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News in short
- शंकराचार्य के निर्माण को अवैध बताकर रोकने की याचिका खारिज।
- एक ही राहत के लिए सिविल कोर्ट और हाईकोर्ट में केस चलाने पर नाराजगी।
- याचिकाकर्ता पर भौतिक तथ्यों को छिपाने का आरोप।
- 17 दिसंबर 2025 को दिया गया स्टे आदेश रद्द।
- हाईकोर्ट ने कहा, सिविल कोर्ट ही लेगा फैसला।
News in Detail
जबलपुर की एक विवादित जमीन को लेकर दायर याचिका पर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने साफ कहा कि एक ही विवाद पर एक साथ सिविल कोर्ट और हाईकोर्ट में केस चलाना कानून के साथ खिलवाड़ है। यह विवादित जमीन शंकराचार्य के आश्रम से जुड़ी हुई है। तथ्य छिपाने और समानांतर कार्यवाही अपनाने के आरोप में याचिका खारिज कर दी गई।
जबलपुर हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि कोई पक्षकार एक ही विवाद के लिए अलग-अलग मंचों पर कानूनी लड़ाई नहीं लड़ सकता। जस्टिस विशाल मिश्रा की पीठ ने सुभाष चंद जायसवाल की रिट याचिका खारिज की। कोर्ट ने कहा कि यह समानांतर कानूनी कार्यवाही और तथ्य छिपाने का उदाहरण है।
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क्या था पूरा विवाद?
याचिकाकर्ता सुभाष चंद जायसवाल ने हाई कोर्ट में नगर निगम जबलपुर और अन्य के खिलाफ याचिका दायर की। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रतिवादी नंबर-2, अनंत श्री विभूषित शंकराचार्य ज्योतिष द्वारा जबलपुर के लक्ष्मीपुर क्षेत्र स्थित खसरा नंबर 153/1 की भूमि पर अवैध निर्माण किया जा रहा है।
यह भूमि करीब 5400 वर्गफुट क्षेत्रफल की बताई गई है। याचिका में दावा किया गया कि टाउन एंड कंट्री प्लानिंग (TNCP) विभाग ने इस निर्माण को अनुमति देने से इंकार कर दिया है। इसके बावजूद निर्माण जारी है, जिसे तत्काल रोका और ध्वस्त किया जाए।
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कोर्ट में खुला बड़ा तथ्य
सुनवाई के दौरान प्रतिवादी पक्ष के वकील ने हाईकोर्ट को बताया कि याचिकाकर्ता पहले ही सिविल कोर्ट में RCSA No. 659/2025 के तहत मुकदमा दायर कर चुका है। इस सिविल सूट में वही राहत मांगी गई है, जैसे निर्माण पर रोक, अवैध निर्माण हटाना और कब्जा वापस दिलाना।
वकील ने यह भी बताया कि याचिकाकर्ता ने सिविल कोर्ट के एक आदेश के खिलाफ M.P. No. 4792/2025 नामक याचिका दायर की है, जो हाई कोर्ट में लंबित है। यह जानकारी रिट याचिका में स्पष्ट रूप से नहीं दी गई।
हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी
जस्टिस विशाल मिश्रा ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद स्पष्ट कहा कि रिट याचिका और सिविल सूट में मांगी गई राहतें एक जैसी हैं। कानून समानांतर कार्यवाही की अनुमति नहीं देता।
याचिकाकर्ता ने महत्वपूर्ण और भौतिक तथ्यों को छिपाकर कोर्ट को गुमराह करने का प्रयास किया। कोर्ट ने कहा कि सिविल सूट और जुड़ी याचिका पहले से लंबित हैं। ऐसे में अंतरिम राहत या निषेधाज्ञा के लिए उसी मंच पर आवेदन किया जाना चाहिए था।
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स्टे आदेश भी हुआ समाप्त
गौरतलब है कि इस मामले में हाई कोर्ट ने 17 दिसंबर 2025 को निर्माण पर अस्थायी रोक (Stay) लगाई थी। लेकिन याचिका खारिज होने के साथ ही यह स्टे आदेश भी स्वतः समाप्त कर दिया गया।
कोर्ट की अंतिम राय
हाईकोर्ट ने कहा कि वर्तमान रिट याचिका में कोई कानूनी आधार नहीं बनता। याचिकाकर्ता के पास पहले से उपलब्ध वैकल्पिक और प्रभावी कानूनी उपाय मौजूद हैं। इन्हीं कारणों से याचिका को खारिज कर दिया गया।
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