खजुराहो-पन्ना रेल लाइन के लिए पहले काटे 54 हजार पेड़, रेलवे बोला-रूट सही नहीं, अब रेल मंत्री का दखल
Amresh Kushwaha | May 28, 2026, 13:25 IST
khajuraho panna rail line route change survey delay controversy
खजुराहो-पन्ना रेल परियोजना में 54 हजार से अधिक पेड़ कटने के बाद रूट बदलने का विवाद गहरा गया है। रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने पुराने रूट पर ही दोबारा सर्वे के निर्देश दिए हैं।
मध्यप्रदेश का खजुराहो-पन्ना रेल परियोजना इस समय एक बड़े फेरबदल और पर्यावरण से जुड़े गंभीर सवालों के घेरे में है। जिस रूट पर रेलवे लाइन बिछाने के लिए हजारों पेड़ों की बलि दे दी गई और करोड़ों रुपए पानी की तरह बहा दिए गए, अचानक उस रूट को असुरक्षित (Unsafe) बताकर बदलने की तैयारी कर ली गई थी।
वहीं, अब इस पूरे मामले में एक नया मोड़ आ चुका है। मामला दिल्ली तक गूंजने के बाद रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने खुद इस पर संज्ञान लिया है। साथ ही, पूरे मामले की नए सिरे से समीक्षा करने के कड़े निर्देश जारी किए हैं।
रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बुधवार, 27 मई को अधिकारियों को सख्त निर्देश दिए हैं कि जिस पुराने रूट पर 54 हजार 578 पेड़ काटे जा चुके हैं, उसी रूट पर दोबारा गहराई से अध्ययन (Re-study) कराया जाए। रेल मंत्री ने तकनीकी विशेषज्ञों को निर्देश दिया है कि वे ड्रोन से ली गई तस्वीरों और टोपोशीट (Toposheet - स्थलाकृतिक मानचित्र) के आधार पर बारीकी से जांच करें।
इस जांच का मुख्य उद्देश्य यह पता लगाना है कि क्या कुछ जरूरी तकनीकी सुधार करके इसी पुराने अलाइमेंट पर रेल पटरी बिछाई जा सकती है, ताकि पर्यावरण को और अधिक नुकसान होने से बचाया जा सके।
यह पूरा मामला ललितपुर-सिंगरौली परियोजना का हिस्सा है। इसके तहत खजुराहो से पन्ना को जोड़ा जाना है। यह रेल लाइन पहाड़ियों और कठिन अजयगढ़ घाटी के बीच से होकर गुजरनी है। रेलवे ने साल 2021 में इस रूट का डिजाइन फाइनल किया था।
इसके बाद करीब 315 हेक्टेयर भूमि का अधिग्रहण (Land Acquisition) किया गया था। साल 2022-2023 के दौरान रेलवे ने इस चिन्हित जंगल में कुल 54 हजार 578 पेड़ों को कटवा दिया था। इस पूरे काम और शुरुआती विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR - Detailed Project Report) को तैयार करने में सरकारी खजाने से 24 करोड़ 78 हजार रुपए खर्च कर दिए गए। इतनी भारी तबाही और खर्च के बाद रेलवे के इंजीनियरों ने अचानक कहा कि पुराना डिजाइन त्रुटिपूर्ण था और वहां ट्रेन चलाना सुरक्षित नहीं है।
रेलवे अधिकारियों के मुताबिक, पुराने डिजाइन में छह बड़े घुमाव या मोड़ (Sharp Curves) थे, जो सुरक्षित ट्रेन संचालन के लिहाज से बेहद खतरनाक थे। इस कमी को दूर करने के लिए रेलवे ने रूट बदलने का निर्णय लिया और नए डिजाइन में मोड़ों के घुमाव को कम किया गया। नए प्लान के तहत सुरंगों की संख्या आठ से घटाकर सात कर दी गई और 10 नए पुलों (Bridges) का प्रस्ताव रखा गया है।
वहीं, इस नए रूट के लिए रेलवे को फिर से 258 हेक्टेयर वन भूमि के अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू करनी पड़ी है। वन विभाग (Forest Department) ने नए इलाके में पेड़ों की गिनती भी शुरू कर दी है, जहां अनुमान लगाया जा रहा है कि लगभग 50 हजार और पेड़ काटे जाएंगे। यानी एक तरफ पुराने 54 हजार कटे पेड़ों का नुकसान और दूसरी तरफ नए रूट पर 50 हजार और पेड़ों पर कुल्हाड़ी चलने का खतरा मंडरा रहा है।
मलबे के निपटारे पर
इस परियोजना में केवल पेड़ों की कटाई ही एकमात्र समस्या नहीं है। नई रेल लाइन बिछाने के लिए पहाड़ों को काटा जाना है, जिससे भारी मात्रा में मलबा (Debris) निकलेगा। रेलवे इस मलबे को पास के जंगल में ही डंप करना चाहता है, लेकिन पन्ना टाइगर रिजर्व (Panna Tiger Reserve) प्रबंधन ने इस पर कड़ा ऐतराज जताया है।
टाइगर रिजर्व के डिप्टी डायरेक्टर वी.के. पटेल ने बकायदा रेलवे को पत्र लिखकर स्पष्ट कर दिया है कि वन्यजीवों और पर्यावरण की सुरक्षा को देखते हुए इस मलबे को किसी भी सूरत में जंगल के भीतर नहीं फेंका जा सकता; इसे जंगल की सीमा से बाहर ही डंप करना होगा।
इस पूरे घटनाक्रम के बाद पश्चिम मध्य रेलवे, जबलपुर ने डैमेज कंट्रोल की कोशिशें शुरू कर दी हैं। रेलवे का कहना है कि काटे गए पेड़ों की भरपाई के लिए अगले मानसून से पहले निर्धारित संख्या से दोगुने से भी अधिक पौधे लगाए जाएंगे। इसके अलावा, अतिरिक्त महाप्रबंधक (AGM - Additional General Manager) के आदेश पर एक तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन किया गया है, जो इस पूरे मामले की पड़ताल करेगी।
वहीं, यहां सबसे बड़ा नीतिगत सवाल यह उठता है कि जब साल 2021 में रूट का डिजाइन फाइनल किया गया था, तब इतनी बड़ी खामी विशेषज्ञों की नजर से कैसे चूक गई? इस गलत डिजाइन और योजना में दूरदर्शिता की कमी के कारण यह पूरी रेल परियोजना तीन साल पीछे चली गई है। इससे इसकी कुल लागत में भारी बढ़ोतरी हो रही है। पर्यावरण और जनता के टैक्स के पैसे का इतना बड़ा नुकसान होने के बाद भी अब तक किसी भी जिम्मेदार अधिकारी पर कोई ठोस कार्रवाई या जवाबदेही तय नहीं की गई है।
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वहीं, अब इस पूरे मामले में एक नया मोड़ आ चुका है। मामला दिल्ली तक गूंजने के बाद रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने खुद इस पर संज्ञान लिया है। साथ ही, पूरे मामले की नए सिरे से समीक्षा करने के कड़े निर्देश जारी किए हैं।
रेल मंत्री का दखल पर पुराने रूट का होगा सर्वे
इस जांच का मुख्य उद्देश्य यह पता लगाना है कि क्या कुछ जरूरी तकनीकी सुधार करके इसी पुराने अलाइमेंट पर रेल पटरी बिछाई जा सकती है, ताकि पर्यावरण को और अधिक नुकसान होने से बचाया जा सके।
करोड़ों खर्च कर दी गई 54 हजार पेड़ों की बलि
इसके बाद करीब 315 हेक्टेयर भूमि का अधिग्रहण (Land Acquisition) किया गया था। साल 2022-2023 के दौरान रेलवे ने इस चिन्हित जंगल में कुल 54 हजार 578 पेड़ों को कटवा दिया था। इस पूरे काम और शुरुआती विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR - Detailed Project Report) को तैयार करने में सरकारी खजाने से 24 करोड़ 78 हजार रुपए खर्च कर दिए गए। इतनी भारी तबाही और खर्च के बाद रेलवे के इंजीनियरों ने अचानक कहा कि पुराना डिजाइन त्रुटिपूर्ण था और वहां ट्रेन चलाना सुरक्षित नहीं है।
नए रूट का खाका, एक और पर्यावरणीय संकट
वहीं, इस नए रूट के लिए रेलवे को फिर से 258 हेक्टेयर वन भूमि के अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू करनी पड़ी है। वन विभाग (Forest Department) ने नए इलाके में पेड़ों की गिनती भी शुरू कर दी है, जहां अनुमान लगाया जा रहा है कि लगभग 50 हजार और पेड़ काटे जाएंगे। यानी एक तरफ पुराने 54 हजार कटे पेड़ों का नुकसान और दूसरी तरफ नए रूट पर 50 हजार और पेड़ों पर कुल्हाड़ी चलने का खतरा मंडरा रहा है।
मलबे के निपटारे पर पन्ना टाइगर रिजर्व की आपत्ति
टाइगर रिजर्व के डिप्टी डायरेक्टर वी.के. पटेल ने बकायदा रेलवे को पत्र लिखकर स्पष्ट कर दिया है कि वन्यजीवों और पर्यावरण की सुरक्षा को देखते हुए इस मलबे को किसी भी सूरत में जंगल के भीतर नहीं फेंका जा सकता; इसे जंगल की सीमा से बाहर ही डंप करना होगा।
जवाबदेही से बच रहे अफसर
वहीं, यहां सबसे बड़ा नीतिगत सवाल यह उठता है कि जब साल 2021 में रूट का डिजाइन फाइनल किया गया था, तब इतनी बड़ी खामी विशेषज्ञों की नजर से कैसे चूक गई? इस गलत डिजाइन और योजना में दूरदर्शिता की कमी के कारण यह पूरी रेल परियोजना तीन साल पीछे चली गई है। इससे इसकी कुल लागत में भारी बढ़ोतरी हो रही है। पर्यावरण और जनता के टैक्स के पैसे का इतना बड़ा नुकसान होने के बाद भी अब तक किसी भी जिम्मेदार अधिकारी पर कोई ठोस कार्रवाई या जवाबदेही तय नहीं की गई है।
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