जनसुनवाई में आईएएस ऋषव गुप्ता पर लगे गंभीर आरोप, कलेक्टर को बिकाऊ कहने पर पिता-पुत्र को जेल
Amresh Kushwaha | May 06, 2026, 11:41 IST
khandwa jansunwai ias rishav gupta farmer arrest controversy
मध्यप्रदेश के खंडवा में जनसुनवाई के दौरान कलेक्टर को बिकाऊ कहना किसान को भारी पड़ गया। इसपर किसान और उसके बेटे को जेल भेज दिया गया। हाई कोर्ट से केस जीतने के बाद भी रास्ता न मिलने से किसान परेशान था।
जनसुनवाई का उद्देश्य जनता की समस्याओं का तत्काल समाधान करना है, लेकिन मंगलवार, 05 मई को मध्यप्रदेश के खंडवा जिला मुख्यालय पर नजारा कुछ और ही था। यहां अपनी समस्या लेकर पहुंचे एक किसान और उसके पुत्र को अधिकारियों पर आपत्तिजनक टिप्पणी करना भारी पड़ गया। खंडवा के कलेक्टर ऋषव गुप्ता (IAS Rishav Gupta) की मौजूदगी में बिकाऊ शब्द का प्रयोग करने के आरोप में पिता-पुत्र को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।
छैगांवमाखन क्षेत्र से आए बुजुर्ग किसान रामनारायण कुमरावत और उनके पुत्र श्याम कुमरावत अपनी वर्षों पुरानी जमीन के रास्ते के विवाद को लेकर कलेक्टर कार्यालय पहुंचे थे। जब मामला आईएएस ऋषव गुप्ता के पास आया, तो उन्होंने नियमानुसार कार्रवाई का आश्वासन दिया।
वहीं, समाधान में हो रही देरी से परेशान किसान का धैर्य जवाब दे गया। किसान ने तैश में आकर अधिकारियों की ओर इशारा करते हुए कहा कि तुम सब बिकाऊ हो, यदि समस्या नहीं सुलझी तो मैं जान दे दूंगा। यह सुनते ही पूरे सभागार में सन्नाटा पसर गया और देखते ही देखते अफरा-तफरी का माहौल बन गया।
सभागार के भीतर हंगामा बढ़ते देख सुरक्षाकर्मियों ने तत्काल हस्तक्षेप किया और दोनों को बाहर का रास्ता दिखाया। बाहर निकलने के बाद किसान मीडिया के सामने अपना पक्ष रखने लगा, जहां सुरक्षाकर्मियों से उसकी धक्का-मुक्की हो गई।
स्थिति तनावपूर्ण होते देख सिटी मजिस्ट्रेट बजरंग बहादुर मौके पर पहुंचे। उन्होंने कानून व्यवस्था का हवाला देते हुए दोनों को हिरासत में लेने के निर्देश दिए। दोपहर करीब 2:00 बजे पुलिस ने शांतिभंग की धाराओं में मामला दर्ज कर दोनों को जेल भेज दिया।
पिता-पुत्र की गिरफ्तारी की खबर मिलते ही स्थानीय कांग्रेस नेता सक्रिय हो गए। कांग्रेस पदाधिकारियों ने सिटी मजिस्ट्रेट से मिलकर तत्काल जमानत की मांग की। वहीं, मजिस्ट्रेट ने यह कहते हुए इनकार कर दिया कि जेल के दरवाजे बंद हो चुके हैं, अब कल ऑफिस समय पर आना।
इस जवाब से नाराज कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने कलेक्ट्रेट परिसर में ही धरना शुरू कर दिया। मामला गरमाता देख शहर कांग्रेस अध्यक्ष ने प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी को सूचित किया, जिन्होंने सीधे कलेक्टर से चर्चा की।
राजनीतिक दबाव और बढ़ते हंगामे के बीच प्रशासन को अपना रुख नरम करना पड़ा। रात करीब 8:35 बजे सिटी मजिस्ट्रेट फिर से कलेक्ट्रेट पहुंचे और कागजी कार्रवाई पूरी करके किसान पिता-पुत्र को जमानत पर रिहा करने के आदेश दिए। लगभग 6 घंटे जेल में रहने के बाद दोनों को बाहर निकाला गया। सुरक्षा के लिहाज से इस दौरान भारी पुलिस बल तैनात था।
इस पूरी कार्रवाई पर सिटी मजिस्ट्रेट बजरंग बहादुर का कहना था कि पिता-पुत्र सिर्फ हंगामा नहीं कर रहे थे, बल्कि अधिकारियों के साथ हाथापाई की स्थिति पैदा कर रहे थे। प्रशासन का कहना है कि अगर इस तरह के दुर्व्यवहार पर सख्ती नहीं दिखाई जाती, तो जनसुनवाई की व्यवस्था पूरी तरह से बिगड़ जाएगी और अराजकता बढ़ जाएगी।
किसान रामनारायण के अनुसार, उनके खेतों तक पहुंचने का रास्ता 1981 की रजिस्ट्री में दर्ज है। इसे 2019 में दबंगों ने बंद कर दिया था। किसान का दावा है कि उसने तहसील, एसडीएम कोर्ट और यहां तक कि हाई कोर्ट से भी केस जीत लिया है। वहीं, स्थानीय प्रशासन आदेशों को लागू कराने में नाकाम रहा है। रास्ता बंद होने के कारण पिछले 3 सालों से उनकी फसल नहीं लग पा रही है। इससे उन्हें भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा है।
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जनसुनवाई में कैसे उपजा विवाद
वहीं, समाधान में हो रही देरी से परेशान किसान का धैर्य जवाब दे गया। किसान ने तैश में आकर अधिकारियों की ओर इशारा करते हुए कहा कि तुम सब बिकाऊ हो, यदि समस्या नहीं सुलझी तो मैं जान दे दूंगा। यह सुनते ही पूरे सभागार में सन्नाटा पसर गया और देखते ही देखते अफरा-तफरी का माहौल बन गया।
सुरक्षाकर्मियों से झड़प के बाद हुई गिरफ्तारी
स्थिति तनावपूर्ण होते देख सिटी मजिस्ट्रेट बजरंग बहादुर मौके पर पहुंचे। उन्होंने कानून व्यवस्था का हवाला देते हुए दोनों को हिरासत में लेने के निर्देश दिए। दोपहर करीब 2:00 बजे पुलिस ने शांतिभंग की धाराओं में मामला दर्ज कर दोनों को जेल भेज दिया।
राजनीतिक मोड़ और जमानत का पेंच
इस जवाब से नाराज कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने कलेक्ट्रेट परिसर में ही धरना शुरू कर दिया। मामला गरमाता देख शहर कांग्रेस अध्यक्ष ने प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी को सूचित किया, जिन्होंने सीधे कलेक्टर से चर्चा की।
देर रात मिली रिहाई
अधिकारियों का तर्क: गरिमा बनाए रखना जरूरी
कोर्ट से जीत, सिस्टम से हार
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