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5 पॉइंट में समझें खबर के मायने...
- इंदौर जिला प्रशासन ने रेसीडेंसी एरिया की जमीन को सरकारी घोषित कर दिया है।
- पूर्व जस्टिस, कलेक्टर और संभागायुक्तों ने इस फैसले के खिलाफ बैठक की।
- रसूखदारों का दावा है कि गर्वनर ने उन्हें सेलडीड (मालिकाना हक) दी थी।
- प्रशासन ने 12 जनवरी तक दावे और आपत्तियां प्रस्तुत करने का समय दिया है।
- प्रभावित पक्षों ने प्रशासन के सर्वे को मनमाना बताया है।
INDORE. इंदौर जिला प्रशासन के रेसीडेंसी एरिया की जमीन को सरकारी घोषित करने और दावे/आपत्ति बुलाने के आदेश ने सिर्फ पूर्व जस्टिस ही नहीं, बल्कि कई सीनियर आईएएस अफसरों को भी गुस्सा दिला दिया है। इनमें कुछ आईएएस तो रिटायर हो चुके हैं, जबकि कुछ अभी भी नौकरी में हैं। ये लोग संभागायुक्त, कलेक्टर, निगमायुक्त जैसे बड़े पदों पर रह चुके हैं। हाल ही में इस मामले में एक बंद कमरे में प्रशासन के आदेश के खिलाफ एक बड़ी बैठक भी हो चुकी है।
क्या किया है प्रशासन ने
प्रशासन ने केंद्र और राज्य सरकार के आदेश के तहत राजस्व रिकार्ड में जमीन को लाने के लिए रेसीडेंसी में भी सर्वे किया। इसके बाद रेसीडेंसी एरिया की जमीन जिसमें आजादनगर, रेडियो कॉलोनी, धार कोठी, रतलाम कोठी आदि भी शामिल है। इन सभी को सरकारी घोषित कर दिया। इस पर 12 जनवरी तक दावे/आपत्ति बुलाए गए हैं।
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प्रशासन का तर्क है कि साल 2003 में ही यह जमीन सरकारी हो चुकी है। यहां किसी को हटा नहीं रहे हैं बल्कि उनके मालिकाना हक के कागज मांगे जा रहे हैं, ताकि उन्हें राजस्व रिकार्ड मेंटेन किया जा सके। यदि दस्तावेज नहीं होंगे तो उन्हें फिर धारणाधिकार पट्टे दिए जाएंगे और वह लीजधारक बनेंगे।
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क्यों भड़के यह सभी रसूखदार
इस एरिया में कई बड़े और रसूखदार लोगों के बंगले और आवास हैं। यहां हाईकोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस, पूर्व जिला न्यायाधीश, पूर्व संभागायुक्त, पूर्व कलेक्टर, पूर्व निगमायुक्त, पूर्व डिप्टी कलेक्टर जैसे कई बड़े अफसरों के घर भी हैं। हाल ही में कुछ लोगों ने एक बंद कमरे में इस बारे में बैठक की, जहां प्रशासन के आदेश पर जमकर नाराजगी जाहिर की गई और उसे लेकर कड़ी बातें कही गईं।
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इसमें यह फैसला लिया गया कि अगर प्रशासन ने अपनी मनमानी नहीं रोकी, तो इस मामले को हाईकोर्ट में चुनौती दी जाएगी और इस आदेश को रद्द कराया जाएगा। इसके साथ ही, जो अधिकारी इस फैसले के पीछे हैं, उनके खिलाफ भी कार्रवाई की मांग की जाएगी। माना जा रहा है कि यह आदेश बिना ठीक से सोचे-समझे लिया गया है और पूर्व सर्वे आरआई और पटवारियों ने अपनी मनमर्जी से इसे लागू किया है।
संस्थाओं को गर्वनर ने ही सेलडीड से दी जमीन
बैठक में तकनीकी मुद्दों पर भी बात हुई। इसमें कहा गया कि एमपी के तत्कालीन गर्वनर द्वारा ही 1957-58 के दौरान संस्थाओं को सेलडीड के जरिए जमीन दी गई थी। इसमें मध्य भारत सचिवालय, नॉन गजेटेड कर्मचारी, गृह निर्माण सहकारी समिति, टीचर्स को-ऑपरेटिव हाउसिंग सोसायटी, इंदौर निवासी मध्य भारत शासकीय सेवक को-ऑपरेटिव हाउसिंग सोसायटी, सेल्स टैक्स डिपार्टमेंट एमप्लाइ को-ऑपरेटिव हाउसिंग सोसायटी, कारागार कर्मचारी गृह निर्माण को-ऑपरेटिव सोसायटी शामिल है।
गर्वनर द्वारा संस्था के सदस्यों को गांधी पार्क उर्फ रेडियो कॉलोनी की सेल डीड की गई। यह जमीन तो लीज पर भी नहीं है, बल्कि पूरा मालिकाना हक है। इसके बकायदा पूरे दस्तावेज मौजूद है। इसके बाद भी प्रशासन द्वारा मनमाने और गैर कानूनी तरीके से इसे सरकारी घोषित किया गया है। यहां संपत्तियों के सालों सें पंजीयन हो रहे हैं। इन पांच संस्थाओं में 183 प्लॉट हैं। टीएडंसीपी आदि भी पास हैं और विधिवत सभी मंजूरी है।
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कुछ की जमीन छोड़ने के भी लगे आरोप
इस बैठक के दौरान प्रशासन के पूरे सर्वे पर सवालिया निशान लगाया गया। यहां तक कि ये भी कहा गया कि इसमें निचले स्तर पर खेल किए गए हैं। कुछ निजी लोगों से सेटिंग कर उन्हें इस सर्वे से बाहर करने का भी खेल हुआ है। वहीं अपने हिसाब से पूरा नक्शा दस्तावेज देखे, समझे बिना ही बना लिया है। यह सब परेशान करने के सिवा कोई काम नहीं है, ताकि लोग बेवजह प्रशासन के पास चक्कर लगाएं।
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