एमपी में करोड़ों के अधूरे पुलों का पूरा भुगतान, ठेकेदार खुश, जनता परेशान

Sanjay Sharma | May 22, 2026, 19:28 IST
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MP incomplete bridges
MP incomplete bridges

MP में PWD के दर्जनों पुल 2 से 5 साल में भी अधूरे हैं, पर कार्यपालन यंत्रियों ने ठेकेदारों को 100% भुगतान कर दिया। नरसिंहपुर में 13.44 करोड़ का पुल 8 साल से अधूरा। रायसेन-नरसिंहपुर को जोड़ने वाला पुल सिर्फ पिलर पर अटका।

News in Short

  • एमपी में ठेकेदारों पर लोक निर्माण विभाग विभाग की मेहरबानी।
  • करोड़ों के पुल सालों से पड़े अधूरे, ठेकेदार को भुगतान किया पूरा।
  • कहीं पिलर तो कहीं स्पॉन डालकर निर्माण छोड़ भागा ठेकेदार।
  • PWD के अधिकारियों ने भौतिक सत्यापन बिना पास किए बिल।
  • अधूरे पुलों के पूरे भुगतान पर विभाग के अधिकारी साधे हैं चुप्पी।

News in Detail

मध्यप्रदेश में पुल अब कमाई के शानदार पुल बन गए हैं। लोक निर्माण विभाग PWD की दरियादिली से कहीं 2 साल तो कहीं 5 साल से पुलों का निर्माण अधूरा पड़ा है, लेकिन विभाग के कार्यपालन यंत्रियों ने ठेकेदारों को 100% भुगतान कर दिया है। नियम कहते हैं कि अंतिम भुगतान काम पूरा होने पर होता है, पर यहां आधे-अधूरे काम पर ही करोड़ों दे दिए गए। नरसिंहपुर जिले में ही 13.44 करोड़ का पुल 8 साल से और 6 करोड़ का पुल 7 साल से अधूरा है। कई जगह सिर्फ पिलर खड़े हैं, स्लैब और एप्रोच रोड का नामोनिशान नहीं। जनता आज भी नदी पार करने के लिए जान जोखिम में डाल रही है, जबकि ठेकेदारों की जेब भर चुकी है।

कैसे हुई दरियादिली

नियम कहते हैं कि भुगतान काम के अनुपात में होता है और फाइनल पेमेंट काम पूरा होने के बाद। पर यहां उल्टा हुआ। समय सीमा खत्म होने पर पेनल्टी लगाने की जगह विभाग ने समय बढ़ा दिया और साथ में पूरा पैसा भी दे दिया। कई जगह मटेरियल एडवांस और मोबिलाइजेशन एडवांस के नाम पर करोड़ों दे दिए गए। बाद में ठेकेदार काम छोड़कर भाग गए या धीमी गति से काम कर रहे हैं।

जनता को क्या नुकसान

पुल अधूरे होने से ग्रामीणों को 10-20 किमी घूमकर जाना पड़ता है। बारिश में नदी-नाले उफान पर होते हैं तो स्कूल, अस्पताल जाना बंद हो जाता है। कई जगह लोग जान जोखिम में डालकर अस्थाई लकड़ी के पुल या नाव से पार करते हैं। हादसे भी हो चुके हैं। दूसरी तरफ सरकारी खजाने से करोड़ों निकल गए और पुल कागजों में पूर्ण दिख रहे हैं।

जिम्मेदार कौन

PWD के कार्यपालन यंत्री से लेकर प्रमुख इंजीनियर तक की भूमिका सवालों के घेरे में है। वहीं सवाल यह भी उठता है कि ऐसे निर्माण के थर्ड पार्टी निरीक्षण के लिए एजेंसी को सालाना करोड़ों रुपए का भुगतान करने के बाद भी जिम्मेदारी तय क्यों नहीं की गई। बिना थर्ड पार्टी जांच के बिल कैसे पास हुए ? गुणवत्ता नियंत्रण शाखा उदासीन क्यों रही ? अधिकारियों ने SDO, SE, CE जैसे तकनीकी एक्सपर्ट की लापरवाही को अनदेखा क्यों किया ?

ये हैं एमपी में सालों से अधूरे पड़े पुल

केस 1: नरसिंहपुर तेंदूखेड़ा मार्ग पर सड़रई पुल

लागत 13.44 करोड़, 8 साल से अधूरा

नरसिंहपुर जिले की तेंदूखेड़ा तहसील में सड़रई और हीरापुर गांवों को जोड़ने वाला 13.44 करोड़ रुपये का सेतु पुल 2017-18 में शुरू हुआ था, पर 8 साल बाद भी अधूरा है। यह पुल नर्मदा पथ मार्ग का अहम हिस्सा है जो रायसेन और नरसिंहपुर जिलों को जोड़ता है। अब तक आधा काम भी पूरा नहीं हुआ। ग्रामीणों का आरोप है कि शासन-प्रशासन की अनदेखी और ठेकेदार की लापरवाही से काम ठप है। ठेकेदार बीच में काम छोड़कर सामान तक हटा ले गया।

केस 2: इमलिया- जैथारी मार्ग पर शक्कर बारू पुल

लागत 6.39 करोड़, 7 साल से अधूरा

नरसिंहपुर में ही 6 करोड़ का पुल 7 साल से अधूरा पड़ा है। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत शक्कर बारू नदी पर निर्माणाधीन पुल इमलिया और जैथारी गांवों को जोड़ेगा। इसे वर्ष 2020 में पूरा किया जाना था। ठेकेदार को लगभग 70% राशि का भुगतान किया जा चुका है लेकिन मौके पर काम आधा भी नहीं हुआ। इस वजह से अंचल के दर्जन भर गांवों के रहवासियों को कई किलोमीटर घूमकर या नदी के बहाव के बीच नाव से आना- जाना पड़ता है।

केस 3 गंज बसौदा- सिरोंज मार्ग बेतवा पुल

लागत 14 करोड़, 8 साल से अधूरा

बेतवा नदी पर गंजबासौदा- सिरोंज के अलावा अशोकनगर, गुना को जोड़ने वाला पुल 8 साल से अधूरा है। 2018 में स्वीकृति के बाद पहले लॉक डाउन, फिर मिट्टी परीक्षण सहित दूसरे तकनीकी कारण और बाद में निर्माण एजेंसी द्वारा काम रोकने से पुल का काम पूरा नहीं हो सका। अभी भी पुल के पिलर ही खड़े हो पाए हैं। इस वजह से बारिश में वाहनों को 10 से 15 किलोमीटर का चक्कर लगाना पड़ता है।

केस 4 खंडवा तीन पुलिया आरओबी

लागत 67 करोड़, 8 साल से अधूरा

खंडवा में तीन पुलिया रेलवे ओवर ब्रिज का निर्माण 2017 में शुरू हुआ था। पीडब्ल्युडी के ब्रिज कॉर्पोरेशन द्वारा इसे 24 माह में पूरा बनाया जाना था। अब 8 साल बीत चुके हैं लेकिन निर्माण अब भी अधूरा है। शहरी आबादी के बीच निर्माणाधीन आरओबी के कारण हजारों लोग परेशान हैं। पुल की शुरूआती लागत भी अब बढ़ चुकी है, लेकिन पीडब्ल्युडी, सेतु इकाई और रेलवे के बीच सामंजस्य न होने और ठेकेदार की उदासीनता निर्माण अटका रही है।

निर्माण नहीं मरम्मत में भी सुस्ती

लोक निर्माण विभाग की सेतु इकाई के निर्माण ही नहीं मरम्मत के काम की गति भी बेहद धीमी है। रायसेन जिले में पुल हादसे के बाद PWD ने 45 जर्जर पुलों को सूचीबद्ध किया था। इनमें से कुछ पुलों को छोड़ दें तो बाकी की मरम्मत अब तक नहीं हो पाई है। इसका सीधा मतलब है कि विभाग के अधिकारी आमजन के जोखिम और सुविधा को लेकर कितने लापरवाह और उदासीन हैं।

कौन अधिकारी जिम्मेदार

1. कार्यपालन यंत्री से SE तक सवाल

PWD में भुगतान की पूरी जिम्मेदारी कार्यपालन यंत्री की होती है। कार्यपालन यंत्री यानी EE मौके का निरीक्षण कर MB मेजरमेंट बुक में एंट्री के बाद ही बिल पास करता है। अधीक्षण यंत्री यानी SE और मुख्य इंजीनियर यानी CE इसका अनुमोदन करते हैं। इसका मतलब है कि सबसे पहले स्तर पर कार्यपालन यंत्री जिम्मेदार होते हैं। अधूरे पुलों का पूरा भुगतान करने पर सवाल उठता है कि उनके द्वारा मौका मुआयना किए बिना मेजरमेंट बुक में जानकारी दर्ज कैसे की गई। यदि उन्होंने एमबी में सत्यापन संबंधी टीप दर्ज नहीं की तो SE या फिर CE ने बिल कैसे पास कर दिए।

2. काम में देरी पर जुर्माना क्यों नहीं

मध्य प्रदेश में पुलों के निर्माण की कहानी लंबी है। ज्यादातर पुल निर्माण के लिए तय अवधि से दो साल या उससे बाद में ही पूरे हो पाते हैं। इसके बावजूद केवल गिनी चुनी निर्माण एजेंसियों पर ही जुर्माने की कार्रवाई होती है। ऐसे में सवाल यह है कि जो पुल दो से 8 साल तक अधूरे पड़े हैं उन्हें बनाने वाली कंपनियों पर जुर्माने या ब्लैक लिस्ट करने की कार्रवाई क्यों टाली गई। वहीं ऐसी कंपनी को मटेरियल एडवांस दूसरे नाम पर करोड़ों रुपए का भुगतान क्यों किया गया।

3. बड़े प्रोजेक्ट सीधे तौर पर मुख्य इंजीनियर (CE) और प्रमुख इंजीनियर (CE)की निगरानी में होते हैं। इसके बावजूद 5 साल से ज्यादा समय लगने के बाद भी अधूरे प्रोजेक्ट की समीक्षा क्यों नहीं की गई। अधिकारियों की इस उदासीनता को विभागीय मंत्री राकेश सिंह को स्वीकारना पड़ा है। जिसके बाद ऐसे अधिकारियों को चिन्हित कर कार्रवाई के निर्देश भी दिए गए, लेकिन कार्रवाई विभागीय फाइलों में ही उलझकर रह गई।

4. करोड़ों के पुलों का निर्माण गुणवत्ता से हो इसके लिए लोक निर्माण विभाग की गुणवत्ता नियंत्रण यानी E&M विंग काम करती है। गुणवत्ता की जांच के लिए विंग द्वारा 1.75 करोड़ रुपए लागत की जर्मन मशीन MBIU खरीदी गई थी। अधिकारियों की अनदेखी से यह मशीन उपयोग में ही नहीं आई और चार साल तक खराब रहने के बाद कबाड़ में बेंच दी गई।

प्रमुख सचिव की जिम्मेदारी

सालों से पुल अधूरे रहने के लिए PWD के प्रमुख सचिव की भी सीधी जवाबदेही बनती है। नियम के मुताबिक 5 करोड़ से ऊपर के हर प्रोजेक्ट की मॉनिटरिंग प्रमुख सचिव स्तर पर होती है। तिमाही समीक्षा बैठक, प्रगति रिपोर्ट और बजट आवंटन की फाइलें प्रमुख सचिव के माध्यम से आगे बढ़ती हैं। ऐसे में सालों तक निर्माण अधूरा रहने के बावजूद ठेकेदारों को पूरा भुगतान होने पर प्रमुख सचिव की भूमिका पर भी सवाल खड़े होते हैं। प्रमुख सचिव को प्रोजेक्ट में देरी होने पर ठेकेदार को ब्लैकलिस्ट करने, पेनल्टी लगाने और दोषी EE-SE के खिलाफ विभागीय जांच बैठाने का अधिकार है।

अधूरे पुल, पूरे भुगतान के लिए इन पर भी सवाल

1.IAS सुखवीर सिंह (जून 2025 से वर्तमान): जुलाई 2025 में पूर्णकालिक प्रमुख सचिव (PWD) के रूप में पदस्थ किया गया था। वे सरकार के शुरुआती कार्यकाल में इस पद पर प्रभारी थे।
2. नीरज मंडलोई (दिसंबर 2024 से जून 2025): ACS नीरज मंडलोई को दिसंबर 2024 में हुए एक बड़े प्रशासनिक फेरबदल के दौरान पीडब्ल्यूडी का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया था।
3. केसी गुप्ता (2024 के मध्य): अतिरिक्त मुख्य सचिव (ACS) केसी. गुप्ता ने विभाग का नेतृत्व किया।
4. डीपी आहूजा (पूर्व कार्यकाल): वे भी पिछली सरकारों के दौरान प्रमुख सचिव पद का कार्यभार संभाल चुके हैं।

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