सरकारी बंगलों का मोह क्यों नहीं छूटता? भोपाल के बाद अब ग्वालियर में सख्ती, खाली नहीं किया तो हर महीने बढ़ेगा किराया
Jitendra Shrivastava | Mar 14, 2026, 23:09 IST
Photograph: (thesootr)
सरकारी बंगलों को छोड़ने में अफसरों और नेताओं का मोह क्यों नहीं टूटता? ग्वालियर में भी अब यह सख्ती से लागू किया जाएगा। खाली न किया तो किराया बढ़ेगा।
BHOPAL. मध्यप्रदेश में सरकारी आवास की कहानी बड़ी दिलचस्प है। एक बार किसी नेता या अफसर को बंगला मिल जाए तो उसे छोड़ना आसान नहीं होता। तबादला हो जाए, रिटायरमेंट हो जाए या नई पोस्टिंग मिल जाए...इसके बाद भी कई लोग लंबे समय तक सरकारी बंगले में ही कब्जा जमाए रहते हैं।
इसी वजह से सरकार को बार-बार नियम सख्त करने पड़ते हैं। अभी तक ऐसे नियम मुख्य रूप से भोपाल में लागू थे, जहां सबसे ज्यादा सरकारी बंगले हैं। अब पहली बार ग्वालियर में इसी तरह की सख्ती लागू की गई है।
हालांकि, इस फैसले को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं, क्योंकि भोपाल और ग्वालियर के अलावा प्रदेश के बड़े शहर जैसे इंदौर, जबलपुर, उज्जैन, सागर, छिंदवाड़ा और सतना में अभी ऐसी व्यवस्था नहीं है।
सरकार का नियम बहुत सीधा है। मान लीजिए किसी अफसर को सरकारी बंगला मिला हुआ है। अगर उसका तबादला हो जाता है तो उसे बंगला खाली करने के लिए 6 महीने का समय दिया जाता है।
अगर छह महीने बाद भी बंगला खाली नहीं किया गया तो सातवें महीने से किराया बढ़ना शुरू हो जाता है। हर महीने 10 फीसदी किराया बढ़ता जाता है। सरकार की भाषा में इसे दंडात्मक किराया कहा जाता है। यानी जितनी देर तक बंगला खाली नहीं होगा, उतना ज्यादा किराया देना पड़ेगा।
अगर कोई अफसर नौकरी से रिटायर हो गया है तो उसे तीन महीने के भीतर बंगला खाली करना होता है। अगर तीन महीने के बाद भी वह बंगले में रहता है तो चौथे महीने से वही दंडात्मक किराया लागू हो जाता है। इसके बाद हर महीने 10 फीसदी की दर से किराया बढ़ता चला जाता है, जब तक बंगला खाली नहीं किया जाता।
अब तक यह व्यवस्था भोपाल में लागू थी। अब ग्वालियर में भी यही नियम लागू कर दिए गए हैं। ग्वालियर की आवास आवंटन समिति ने 17 फरवरी 2026 को हुई बैठक में यह फैसला लिया है। इसके मुताबिक 30 जनवरी 2026 से ये नियम ग्वालियर के सभी सरकारी आवासों पर लागू माने जाएंगे।
इस फैसले के बाद एक सवाल भी उठ रहा है। कुछ लोगों का कहना है कि अगर सरकार सख्ती करना चाहती है तो यह नियम सिर्फ भोपाल और ग्वालियर तक ही क्यों सीमित है। प्रदेश के दूसरे बड़े शहरों में भी सरकारी आवास हैं। ऐसे में वहां भी यही व्यवस्था लागू होनी चाहिए।
सरकारी बंगलों का किराया सामान्य आवासों की तुलना में बहुत कम होता है। इसी वजह से लोग इन्हें छोड़ना नहीं चाहते।
सरकारी बंगलों का मोह खत्म न होने की कई वजहें हैं। सबसे बड़ी वजह यह है कि ये बंगले आमतौर पर शहर के अच्छे इलाकों में होते हैं। जगह बड़ी होती है, आसपास हरियाली रहती है और सुरक्षा भी होती है।
दूसरी बात यह कि इतने बड़े और व्यवस्थित घर आम बाजार में इतने कम किराए में मिलना मुश्किल होता है। तीसरी वजह यह भी है कि जब तक कोई अफसर या नेता बंगले में रहता है, उसकी देखभाल सरकार की तरफ से होती रहती है। मरम्मत, सफाई और रखरखाव की चिंता भी नहीं रहती।
यही कारण है कि तबादले या रिटायरमेंट के बाद भी कई लोग सरकारी बंगला जल्दी छोड़ना नहीं चाहते। सरकार अब नियम सख्त कर रही है, ताकि जरूरतमंद अफसरों को समय पर आवास मिल सके और सरकारी संपत्ति का सही इस्तेमाल हो सके।
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इसी वजह से सरकार को बार-बार नियम सख्त करने पड़ते हैं। अभी तक ऐसे नियम मुख्य रूप से भोपाल में लागू थे, जहां सबसे ज्यादा सरकारी बंगले हैं। अब पहली बार ग्वालियर में इसी तरह की सख्ती लागू की गई है।
हालांकि, इस फैसले को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं, क्योंकि भोपाल और ग्वालियर के अलावा प्रदेश के बड़े शहर जैसे इंदौर, जबलपुर, उज्जैन, सागर, छिंदवाड़ा और सतना में अभी ऐसी व्यवस्था नहीं है।
ऐसे समझिए पूरा नियम
अगर छह महीने बाद भी बंगला खाली नहीं किया गया तो सातवें महीने से किराया बढ़ना शुरू हो जाता है। हर महीने 10 फीसदी किराया बढ़ता जाता है। सरकार की भाषा में इसे दंडात्मक किराया कहा जाता है। यानी जितनी देर तक बंगला खाली नहीं होगा, उतना ज्यादा किराया देना पड़ेगा।
रिटायरमेंट के बाद क्या होता है?
अब ग्वालियर में भी नियम लागू
इस फैसले के बाद एक सवाल भी उठ रहा है। कुछ लोगों का कहना है कि अगर सरकार सख्ती करना चाहती है तो यह नियम सिर्फ भोपाल और ग्वालियर तक ही क्यों सीमित है। प्रदेश के दूसरे बड़े शहरों में भी सरकारी आवास हैं। ऐसे में वहां भी यही व्यवस्था लागू होनी चाहिए।
सरकारी बंगलों का किराया कितना है
- बी-टाइप बंगला: 3000 रुपए महीना
- सी-टाइप बंगला: 2000 रुपए महीना
- डी-टाइप बंगला: 1800 रुपए महीना
- ई-टाइप बंगला: 1500 रुपए महीना
क्यों नहीं छूटता बंगलों का मोह
दूसरी बात यह कि इतने बड़े और व्यवस्थित घर आम बाजार में इतने कम किराए में मिलना मुश्किल होता है। तीसरी वजह यह भी है कि जब तक कोई अफसर या नेता बंगले में रहता है, उसकी देखभाल सरकार की तरफ से होती रहती है। मरम्मत, सफाई और रखरखाव की चिंता भी नहीं रहती।
यही कारण है कि तबादले या रिटायरमेंट के बाद भी कई लोग सरकारी बंगला जल्दी छोड़ना नहीं चाहते। सरकार अब नियम सख्त कर रही है, ताकि जरूरतमंद अफसरों को समय पर आवास मिल सके और सरकारी संपत्ति का सही इस्तेमाल हो सके।
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