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News in Short
लांजी विधानसभा सीट से भाजपा विधायक राजकुमार कर्राहे के निर्वाचन को चुनौती दी गई थी।
पूर्व विधायक किशोर समरीते का खुद का नामांकन 2023 में रिजेक्ट हुआ था।
कोर्ट में नामांकन रद्द होने को गलत ठहराने वाला कोई कानून नहीं बता पाए हैं।
जस्टिस द्वारका धीश बंसल की सिंगल बेंच ने याचिका खारिज की गई है।
कोर्ट ने माना- 2019 में नामांकन स्वीकार होना एक गलती थी।
News in Detail
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने चुनाव याचिका पर सुनवाई की है। इसमें कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता किशोर समरीते खुद यह साबित नहीं कर पा रहे कि उनका नामांकन रद्द किया जाना कानूनन गलत था। इसलिए दूसरे उम्मीदवार के निर्वाचन को चुनौती देने का कोई आधार नहीं है। कोर्ट ने इसी आधार पर किशोर समरीते की चुनाव याचिका खारिज कर दी है।
भाजपा विधायक की आपत्ति बनी निर्णायक
भाजपा. विधायक राजकुमार कर्राहे की ओर से कोर्ट में आपत्ति उठाई गई थी। इसमें कहा गया कि किशोर समरीते को एक आपराधिक मामले में 5 साल की सजा हो चुकी है। हालांकि सजा पर रोक लगी है, लेकिन दोषसिद्धि खत्म नहीं हुई है। ऐसे में वे खुद निर्वाचन प्रक्रिया पर सवाल उठाने के पात्र नहीं हैं।
अपराधिक प्रकरण के चलते रद्द हुआ था नामांकन फॉर्म
किशोर समरीते ने 1 नवंबर 2023 को संयुक्त क्रांति मोर्चा के प्रत्याशी के रूप में नामांकन भरा था। उनके खिलाफ आपराधिक सजा का हवाला देते हुए आपत्ति पेश की गई थी। इसके बाद निर्वाचन अधिकारी ने उनका नामांकन निरस्त कर दिया था। इसी कार्रवाई को अवैध बताते हुए उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
कोर्ट का सीधा सवाल-कानून कहां है?
पिछली सुनवाई में हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के अधिवक्ता को स्पष्ट निर्देश दिए थे। इसमें कहा था कि वे ऐसा कोई कानून बताएं जिससे यह सिद्ध हो कि सजा पर रोक के बावजूद नामांकन रद्द करना गैरकानूनी है। वहीं, अंतिम सुनवाई में अधिवक्ता ने खुद स्वीकार कर लिया कि ऐसा कोई स्पष्ट कानून उन्हें नहीं मिला है।
2019 में समरीते का नामांकन सिलेक्ट होना था एक गलती
समरीते की ओर से तर्क दिया गया कि 2019 में भी उनके खिलाफ मामला लंबित था, फिर भी उनका नामांकन स्वीकार किया गया था। प्रतिवादियों की ओर से अधिवक्ताओं ने इस पर आपत्ति जताते हुए इसे एक गलती बताया था। साथ ही, यह भी बताया कि पिछले चुनाव में उन्हें मात्र 5000 वोट मिले थे। इस पर कोर्ट ने साफ कहा कि यदि 2019 में कोई गलती हुई थी, तो उसे मिसाल बनाकर दोहराने की मांग नहीं की जा सकती है।
2009 में मिली थी सजा, सुप्रीम कोर्ट से राहत
किशोर समरीते को वर्ष 2009 में आईपीसी की धाराओं 335/149, 332/149, 327/149 और 147 के तहत दोषी ठहराया गया था। हालांकि 2010 में सजा पर राहत मिली, लेकिन 6 मई 2024 को हाईकोर्ट ने उनकी अपील खारिज कर दी थी। बाद में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई थी। जहां सजा पर रोक लगी, लेकिन मामला समाप्त नहीं हुआ था।
कानून राजनीतिक तर्कों से नहीं चलता - HC
हाईकोर्ट ने साफ संदेश दिया कि चुनावी कानून भावनाओं या राजनीतिक तर्कों से नहीं, बल्कि ठोस वैधानिक आधार से चलता है। जब खुद के नामांकन रद्द होने को चुनौती देने का कोई कानूनी हथियार नहीं मिला, तो दूसरे के निर्वाचन को चुनौती देना टिक नहीं सका।
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