इंदौर के चर्चित कालरा विवाद में जीतू यादव को क्लीन चिट, बीजेपी में वापसी की उम्मीद
Sanjay Gupta | Jun 23, 2026, 11:35 IST
इंदौर के चर्चित कालरा विवाद
इंदौर में चार जनवरी 2025 को हुए पार्षद कमलेश कालरा के घर पर हमले विवाद में तत्कालीन एमआईसी मेंबर और पार्षद जीतू यादव (जाटव) को क्लीन चिट मिल गई है। पुलिस ने इस मामले में जांच के बाद जीतू का नाम हटा दिया है।
इंदौर विधानसभा चार की विधायक मालिनी गौड़ के करीबी पार्षद कमलेश कालरा के घर पर 4 जनवरी 2025 को हमला हुआ था। उस वक्त घर में परिवार और बच्चों के साथ मारपीट और बदसलूकी की गई थी। मामले में आरोप लगा था कि एमआईसी मेंबर जीतू जाटव ने यह हमला करवाया है।
वीडियो फुटेज के आधार पर करीब 30 लोगों की पहचान हुई थी, जिनमें से 21 आरोपियों को पुलिस ने गिरफ्तार भी किया था। इसी केस में जीतू जाटव का वॉइस सैंपल लिया गया और उन्हें संदिग्ध भी माना गया था।
बाद में मामले ने राजनीतिक रूप ले लिया और पार्टी स्तर पर शिकायतें हुईं। इसी के चलते जीतू जाटव को 6 साल के लिए पार्टी से बाहर कर दिया गया था।
लेकिन अब पुलिस जांच में साफ हो गया है कि इस पूरे मामले में जीतू जाटव (बीजेपी पार्षद जीतू यादव) की कोई भूमिका नहीं थी और उनका इससे कोई संबंध साबित नहीं हुआ है।
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पुलिस ने मार्च 2025 में इस मामले में चालान पेश कर दिया था। इसमें बताया गया कि कुल 21 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है, जबकि 6 आरोपी अभी भी फरार हैं।
शुरुआती जांच में जीतू यादव को भी संदिग्ध माना गया था और उनकी जांच चल रही थी। लेकिन अब जांच में साफ हो गया है कि घटना के दिन जीतू यादव मौके पर मौजूद नहीं थे। वे बाणगंगा इलाके में अवतिंका गैस एजेंसी के एक कार्यक्रम में शामिल थे।
घटनास्थल के वीडियो (indore politics) में भी उनका कहीं कोई जिक्र या मौजूदगी नहीं मिली। इतना ही नहीं, खुद पीड़ित महिला, बच्चे और पार्षद कालरा ने भी यह माना है कि जीतू वहां मौजूद नहीं थे।
पुलिस जांच में यह भी सामने आया कि मुख्य आरोपी अभिलाष उर्फ अभि यादव ने अपने समर्थकों को इकट्ठा कर कालरा के घर पर हमला कराया था।
इसके अलावा जीतू यादव के कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) की भी जांच की गई, जिसमें इस मामले से जुड़ी किसी तरह की बातचीत या संपर्क का कोई रिकॉर्ड नहीं मिला। न ही उन्होंने कभी कालरा को धमकी दी या किसी तरह का दुर्व्यवहार किया।
इन सभी तथ्यों के आधार पर पुलिस ने साफ कर दिया है कि इस घटना में जीतू यादव की कोई संलिप्तता साबित नहीं होती है।
कालरा का इंदौर नगर निगम के एक कर्मचारी से मकान को नोटिस देने को लेकर विवाद हुआ था। इसी दौरान बातचीत में उसने जीतू का नाम भी लिया और कहा कि वह उन्हें भी जानता है।
इसके बाद कालरा की तरफ से जीतू को लेकर कुछ विवादित बातें कही गईं, जिनकी रिकॉर्डिंग बाद में सामने आ गई। जैसे ही यह रिकॉर्डिंग बाहर आई, जीतू के समर्थकों में नाराजगी फैल गई।
आरोप है कि इसके बाद अभि यादव ने अपने समर्थकों को इकट्ठा किया और कालरा के घर पर हमला करवा दिया। इस घटना के बाद मामला और ज्यादा बढ़ गया और पूरी तरह राजनीतिक रंग ले लिया।
मामला इसलिए भी और गरमाया क्योंकि कालरा, मालिनी गौड़ के करीबी माने जाते हैं। इसी वजह से यह विवाद विधानसभा-4 और विधानसभा-2 यानी मंत्री गुट के बीच टकराव जैसा बन गया।
स्थिति बिगड़ने के बाद पार्टी ने मालिनी गौड़ की मांग पर जीतू जाटव को पार्टी से 6 साल के लिए निष्कासित कर दिया था।
अब इस पूरे मामले के बाद एक बड़ा सवाल उठने लगा है कि क्या जीतू यादव की बीजेपी में वापसी होगी या नहीं।
दरअसल, इस केस के चलते उनके हाथ से एमआईसी का पद भी चला गया था और उन्हें पार्टी से 6 साल के लिए निष्कासित भी कर दिया गया था। लेकिन अब जब पुलिस जांच में उन्हें क्लीन चिट मिल गई है, तो उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर चर्चा तेज हो गई है।
इसी बीच एक और मामला सामने आ रहा है। हाल ही में विधानसभा-4 में मालिनी गौड़ के समर्थक वीरेंद्र शेंडगे और कुछ अन्य लोगों का संघ के एक पदाधिकारी से विवाद हुआ था। उस मामले में शेंडगे को सिर्फ उनके पद से हटाया गया, पार्टी से बाहर नहीं किया गया।
खास बात यह है कि शेंडगे और उनके साथियों पर नामजद हत्या के प्रयास और अन्य गंभीर धाराओं में केस दर्ज है, इसके बावजूद संगठनात्मक स्तर पर केवल पद से हटाने की कार्रवाई हुई।
इसी तुलना को लेकर अब राजनीतिक हलकों में सवाल उठ रहे हैं कि अलग-अलग मामलों में पार्टी का रवैया अलग क्यों रहा।
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वीडियो फुटेज के आधार पर करीब 30 लोगों की पहचान हुई थी, जिनमें से 21 आरोपियों को पुलिस ने गिरफ्तार भी किया था। इसी केस में जीतू जाटव का वॉइस सैंपल लिया गया और उन्हें संदिग्ध भी माना गया था।
बाद में मामले ने राजनीतिक रूप ले लिया और पार्टी स्तर पर शिकायतें हुईं। इसी के चलते जीतू जाटव को 6 साल के लिए पार्टी से बाहर कर दिया गया था।
लेकिन अब पुलिस जांच में साफ हो गया है कि इस पूरे मामले में जीतू जाटव (बीजेपी पार्षद जीतू यादव) की कोई भूमिका नहीं थी और उनका इससे कोई संबंध साबित नहीं हुआ है।
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क्या बोली जांच के बाद पुलिस
शुरुआती जांच में जीतू यादव को भी संदिग्ध माना गया था और उनकी जांच चल रही थी। लेकिन अब जांच में साफ हो गया है कि घटना के दिन जीतू यादव मौके पर मौजूद नहीं थे। वे बाणगंगा इलाके में अवतिंका गैस एजेंसी के एक कार्यक्रम में शामिल थे।
घटनास्थल के वीडियो (indore politics) में भी उनका कहीं कोई जिक्र या मौजूदगी नहीं मिली। इतना ही नहीं, खुद पीड़ित महिला, बच्चे और पार्षद कालरा ने भी यह माना है कि जीतू वहां मौजूद नहीं थे।
पुलिस जांच में यह भी सामने आया कि मुख्य आरोपी अभिलाष उर्फ अभि यादव ने अपने समर्थकों को इकट्ठा कर कालरा के घर पर हमला कराया था।
इसके अलावा जीतू यादव के कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) की भी जांच की गई, जिसमें इस मामले से जुड़ी किसी तरह की बातचीत या संपर्क का कोई रिकॉर्ड नहीं मिला। न ही उन्होंने कभी कालरा को धमकी दी या किसी तरह का दुर्व्यवहार किया।
इन सभी तथ्यों के आधार पर पुलिस ने साफ कर दिया है कि इस घटना में जीतू यादव की कोई संलिप्तता साबित नहीं होती है।
इस तरह से शुरू हुई वारदात
इसके बाद कालरा की तरफ से जीतू को लेकर कुछ विवादित बातें कही गईं, जिनकी रिकॉर्डिंग बाद में सामने आ गई। जैसे ही यह रिकॉर्डिंग बाहर आई, जीतू के समर्थकों में नाराजगी फैल गई।
आरोप है कि इसके बाद अभि यादव ने अपने समर्थकों को इकट्ठा किया और कालरा के घर पर हमला करवा दिया। इस घटना के बाद मामला और ज्यादा बढ़ गया और पूरी तरह राजनीतिक रंग ले लिया।
मामला इसलिए भी और गरमाया क्योंकि कालरा, मालिनी गौड़ के करीबी माने जाते हैं। इसी वजह से यह विवाद विधानसभा-4 और विधानसभा-2 यानी मंत्री गुट के बीच टकराव जैसा बन गया।
स्थिति बिगड़ने के बाद पार्टी ने मालिनी गौड़ की मांग पर जीतू जाटव को पार्टी से 6 साल के लिए निष्कासित कर दिया था।
अब क्या बीजेपी में होगी वापसी
दरअसल, इस केस के चलते उनके हाथ से एमआईसी का पद भी चला गया था और उन्हें पार्टी से 6 साल के लिए निष्कासित भी कर दिया गया था। लेकिन अब जब पुलिस जांच में उन्हें क्लीन चिट मिल गई है, तो उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर चर्चा तेज हो गई है।
इसी बीच एक और मामला सामने आ रहा है। हाल ही में विधानसभा-4 में मालिनी गौड़ के समर्थक वीरेंद्र शेंडगे और कुछ अन्य लोगों का संघ के एक पदाधिकारी से विवाद हुआ था। उस मामले में शेंडगे को सिर्फ उनके पद से हटाया गया, पार्टी से बाहर नहीं किया गया।
खास बात यह है कि शेंडगे और उनके साथियों पर नामजद हत्या के प्रयास और अन्य गंभीर धाराओं में केस दर्ज है, इसके बावजूद संगठनात्मक स्तर पर केवल पद से हटाने की कार्रवाई हुई।
इसी तुलना को लेकर अब राजनीतिक हलकों में सवाल उठ रहे हैं कि अलग-अलग मामलों में पार्टी का रवैया अलग क्यों रहा।
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