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5 पॉइंट में समझें खबर के मायने....
बजट का 70.87% हिस्सा फिक्स खर्चों में खर्च हो रहा है।
लाड़ली बहना योजना पर हर महीने 1890 करोड़ खर्च हैं।
वेतन, भत्तों और पेंशन पर सालाना 95 हजार करोड़ खर्च हो रहे हैं।
जीएसटी और माइनिंग रेवेन्यू में 10 हजार करोड़ की कमी आई है।
विकास कार्यों के 18 हजार करोड़ रुपए राजस्व खर्च में चले गए।
बजट का बड़ा हिस्सा कहां जा रहा है?
मध्य प्रदेश के बजट को लेकर एक बड़ा और चौंकाने वाला खुलासा सामने आया है। वित्त विभाग की रिपोर्ट ने राज्य के बजट की जो तस्वीर पेश की है, उसने हर किसी को हैरान कर दिया है। वित्त विभाग कि अप्रैल-सितंबर छमाही रिपोर्ट के अनुसार, प्रदेश का बजट अब सरप्लस से निकलकर घाटे की ओर बढ़ रहा है। राज्य के कुल 4.21 लाख करोड़ के बजट का करीब 71 प्रतिशत हिस्सा मुफ्त योजनाओं, वेतन-पेंशन और कर्ज चुकाने में ही खत्म हो रहा है।
हालात इतने खराब हो गए हैं कि जो 18 हजार करोड़ रुपए सड़कों, बिजली और पानी जैसे विकास के कामों के लिए रखे गए थे, उन्हें भी सरकार को अपनी रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने के लिए इस्तेमाल करना पड़ा। पूरा मामला जानने के लिए खबर को अंत तक पढ़ें।
प्रमुख योजनाओं पर सालाना खर्च
लाड़ली बहना योजना सबसे बड़ी कैश ट्रांसफर स्कीम है। इस पर सालाना 22 हजार 680 करोड़ रुपए खर्च किए जा रहे हैं। बिजली सब्सिडी पर सरकार 7 हजार करोड़ रुपए दे रही है। मुख्यमंत्री किसान कल्याण योजना पर 5 हजार करोड़ से अधिक खर्च हो रहे हैं। मुफ्त राशन योजना पर भी 2 हजार 800 करोड़ खर्च हो रहै हैं।
विकास कार्यों पर पड़ा बुरा असर
बजट की कमी से भोपाल के बड़े प्रोजेक्ट रुक गए हैं। पश्चिमी और पूर्वी बायपास का काम अब खिसक गया है। 1500 करोड़ का एलीवेटेड फ्लाइओवर प्रोजेक्ट भी आगे बढ़ेगा। भोपाल-इंदौर मेट्रो प्रोजेक्ट का काम अब छोटे सेक्शन में होगा। सड़क निर्माण के 45 हजार करोड़ के काम भी प्रभावित हैं।
राजस्व में कमी के मुख्य कारण
सरकार की आय के मुकाबले खर्च तेजी से बढ़ा है। जीएसटी और माइनिंग से उम्मीद के मुताबिक कमाई नहीं हुई। इनमें करीब 8 से 10 हजार करोड़ की कमी आई है। जीएसटी रिफॉर्म के कारण भी राजस्व पर असर पड़ा है। इससे बजट का वित्तीय संतुलन पूरी तरह बिगड़ गया है।
पूंजीगत बजट का राजस्व में उपयोग
पूंजीगत खर्च के लिए 18 हजार करोड़ रुपए रखे गए थे। रिपोर्ट के अनुसार यह राशि राजस्व खर्च में चली गई। इसका उपयोग वेतन, पेंशन और योजनाओं के भुगतान में हुआ। इसी कारण नए प्रोजेक्ट्स के लिए फंड कम पड़ गया है। वित्त विभाग ने अपनी छह माही रिपोर्ट में यह बताया है।
मामले को लेकर कमलनाथ ने सरकार को घेरा
इस मामले में कांग्रेस नेता कमलनाथ ने अपने X पर पोस्ट कर भाजपा को घेरा। उन्होंने अपनी पोस्ट में कहा कि यदि वित्तीय अनुशासन और पारदर्शिता नहीं रखी गई, तो मध्य प्रदेश का यह आर्थिक संकट लाइलाज हो सकता है।
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विपक्ष का हमला: भ्रष्टाचार और कर्ज का बढ़ता बोझ
प्रदेश सरकार हर साल करीब 58 हजार करोड़ रुपए कर्ज और उसके ब्याज के रूप में चुका रही है। जनता से डीजल-पेट्रोल, रजिस्ट्री और टोल के रूप में भारी टैक्स वसूलने के बावजूद सरकार हर महीने 5 हजार करोड़ का नया कर्ज ले रही है। रिपोर्ट बताती है कि माइनिंग और जीएसटी से उतनी आमदनी नहीं हो रही जितनी होनी चाहिए, जिससे भ्रष्टाचार और सुस्त आर्थिक गतिविधियों के संकेत मिलते हैं।
इस खबर के मायने क्या हैं?
इस खबर का मतलब यह है कि, बजट का बड़ा हिस्सा मुफ्त योजनाओं और वेतन में जा रहा है। इससे विकास कार्यों के लिए पैसा कम बचा है। सरकार को अपने रोजमर्रा के खर्च चलाने के लिए कर्ज और ब्याज का सहारा लेना पड़ रहा है।
यदि आने वाले समय में सरकार की आय नहीं बढ़ी, तो नए प्रोजेक्ट शुरू करना और भी मुश्किल होगा। इसी वित्तीय असंतुलन के कारण भोपाल मेट्रो और बायपास जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स का काम भी आगे खिसक गया है।
आगे क्या?
सरकार को अब अपनी कमाई बढ़ाने के लिए नए तरीके खोजने होंगे। रुके हुए विकास कार्यों को पूरा करने के लिए अब हेम मॉडल का रास्ता अपनाया जाएगा। आने वाले समय में जब लोगों की खरीदारी बढ़ेगी, तो सरकार को जीएसटी से ज्यादा पैसा मिलने की उम्मीद है।
हेम मॉडल:दस्तावेजों के अनुसार, बजट की कमी की वजह से सरकार अब बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए हेम मॉडलका सहारा ले रही है। इस मॉडल में पूरा पैसा एक साथ खर्च नहीं करना पड़ता।
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