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5 पॉइंट में पूरा मामला समझें...
- इंदौर हाईकोर्ट की बेंच में आज तीन अलग-अलग याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई होगी।
- शासन ने कोर्ट को आधिकारिक तौर पर सिर्फ चार मौतें बताई हैं।
- महापौर और पार्षद ने मौतों का आंकड़ा इससे कहीं ज्यादा बताया था।
- प्रशासन पर 24 दिसंबर से शुरू हुई शिकायतों की अनदेखी का आरोप है।
- प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड चार साल पहले ही दूषित पानी की चेतावनी दे चुका था।
INDORE. भागीरथपुरा दूषित पेयजल कांड को लेकर आज (6 जनवरी) इंदौर हाईकोर्ट की बेंच में अहम सुनवाई होने जा रही है। इस मामले में तीन अलग-अलग याचिकाओं पर बहस होगी। पहली जनहित याचिका हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष रितेश इनानी द्वारा दायर की गई है। दूसरी याचिका पूर्व पार्षद प्रमोद द्विवेदी की ओर से एडवोकेट मनीष यादव ने लगाई है।
दोनों याचिका में लोगों का मुफ्त इलाज कराने और शुद्ध पानी उपलब्ध कराने की मांग की गई है। जबकि तीसरी याचिका भागीरथपुरा निवासी वरुण गायकवाड़ की ओर से एडवोकेट अभिनव धनोतर द्वारा दायर की गई है। इसमें मीडिया रिपोर्टिंग पर प्रतिबंध लगाने की मांग की गई थी।
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पिछली सुनवाई में मौतों के आंकड़े बने थे विवाद की जड़
2 जनवरी को हुई पिछली सुनवाई में सरकार द्वारा प्रस्तुत स्टेटस रिपोर्ट ने ही सबसे ज्यादा सवाल खड़े किए थे। शासन ने अदालत को बताया था कि आधिकारिक तौर पर दूषित पानी से सिर्फ चार मौतें हुई हैं। वहीं नगर निगम ने राहत कार्यों के तौर पर टैंकरों से जल आपूर्ति का ब्यौरा दिया था। रिपोर्ट के अनुसार 30 दिसंबर को 36, 31 दिसंबर को 34 और 1 जनवरी को 33 टैंकरों से पानी सप्लाई किया गया। इसके समर्थन में कुछ फोटो भी कोर्ट में पेश किए गए थे।
अनुशासनात्मक कार्रवाई या औपचारिकता?
स्टेटस रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि जोन-4 के जोनल अधिकारी और सहायक अभियंता को निलंबित किया गया है। एक उप-अभियंता की सेवाएं समाप्त कर दी गई हैं। नगर निगम ने यह भी कहा कि भर्ती मरीजों और प्रभावितों के विस्तृत आंकड़े सत्यापन के बाद अलग से पेश किए जाएंगे। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह कार्रवाई जवाबदेही तय करने के बजाय डैमेज कंट्रोल जैसी है।
सिर्फ चार मौतें- कई बयानों से टकराता सरकारी दावा
पिछली सुनवाई में सरकार की तरफ से इस पूरे मामले में चार मौतों होने का दावा किया गया था इसके बाद मौतों के आंकड़े सुर्खियां बने हुए थे। क्षेत्रीय पार्षद कमल वाघेला खुद 15 से अधिक मौतों की बात कह चुके थे। महापौर पुष्यमित्र भार्गव सार्वजनिक रूप से 10 मौतों की बात स्वीकार कर चुके थे।
कलेक्टर शिवम वर्मा भी 5 मौतों की पुष्टि कर चुके हैं। इसके बाद सवाल यह है कि यजि मौतें चार ही थीं, तो शासन के अपने अधिकारी और जनप्रतिनिधि अलग-अलग आंकड़े क्यों बताते रहे? वहीं कोर्ट में चार मौत के आंकड़े ही क्यों पेश किए ।
29 दिसंबर को संज्ञान
सरकार ने कोर्ट में कहा कि 29 दिसंबर को उल्टी-दस्त के मामले सामने आते ही प्रशासन ने तुरंत संज्ञान लिया। स्थानीय लोगों और स्वास्थ्य विभाग के अनुसार 24 दिसंबर से ही मामले सामने आने लगे थे। मौतें भी पहले शुरू हो चुकी थीं। लोगों का कहना है कि पानी में बदबू और गंदगी की शिकायतें लगातार की जा रही थीं। प्रशासन 29 दिसंबर के बाद ही हरकत में आया।
आपातकालीन चिकित्सा या कागजी संवेदनशीलता?
शासन ने कोर्ट में यह भी कहा कि पूरे मामले को आपातकालीन चिकित्सा स्थिति मानकर देखा गया। लेकिन हकीकत यह है कि
- महीनों से शिकायतें अनसुनी रहीं।
- प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड चार साल पहले ही दूषित पानी को लेकर चेतावनी दे चुका था।
- मौतों के बाद ही टेंडर और फाइलें तेजी से आगे बढ़ीं।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह मानवीय संवेदनशीलता नहीं, बल्कि घटना के बाद की सफाई है।
हाईकोर्ट में अधूरी जानकारी देने का आरोप
इस पूरे मामले में मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने सबसे गंभीर आरोप लगाए थे। उन्होंने कहा था कि हाईकोर्ट जैसी संवैधानिक संस्था के सामने अधूरी या गलत जानकारी दी गई। पटवारी का कहना है कि यदि वास्तविक मौतों का आंकड़ा कोर्ट के सामने होता, तो जवाबदेही तय होती। आरोप है कि जानबूझकर आंकड़े छिपाने की पुष्टि हुई तो यह अपमान के दायरे में भी आ सकता है ।
मुआवजे और फाइलों पर भी सवाल
जिन मौतों को प्रशासन ने स्वीकार किया, उन्हीं मामलों में कागजी कार्रवाई हुई। बाकी पीड़ित परिवार आज भी मुआवजे और न्याय के लिए भटक रहे हैं। वहीं घटना से पहले महीनों तक दबाई गई फाइलें, टेंडर और पाइपलाइन सुधार से जुड़े फैसले मौतों के बाद तेजी से लिए गए।
आज की सुनवाई से उम्मीद
भागीरथपुरा कांड अब सिर्फ दूषित पानी का मामला नहीं रह गया है। यह आंकड़ों की सच्चाई, प्रशासनिक जवाबदेही और संवैधानिक जिम्मेदारी की परीक्षा बन चुका है। आज की सुनवाई में सबकी निगाहें टिकी हुई है।
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