53 साल की योजनाएं, हजारों करोड़ खर्च फिर भी इंदौर ने पीया जहरीला पानी

इंदौर में 53 साल की योजनाओं और करोड़ों के खर्च के बाद भी दूषित पानी से मौतें हो रही हैं। जानिए कैसे सरकारी लापरवाही ने शहर को डार्क जोन में धकेला।

author-image
Rahul Dave
New Update
53 years of plans, thousands of crores spent, yet Indore drank poisonous water

Photograph: (the sootr)

Listen to this article
0.75x1x1.5x
00:00/ 00:00

INDORE.इंदौर के भागीरथपुरा में गंदे पानी से हुई मौतों ने एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। क्या यह सिर्फ एक इलाके की त्रासदी है। या फिर इंदौर की पूरी जल-सीवरेज व्यवस्था का वर्षों पुराना, अनदेखा किया गया संकट। जो अब जानलेवा रूप में सामने आया है। दस्तावेज बताते हैं कि यह हादसा अचानक नहीं हुआ। बल्कि 50 से अधिक वर्षों की नीतिगत लापरवाही, अधूरी योजनाओं और कागजी सुधारों का परिणाम है।

53 वर्षों से चल रही योजनाएं, लेकिन नतीजा शून्य

समाजसेवी किशोर कोडवानी ने बताया कि इंदौर में पानी और सीवरेज को लेकर 1970 से योजनाएं बन रहीं है। इनमें अमृत योजना, स्मार्ट सिटी, गंगा एक्शन प्लान, अटल रिवर योजना, एसटीपी प्रोजेक्ट, प्राइमरी-सेकेंडरी सीवरेज लाइन शामिल है। लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि इंदौर में योजनाएं बदलीं, सिस्टम नहीं।

आरटीआई से प्राप्त दस्तावेज बताते हैं कि इंदौर नगर निगम ने बिना पुरानी और नई लाइनों के एलाइमेंट मिलान के पूरे शहर में नई खुदाई कर दी। अदालत द्वारा इसे भौतिक सत्यापन में भी गलत माना गया, फिर भी सुधार नहीं हुआ।

भागीरथपुरा कांड-दूषित पानी पीने से 15वीं मौत, अपर आयुक्त को हटाया,  निगमायुक्त को नोटिस

यह खबरें भी पढ़ें...

इंदौर का भागीरथपुरा एपिडेमिक क्षेत्र घोषित नहीं हुआ, CMHO के एक आदेश से हुआ था असमंजस

भागीरथपुरा कांड में हाईकोर्ट ने CS से मांगा जवाब, याचिकाकर्ता बोले- नए IAS आ रहे, जो इंदौर को समझ रहे चारागाह

सीवरेज नेटवर्क की भयावह हकीकत

शासकीय रिकॉर्ड के अनुसार पूरे शहर में 2200 किलोमीटर सड़कें हैं। नियमानुसार हर 30 मीटर पर एक सीवरेज मैनहोल होना चाहिए। यानि लगभग 73,350 मैनहोल। लेकिन रिकॉर्ड बताता है कि 1,57,271 मैनहोल बने हुए हैं। यानी ज़रूरत से दोगुने से भी अधिक। इस गम्भीर लापरवाही पर यह सवाल उठता है कि क्या बिना तकनीकी जरूरत मैनहोल बनाए गए? क्या यहीं से सीवरेज और पानी की लाइनें आपस में मिल रही हैं? 

प्रदेश में लैब साइंटिस्ट ही नहीं

सबसे गंभीर बात यह है कि पिछले दो दशकों से नगर निगमों में स्थायी लैब साइंटिस्ट ही नहीं हैं। भोपाल को छोड़ दें तो पूरे प्रदेश में जल जांच की रिपोर्ट किस आधार पर बन रही है, यह साफ नहीं। ऐसे में दूषित जल की पहचान कैसे होगी? किस आधार पर पानी को “पीने योग्य” घोषित किया जा रहा है?

WhatsApp Image 2026-01-06 at 17.10.18
Photograph: (the sootr)

क्लोरीन सिस्टम: कागजों में चालू, जमीन पर गायब

आरटीआई दस्तावेज़ों के अनुसार जलूद से बिजलपुर कंट्रोल रूम तक पानी पहुंचने में 2.1 PPM क्लोरीन खत्म हो जाती है। इसके बावजूद टंकियों पर दोबारा क्लोरीन मिलाने की कोई ठोस व्यवस्था नहीं। न तो नागरिकों को चेतावनी दी गई, न ही “पानी पीने योग्य नहीं” जैसे बोर्ड लगाए गए। जबकि न्यायालय के आदेश इसकी अनुमति देते हैं।

STP और ट्रीटमेंट प्लांट: दावे बनाम सच्चाई

नगर निगम दावा करता है-

315 MLD पानी वितरण

412 MLD एसटीपी क्षमता

लेकिन आरटीआई दस्तावेज बताते हैं कि एक चौथाई ट्रीटमेंट प्लांट बिजली खपत के अनुसार चल ही नहीं रहे। तो सवाल सीधा है- अगर ट्रीटमेंट नहीं हो रहा, तो नदियों में साफ पानी आ कहां से रहा है?

नल कनेक्शन कटते रहे, सीलिंग नहीं हुई

पुराने मकानों के पुनर्निर्माण के दौरान उपभोक्ता का नल काट दिया गया। शुल्क जमा करा लिया गया लेकिन मेन लाइन से पाइप को सील नहीं किया गया। नतीजा-सीवरेज और गंदा पानी वितरण लाइन में घुसता रहा।

5500 सरकारी, 1 लाख निजी ट्यूबवेल: 95% दूषित

नगर निगम सीमा में 5500 से अधिक सरकारी 1 लाख से ज्यादा निजी ट्यूबवेल है। रिकॉर्ड के अनुसार 95% भूजल दूषित है। इसके बावजूद न तो सभी ट्यूबवेल पर चेतावनी बोर्ड लगे, न ही पानी पीने योग्य नहीं होने की सूचना दी गई।

भूजल से ज्यादा दोहन, इंदौर डार्क ज़ोन में

केंद्रीय भूजल बोर्ड की रिपोर्ट (2010) के अनुसार 100 यूनिट भूजल भरता है,137 यूनिट दोहन हो रहा है। यही वजह है कि इंदौर डार्क ज़ोन की श्रेणी में पहुंच चुका है।

13 वर्षों में 589 करोड़ खर्च, फिर भी वही हाल

आरटीआई के मुताबिक 2009 से 2022 के बीच 589 करोड़ रुपए खर्च हुए। 2022–2025 में अतिरिक्त लगातार नए टेंडर लेकिन लाइनें सुधरी नहीं क्वालिटी बेहतर नहीं हुई। जवाबदेही तय नहीं हुई।

144 साल का जल प्रबंधन: मांग आगे, व्यवस्था पीछे

दस्तावेज़ बताते हैं:

आबादी:  35 लाख+

प्रति व्यक्ति आवश्यकता: 250 लीटर

निगम आपूर्ति: लगभग 135 लीटर

यानी मांग-आपूर्ति का अंतर लगातार बढ़ता गया। 

यह खबरें भी पढ़ें...

महापौर पुष्यमित्र भार्गव बोले थे- पार्षद भागीरथपुरा में देखें ड्रेनेज, पानी की लाइन का कैसे अच्छा काम हुआ, मैं सर्टिफिकेट दे रहा हूं

भागीरथपुरा कांड: तीन याचिकाओं पर होगी बहस, मौतों के आंकड़े फिर कटघरे में

अदालतों के आदेश, लेकिन अमल शून्य-

2009–2025 के बीच, लोकायुक्त, हाईकोर्ट, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल सभी ने नदी-तालाब सीमांकन,सीवरेज ट्रीटमेंट पाइपलाइन प्रोजेक्ट पूर्ण करने के आदेश दिए। लेकिन पालन कागजों तक सीमित रहा।

हादसा नहीं, सिस्टम का परिणाम है

भागीरथपुरा की मौतें न आकस्मिक हैं न अप्रत्याशित। यह उस सिस्टम का नतीजा हैं जिसने चेतावनियों को नजरअंदाज किया। रिपोर्ट दबाईं योजनाओं को केवल खर्च का माध्यम बनाया। यदि अब भी इसे “हादसा” बताकर टाल दिया गया, तो अगली त्रासदी तय है सिर्फ जगह बदल जाएगी। यह पानी की नहीं, शासन की असफलता की कहानी है।

इंदौर नगर निगम लोकायुक्त समाजसेवी किशोर कोडवानी आरटीआई अमृत योजना भागीरथपुरा इंदौर के भागीरथपुरा में गंदे पानी
Advertisment