सिंह को गुना का जिलाध्यक्ष नियुक्त किया। पहली नजर में यह संगठनात्मक निर्णय लग सकता था, लेकिन कांग्रेस के भीतर इसे अलग तरीके से देखा गया।

दिग्विजय समर्थकों के एक वर्ग ने सवाल उठाया कि जिस नेता ने दशकों तक पार्टी का नेतृत्व किया, उसे संगठन में बड़ी भूमिका देने के बजाय उसके बेटे को जिलाध्यक्ष बनाकर क्या संदेश दिया जा रहा है?

स्थिति इतनी बढ़ी कि राघौगढ़ में जीतू पटवारी का पुतला तक जलाया गया। खास बात यह रही कि यह विरोध दिग्विजय सिंह के राजनीतिक गढ़ में हुआ। वैसे आपको बता दें कि कमलनाथ सरकार में जयवर्धन सिंह कैबिनेट मंत्री भी रह चुके हैं।

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चुनाव नहीं लड़ने का फैसला चर्चा में

दिग्विजय सिंह ने इस बार स्वयं आगे आकर राज्यसभा चुनाव नहीं लड़ने का निर्णय लिया था। उन्होंने कहा था कि नए लोगों को अवसर मिलना चाहिए। राजनीतिक गलियारों में इस निर्णय को भी उनकी नाराजगी से जोड़कर देखा गया था।

हालांकि उनकी ओर से लगातार यही कहा गया कि यह फैसला संगठन में नई पीढ़ी को जगह देने की भावना से लिया गया है।

कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता के अनुसार, राहुल गांधी युवा नेतृत्व को आगे बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। इसी क्रम में दिग्विजय को संगठन मजबूत करने की जिम्मेदारी दी जा सकती है।

चर्चा यह भी है कि चुनावों से पहले वे एक और नर्मदा परिक्रमा कर सकते हैं, ताकि जमीनी स्तर पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाया जा सके।

जब RSS की तारीफ ने सबको चौंका दिया

दिग्विजय सिंह का राजनीतिक जीवन हमेशा तीखे बयानों और वैचारिक संघर्षों से जुड़ा रहा है। उन पर हिंदू आतंकवाद और भगवा आतंक जैसे शब्दों को लोकप्रिय बनाने के आरोप लगते रहे हैं।

राज्यसभा में अपने कार्यकाल के दौरान वे RSS और भाजपा के सबसे मुखर आलोचकों में शामिल रहे, लेकिन 2025 में उन्होंने भाजपा और RSS की संगठन क्षमता की तारीफ कर सबको चौंका दिया था।

हालांकि बाद में उन्होंने सफाई देते हुए कहा था कि वे RSS की विचारधारा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीतियों के सबसे कड़े आलोचकों में से एक हैं, लेकिन संगठन क्षमता को स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं है।

आखिर दिग्विजय क्यों कमजोर पड़ते दिख रहे हैं?

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, इसके पीछे कई कारण एक साथ काम कर रहे हैं।

पहला कारण: राहुल गांधी की नई पीढ़ी वाली रणनीति

राहुल गांधी लंबे समय से कांग्रेस में नई पीढ़ी को आगे लाने की बात कर रहे हैं। जीतू पटवारी, सचिन पायलट और ऐसे कई नेता इस रणनीति के प्रमुख चेहरे माने जाते हैं।

ऐसे में कमलनाथ और दिग्विजय सिंह जैसी पुरानी पीढ़ी के नेताओं की भूमिका स्वाभाविक रूप से सीमित होती दिखाई दे रही है।

दूसरा कारण: लगातार दो लोकसभा चुनाव हारना

2019 में भोपाल लोकसभा सीट से साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर के खिलाफ हार और 2024 में राजगढ़ से लगभग एक लाख 46 हजार वोटों से पराजय ने दिग्विजय सिंह की राजनीतिक साख को प्रभावित किया है।

राजनीति में चुनावी जीत ही सबसे बड़ी ताकत मानी जाती है। लगातार दो बड़ी हारों ने उनके प्रभाव को कम किया है।

तीसरा कारण: विवादित बयानों की लंबी छाया

RSS, हिंदुत्व और 26/11 जैसे मुद्दों पर दिए गए दिग्विजय सिंह के कई बयान वर्षों से विवादों में रहे हैं। कांग्रेस के भीतर भी एक वर्ग मानता है कि ऐसे बयान चुनावी राजनीति में पार्टी के लिए नुकसानदेह साबित होते हैं। इसी वजह से उनकी छवि को कई बार रिस्क फैक्टर के रूप में देखा गया।

चौथा कारण: जीतू पटवारी का उभार

जीतू पटवारी के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद मध्यप्रदेश कांग्रेस में शक्ति का नया केंद्र उभरता दिखाई दिया है। जिला अध्यक्षों की नियुक्ति से लेकर संगठनात्मक फैसलों तक, अब निर्णय प्रक्रिया का केंद्र बदलता नजर आ रहा है। इससे दिग्विजय सिंह के प्रभाव क्षेत्र पर असर पड़ना स्वाभाविक माना जा रहा है।

पांचवां कारण: हरीश चौधरी का आगमन

हरीश चौधरी के रूप में मध्यप्रदेश कांग्रेस का प्रभारी ऐसे नेता को बनाया गया है, जिसकी मध्यप्रदेश में कोई प्रत्यक्ष राजनीतिक जड़ नहीं है। दिग्विजय समर्थकों ने इसे भी अपने नेता की भूमिका कम करने के संकेत के रूप में देखा।

जब प्रेस कॉन्फ्रेंस में हरीश चौधरी ने सार्वजनिक रूप से दिग्विजय सिंह को बीच में टोका, तब यह असंतोष और खुलकर सामने आ गया।

अब बदल रहा है सत्ता का केंद्र!

1993 से 2003 तक लगातार दो बार मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे दिग्विजय सिंह ने 2003 की हार के बाद राजनीतिक वनवास का संकल्प लिया। फिर वापसी की और लंबे समय तक कांग्रेस की राजनीति के केंद्र में बने रहे। 2014 से राज्यसभा में उनकी सक्रिय मौजूदगी ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर का नेता बनाए रखा।

2023 के विधानसभा चुनाव के बाद शुरू हुई घटनाओं की श्रृंखला ने पहली बार एक सवाल खड़ा किया। क्या मध्यप्रदेश कांग्रेस में दिग्विजय सिंह की भूमिका अब पहले जैसी नहीं रह गई है?

फिलहाल कांग्रेस की ओर से ऐसा कोई संकेत नहीं दिया गया है कि दिग्विजय को संगठन से दूर किया जा रहा है, लेकिन प्रेस कॉन्फ्रेंस से लेकर संगठनात्मक नियुक्तियों तक जो तस्वीर उभर रही है, उसने यह बहस जरूर तेज कर दी है कि मध्यप्रदेश कांग्रेस में सत्ता और प्रभाव का केंद्र बदल रहा है।

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