इंदौर महापौर पुष्यमित्र भार्गव के 41 माह के कार्यकाल में पांचवे निगमायुक्त, IAS हर्षिका बोली थीं- दयालु, सीधा होना मूर्खता

Sanjay Gupta | Jan 04, 2026, 15:15 IST
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indore mayor pushyamitra bhargav ias commissioner disputes
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इंदौर महापौर पुष्यमित्र भार्गव के 41 माह के कार्यकाल में आईएएस क्षितिज सिंघल पांचवे निगमायुक्त बनाए गए हैं। महापौर और निगमायुक्तों के बीच तालमेल की कमी बार-बार सामने आई है।

इंदौर महापौर पुष्यमित्र भार्गव का बयान कि अधिकारी सुनते नहीं और ऐसे सिस्टम में काम नहीं कर सकता, ने बीजेपी को हिला दिया है। पूर्व सीएम उमा भारती ने इस पर तंज कसते हुए कहा था कि, "यह कौन कह रहा है कि हमारी चली नहीं? जब आपकी नहीं चली तो बिसलेरी का पानी क्यों पीते रहे? पद छोड़कर जनता के बीच क्यों नहीं गए?"

महापौर और अधिकारियों, खासकर निगमायुक्तों के साथ पटरी न बैठना कोई नई बात नहीं है।

इस समय तत्कालीन निगमायुक्त आईएएस हर्षिका सिंह का एक ट्वीट भी मायने रखता है - It is stupid to be humble and innocent in present times" यानी आज के समय में दयालु और सीधा होना मूर्खता है।

तालमेल बैठाने में महापौर चूके या निगमायुक्त

पुष्यमित्र भार्गव ने 5 अगस्त 2022 को महापौर के तौर पर शपथ ली थी। अब तक उनके 41 माह के कार्यकाल में पांचवें निगमायुक्त के रूप में आईएएस क्षितिज सिंघल की नियुक्ति हुई है।

मतलब, अभी तक चार निगमायुक्तों का औसत कार्यकाल महज 10-10 माह का रहा है। अब सवाल ये है कि इन निगमायुक्तों के साथ महापौर के क्या विवाद हुए, कहां तालमेल में चूक हुई और गड़बड़ किस स्तर पर हुई। चलिए, इन निगमायुक्तों के साथ महापौर के विवादों पर एक नजर डालते हैं।

प्रतिभा पाल- साथ में 9 माह काम

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साल 2012 बैच की आईएएस प्रतिभा पाल इंदौर निगमायुक्त के तौर पर दो साल तक रहीं। बावड़ी हादसे के बाद, अप्रैल 2023 में उन्हें रीवा कलेक्टर बना दिया गया, जब सीएम शिवराज सिंह चौहान थे।

अगस्त 2022 से अप्रैल 2023 तक महापौर पुष्यमित्र भार्गव और निगमायुक्त पाल का दौर था। इस दौरान दोनों के बीच तालमेल नहीं बैठ पाया, और यह बात फरवरी 2023 में सामने आई। जब बीजेपी की विकास यात्रा को लेकर महापौर ने पार्षदों की बैठक बुलाई, तो सभी ने खुलकर कहा कि अधिकारी सुनते नहीं हैं।

तब महापौर ने कहा था कि सभी बातें नोट कर ली हैं। दो टूक कहा कि ढाई साल निगम के अफसरों को जो करना था वो कर लिया, अब चुने हुए जनप्रतिनिधियों के हिसाब से ही काम होगा।

निगम के अफसर लालफीताशाही से बाहर आकर जनहितैषी योजनाओं को घर-घर तक पहुंचाने का काम करें। यदि अधिकारी नहीं सुनेंगे तो उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी।

यह पहली बार था जब महापौर और निगमायुक्त की पटरी नहीं बैठने की बात सामने आई।

यह खुन्नस कितनी गहरी थी, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जून 2024 में महापौर ने स्मार्ट सिटी बोर्ड द्वारा नेपरा प्रोजेक्ट के टेंडर को आगे बढ़ाने को लेकर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया। इसकी जांच के लिए भोपाल को पत्र भी लिख दिया। इस पत्र में उन्होंने सीधे तौर पर पाल पर उंगली उठाई थी। हालांकि मामला भोपाल में ठंडा कर दिया गया।

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हर्षिका सिंह- साथ में 11 माह

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इंदौर बावड़ी हादसा के बाद पाल को रीवा कलेक्टर बनाकर ट्रांसफर किया गया। अप्रैल 2023 में 2012 बैच की ही आईएएस हर्षिका सिंह आईं। तेज तर्रार शैली की सिंह के साथ महापौर की पटरी और बिगड़ गई।

विवाद तब सतह पर आए जब अक्टूबर 2023 में सिंह की गाड़ी के नीचे नीबू मिला, तब आरोप लगे कि महापौर के पीए ने काला जादू किया है और नीबू रखा। हंगामे के बाद कर्मचारी को हटाया गया लेकिन बाद में महापौर के दबाव में कर्मचारी की वापसी हुई।

सिंह और नेताओं के बीच में विवाद और सामने आया जब उन्होंने भरी बैठक में पार्षद पतियों को निगम की बैठक से बाहर कर दिया।

इसके बाद सराफा चाट-चौपाटी को लेकर एक और विवाद हुआ, जब महापौर की जानकारी के बिना कमेटी बना दी गई। इससे दोनों के बीच दूरियां और बढ़ गईं। बाद में महापौर ने उस कमेटी को भंग कर दिया और नई कमेटी बनाई। यह मामला नगरीय प्रशासन मंत्री विजयवर्गीय तक भी पहुंच गया था।

इसके बाद सिंह ने एक ट्वीट किया, जिसमें उन्होंने कहा, "It is stupid to be humble and innocent in present times," यानी आज के समय में दयालु और सीधा होना मूर्खता है। इस ट्वीट के कई मायने निकाले गए और इसे निगम में उनकी पटरी न बैठने के रूप में देखा गया। कुछ दिन बाद उनका ट्रांसफर भी कर दिया गया।

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शिवम वर्मा- 18 माह साथ में रहे

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सिंह के जाने के बाद 2013 बैच के आईएएस शिवम वर्मा को इंदौर निगमायुक्त बनाया गया। अब तक महापौर का सबसे ज्यादा समय उन्हीं के साथ बीता। लेकिन जैसे ही वो आए, नगर निगम का 150 करोड़ का बिल घोटाला सामने आ गया। महापौर ने इस घोटाले की जांच के लिए खुलकर बयान दिए और शासन स्तर पर पत्र लिखकर गहन जांच की मांग की। इसके बाद भोपाल में जांच कमेटी बनाई गई, लेकिन मामला दबा दिया गया। महापौर ने तब साफ-साफ कहा कि इसमें अधिकारियों की भूमिका रही है।

इसी दौरान महापौर ने नेपरा प्रोजेक्ट को लेकर टेंडर बढ़ाने के मुद्दे को उठाया और शासन को जांच के लिए पत्र लिखा, जिसमें प्रतिभा पाल को घेरा गया था। लेकिन बाद में जवाब आया कि सब ठीक है और मामला खत्म हो गया।

दोनों के बीच बाहर से ज्यादा लड़ाई नहीं दिखी, लेकिन अंदरूनी उठापटक चलती रही। जब निगम की कुर्की हुई और उसके बाद निगम अधिकारियों ने फरियादी के घर पर छापामार तरीके से कार्रवाई की, तो महापौर को अधिकारियों को समझाने की कोशिश की, लेकिन फिर भी वे गणेशगंज मिश्रा के घर गए और अधिकारियों से कहा कि यह अराजकता है, और इसे नहीं होने दिया जाएगा।

महापौर ने अपने स्तर पर ही अपर आयुक्त आईएएस रोहित सिसोनिया और अन्य अधिकारियों की भूमिका की जांच के लिए एक कमेटी बना दी। इस कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर उन्होंने बैठक में चेतावनी दी कि भविष्य में ऐसी कार्रवाई नहीं होने दी जाएगी।

महापौर और निगमायुक्त शिवम वर्मा के बीच यह जरूर था कि जब वर्मा उनकी किसी बात को नहीं मानते थे, तो वो उन्हें साफ-साफ बता देते थे कि यह काम नहीं कर पाएंगे। जैसे कि रीजनल पार्क के टेंडर में गड़बड़ी होने के बाद, वर्मा ने खुलकर कह दिया था कि इस टेंडर को जारी नहीं करेंगे।

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दिलीप यादव- 4 माह

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शिवम वर्मा के 9 सितंबर 2025 को इंदौर कलेक्टर बनने के साथ ही 2014 बैच के आईएएस दिलीप यादव निगमायुक्त बने। इसके बाद तो जैसे विवादों का पिटारा खुल गया। चार माह में लगातार खुलकर सामने आ गया कि दोनों के बीच पटरी नहीं बैठ रही है। यादव ने अपनी तेज शैली में निगम में सुधार काम शुरू कर दिए। ऐसे में महापौर और दूसरे नेता पीछे छूटने लगे।

महापौर ने कई फाइलों को लेकर संदेश दिए, लेकिन निगमायुक्त ने उन्हें एंटरटेन नहीं किया।

विधायक मालिनी गौड़ से भी एक विवाद हुआ जब उनके समर्थक के यहां तोड़फोड़ का नोटिस गया। तब गौड़ ने सीएम को इसकी शिकायत की।
निगमायुक्त ने भरोसेमंद आईएएस अपर आयुक्त रोहित सिसोनिया का अहम विभाग दिए। उनसे महापौर पहले से ही नाराज चल रहे थे ऐसे में महापौर के हित प्रभावित होने लगे।

जब राजस्व अभियान चला और नपती को लेकर विवाद हुआ तब महापौर खुलकर सामने आ गए और कहा कि यह अराजकता नहीं चलेगी। इसके बाद कैंप लगाया गया और नपती अभियान रुका।

यादव और महापौर के बीच में बातचीत और तालमेल चार माह में ही तितर-बितर हो गया था। ऐसे में जब मौका मिला तो महापौर बोल बैठे- ऐसे सिस्टम में काम नहीं कर सकता हूं और अधिकारी सुनते नहीं हैं।

(अब पांचवे निगमायुक्त क्षितिज सिंघल के साथ 3 जनवरी से महापौर की नई पारी शुरू हो चुकी है)

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इन हालातों में महापौर के लिए फिर यही इरतिजा निशात का शेर ख्याल आता है- कुर्सी है तुम्हारा ये जनाजा तो नहीं है, कुछ नहीं कर सकते तो उतर क्यों नहीं जाते

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