53 साल की योजनाएं, हजारों करोड़ खर्च फिर भी इंदौर ने पीया जहरीला पानी
Rahul Dave | Jan 06, 2026, 17:38 IST
Photograph: (the sootr)
इंदौर में 53 साल की योजनाओं और करोड़ों के खर्च के बाद भी दूषित पानी से मौतें हो रही हैं। जानिए कैसे सरकारी लापरवाही ने शहर को डार्क जोन में धकेला।
INDORE. इंदौर के भागीरथपुरा में गंदे पानी से हुई मौतों ने एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। क्या यह सिर्फ एक इलाके की त्रासदी है। या फिर इंदौर की पूरी जल-सीवरेज व्यवस्था का वर्षों पुराना, अनदेखा किया गया संकट। जो अब जानलेवा रूप में सामने आया है। दस्तावेज बताते हैं कि यह हादसा अचानक नहीं हुआ। बल्कि 50 से अधिक वर्षों की नीतिगत लापरवाही, अधूरी योजनाओं और कागजी सुधारों का परिणाम है।
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समाजसेवी किशोर कोडवानी ने बताया कि इंदौर में पानी और सीवरेज को लेकर 1970 से योजनाएं बन रहीं है। इनमें अमृत योजना, स्मार्ट सिटी, गंगा एक्शन प्लान, अटल रिवर योजना, एसटीपी प्रोजेक्ट, प्राइमरी-सेकेंडरी सीवरेज लाइन शामिल है। लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि इंदौर में योजनाएं बदलीं, सिस्टम नहीं।
आरटीआई से प्राप्त दस्तावेज बताते हैं कि इंदौर नगर निगम ने बिना पुरानी और नई लाइनों के एलाइमेंट मिलान के पूरे शहर में नई खुदाई कर दी। अदालत द्वारा इसे भौतिक सत्यापन में भी गलत माना गया, फिर भी सुधार नहीं हुआ।
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शासकीय रिकॉर्ड के अनुसार पूरे शहर में 2200 किलोमीटर सड़कें हैं। नियमानुसार हर 30 मीटर पर एक सीवरेज मैनहोल होना चाहिए। यानि लगभग 73,350 मैनहोल। लेकिन रिकॉर्ड बताता है कि 1,57,271 मैनहोल बने हुए हैं। यानी ज़रूरत से दोगुने से भी अधिक। इस गम्भीर लापरवाही पर यह सवाल उठता है कि क्या बिना तकनीकी जरूरत मैनहोल बनाए गए? क्या यहीं से सीवरेज और पानी की लाइनें आपस में मिल रही हैं?
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सबसे गंभीर बात यह है कि पिछले दो दशकों से नगर निगमों में स्थायी लैब साइंटिस्ट ही नहीं हैं। भोपाल को छोड़ दें तो पूरे प्रदेश में जल जांच की रिपोर्ट किस आधार पर बन रही है, यह साफ नहीं। ऐसे में दूषित जल की पहचान कैसे होगी? किस आधार पर पानी को “पीने योग्य” घोषित किया जा रहा है?
आरटीआई दस्तावेज़ों के अनुसार जलूद से बिजलपुर कंट्रोल रूम तक पानी पहुंचने में 2.1 PPM क्लोरीन खत्म हो जाती है। इसके बावजूद टंकियों पर दोबारा क्लोरीन मिलाने की कोई ठोस व्यवस्था नहीं। न तो नागरिकों को चेतावनी दी गई, न ही “पानी पीने योग्य नहीं” जैसे बोर्ड लगाए गए। जबकि न्यायालय के आदेश इसकी अनुमति देते हैं।
315 MLD पानी वितरण
412 MLD एसटीपी क्षमता
लेकिन आरटीआई दस्तावेज बताते हैं कि एक चौथाई ट्रीटमेंट प्लांट बिजली खपत के अनुसार चल ही नहीं रहे। तो सवाल सीधा है- अगर ट्रीटमेंट नहीं हो रहा, तो नदियों में साफ पानी आ कहां से रहा है?
पुराने मकानों के पुनर्निर्माण के दौरान उपभोक्ता का नल काट दिया गया। शुल्क जमा करा लिया गया लेकिन मेन लाइन से पाइप को सील नहीं किया गया। नतीजा-सीवरेज और गंदा पानी वितरण लाइन में घुसता रहा।
नगर निगम सीमा में 5500 से अधिक सरकारी 1 लाख से ज्यादा निजी ट्यूबवेल है। रिकॉर्ड के अनुसार 95% भूजल दूषित है। इसके बावजूद न तो सभी ट्यूबवेल पर चेतावनी बोर्ड लगे, न ही पानी पीने योग्य नहीं होने की सूचना दी गई।
केंद्रीय भूजल बोर्ड की रिपोर्ट (2010) के अनुसार 100 यूनिट भूजल भरता है,137 यूनिट दोहन हो रहा है। यही वजह है कि इंदौर डार्क ज़ोन की श्रेणी में पहुंच चुका है।
आरटीआई के मुताबिक 2009 से 2022 के बीच 589 करोड़ रुपए खर्च हुए। 2022–2025 में अतिरिक्त लगातार नए टेंडर लेकिन लाइनें सुधरी नहीं क्वालिटी बेहतर नहीं हुई। जवाबदेही तय नहीं हुई।
आबादी: 35 लाख+
प्रति व्यक्ति आवश्यकता: 250 लीटर
निगम आपूर्ति: लगभग 135 लीटर
यानी मांग-आपूर्ति का अंतर लगातार बढ़ता गया।
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2009–2025 के बीच, लोकायुक्त, हाईकोर्ट, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल सभी ने नदी-तालाब सीमांकन,सीवरेज ट्रीटमेंट पाइपलाइन प्रोजेक्ट पूर्ण करने के आदेश दिए। लेकिन पालन कागजों तक सीमित रहा।
भागीरथपुरा की मौतें न आकस्मिक हैं न अप्रत्याशित। यह उस सिस्टम का नतीजा हैं जिसने चेतावनियों को नजरअंदाज किया। रिपोर्ट दबाईं योजनाओं को केवल खर्च का माध्यम बनाया। यदि अब भी इसे “हादसा” बताकर टाल दिया गया, तो अगली त्रासदी तय है सिर्फ जगह बदल जाएगी। यह पानी की नहीं, शासन की असफलता की कहानी है।
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53 वर्षों से चल रही योजनाएं, लेकिन नतीजा शून्य
आरटीआई से प्राप्त दस्तावेज बताते हैं कि इंदौर नगर निगम ने बिना पुरानी और नई लाइनों के एलाइमेंट मिलान के पूरे शहर में नई खुदाई कर दी। अदालत द्वारा इसे भौतिक सत्यापन में भी गलत माना गया, फिर भी सुधार नहीं हुआ।
भागीरथपुरा कांड-दूषित पानी पीने से 15वीं मौत, अपर आयुक्त को हटाया, निगमायुक्त को नोटिस
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सीवरेज नेटवर्क की भयावह हकीकत
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प्रदेश में लैब साइंटिस्ट ही नहीं
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क्लोरीन सिस्टम: कागजों में चालू, जमीन पर गायब
STP और ट्रीटमेंट प्लांट: दावे बनाम सच्चाई
नगर निगम दावा करता है-
412 MLD एसटीपी क्षमता
लेकिन आरटीआई दस्तावेज बताते हैं कि एक चौथाई ट्रीटमेंट प्लांट बिजली खपत के अनुसार चल ही नहीं रहे। तो सवाल सीधा है- अगर ट्रीटमेंट नहीं हो रहा, तो नदियों में साफ पानी आ कहां से रहा है?
नल कनेक्शन कटते रहे, सीलिंग नहीं हुई
5500 सरकारी, 1 लाख निजी ट्यूबवेल: 95% दूषित
भूजल से ज्यादा दोहन, इंदौर डार्क ज़ोन में
13 वर्षों में 589 करोड़ खर्च, फिर भी वही हाल
144 साल का जल प्रबंधन: मांग आगे, व्यवस्था पीछे
दस्तावेज़ बताते हैं:
प्रति व्यक्ति आवश्यकता: 250 लीटर
निगम आपूर्ति: लगभग 135 लीटर
यानी मांग-आपूर्ति का अंतर लगातार बढ़ता गया।
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अदालतों के आदेश, लेकिन अमल शून्य-
हादसा नहीं, सिस्टम का परिणाम है
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