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Photograph: (the sootr)
NEWS IN SHORT
- गेस्ट फैकल्टी के भविष्य पर हाईकोर्ट में चल रही 291 याचिकाओं की सुनवाई।
- सरकार ने गेस्ट फैकल्टी को नियमित करने का वादा किया, लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठाए।
- गेस्ट फैकल्टी को निर्धारित वेतन और सुविधाएं नहीं मिल रही, भेदभाव का सामना कर रहे हैं।
- पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने नियुक्ति का वादा किया था, लेकिन भूल गए।
- हाईकोर्ट में सुनवाई पूरी हो चुकी, अब फैसला गेस्ट फैकल्टी के भविष्य को तय करेगा।
NEWS IN DETAIL
BHOPAL. मध्यप्रदेश के सरकारी कॉलेजों में पिछले दो दशकों से शिक्षा की व्यवस्था संभालने वाले अतिथि विद्वान आज खुद को ठगा सा महसूस कर रहे हैं। मामला यह है कि सरकार की नीतियां बार-बार बदल रही हैं, जिससे इन विद्वानों की नौकरी पर हमेशा 'फॉलन आउट' (सेवा से बाहर) होने की तलवार लटकी रहती है। कॉलेज में नियमित प्राध्यापकों की भारी कमी है। जो अनुभवी लोग पढ़ा रहे हैं, उन्हें हटाकर नए सिरे से भर्ती की प्रक्रिया अपनाई जा रही है।
अतिथि विद्वानों का कहना है कि वे सभी पात्रता शर्तें पूरी करते हैं, फिर भी उन्हें वह मान-सम्मान और सुरक्षा नहीं मिल रही, जिसके वे हकदार हैं। चुनावी रैलियों में बड़े-बड़े वादे हुए, पंचायतें बुलाई गईं, लेकिन जमीन पर नतीजा अब तक सिफर ही रहा है।
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हाईकोर्ट में फंसा पेंच: 291 याचिकाओं पर फैसला सुरक्षित
जबलपुर हाईकोर्ट में अतिथि विद्वानों की ओर से लगभग 291 याचिकाएं दायर की गई हैं। इन याचिकाओं पर जस्टिस विशाल धगट की कोर्ट में लंबी सुनवाई चली। कर्मचारियों की तरफ से सुप्रीम कोर्ट के दिग्गज वकील कॉलिन गोंजाल्विस ने मोर्चा संभाला। उन्होंने कोर्ट को बताया कि सरकार विज्ञापन निकालकर और बाकायदा इंटरव्यू लेकर इन लोगों को रखती है। ऐसे में इन्हें 'अस्थाई' कहकर कभी भी निकाल देना पूरी तरह गलत है।
कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। अब पूरे प्रदेश के 5000 से अधिक अतिथि विद्वानों की नजरें इसी ऐतिहासिक फैसले पर टिकी हैं। अगर फैसला उनके हक में आता है, तो सरकार को नियमितीकरण की दिशा में कदम उठाने ही होंगे। हाल ही में 70,80,90 फीसदी वेतन के मामले में भी हाईकोर्ट ने सरकार की नीति को समान काम समान वेतन के सिद्धांत के खिलाफ मानते हुए फैसला सुनाया है।
नियमित सुनवाई के बाद फैसले का इंतजार-
उच्च शिक्षा विभाग, मध्य प्रदेश लोकसेवा आयोग और सरकार के खिलाफ गेस्ट फैकल्टी की 291 याचिकाओं पर सुनवाई जारी है। 13 अक्टूबर 2025 को हाईकोर्ट में रजिस्टर्ड याचिका 40861 से पुरानी सभी याचिकाओं को कनेक्ट कर एक साथ नियमित सुनवाई की जा रही है। 14 जनवरी को हाईकोर्ट में जस्टिस विशाल धगट की कोर्ट याचिकाकर्ताओं और सरकारी पक्ष को सुन चुका है।
इन याचिकाओं पर सुनवाई के लिए जनवरी 2026 में 8, दिसम्बर 2025 में 6 और नवम्बर 2025 में भी 6 तारीख लग चुकी हैं। हाईकोर्ट में गेस्ट फैकल्टी की सुनवाई के दौरान भी सरकार का पक्ष जहां पुरानी दलीलों पर अड़ा रहा। सरकार के वकीलों की दलीलें याचिकाकर्ताओं की ओर से पैरवी करने आए सुप्रीम कोर्ट के सीनियर एडवोकेट कॉलिन गोंजाल्विस, हाईकोर्ट एडवोकेट एलसी पाटने के सामने फीकी पड़ गईं।
ट्रांसफर- नियुक्ति पर फॉलेन आउट का खेल
गेस्ट फैकल्टी की ओर से अपने भविष्य और आजीविका की सुरक्षा को लेकर हाईकोर्ट में याचिका पेश की है। प्रदेश में साढ़े 5 हजार से ज्यादा स्वीकृत पदों पर गेस्ट फैकल्टी कॉलेजों में पढ़ाई करा रहे हैं। उनका काम नियमित प्राध्यापकों के समान है लेकिन न तो उनके लिए निर्धारित और नियमित वेतन की व्यवस्था है और न ही प्राध्यापकों को मिलने वाली सुविधाएं उन्हें दी जा रही हैं। इसके विपरीत कॉलेजों में ट्रांसफर और नियुक्ति की स्थिति में उन्हें कभी भी बाहर यानी फॉलेन आउट कर दिया जाता है।
गेस्ट फैकल्टी का कहना है सरकार कई बार डेढ़- दो दशकों से पढ़ा रहे अतिथि विद्धानों को नियमित करने, निर्धारित वेतन और अन्य सुविधाएं देने का आश्वासन देती रही है। पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सीएम हाउस में पंचायत बुलाकर अतिथि विद्धानों को भविष्य सुरक्षित करने और नियमित करने की घोषणा की थी, लेकिन चुनाव के बाद सरकार यह घोषणा भूल गई है।
निर्धारित मासिक वेतन देने से परहेज
सरकार ने गेस्ट फैकल्टी को पीरियड के आधार पर 50 हजार रुपए मासिक वेतन देने का निर्धारण किया था लेकिन इस पर अमल ही नहीं हो रहा है। उनसे नियमित प्राध्यापकों के समान काम तो लिया जाता है लेकिन कॉलेजों में भी उनके साथ भेदभाव हो रहा है। उनके लिए एप्लीकेशन पर ऑनलाइन अटेंडेंस के अलग नियम है जबकि नियमित प्राध्यापकों को इन्हीं नियमों में छूट दे दी गई है। सिलेबस पिछड़ने या रिजल्ट प्रभावित होने पर जिम्मेदारी उन पर थोप दी जाती है और नियमित प्राध्यापकों की कमियों को अनदेखा कर दिया जाता है।
नियुक्ति नियम समान फिर भी भेदभाव
हाईकोर्ट में गेस्ट फैकल्टी की मांगों के समर्थन में सीनियर एडवोकेट कॉलिन गोंजाल्विस ने सरकार की उदासीनता पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कोर्ट को बताया कि गेस्ट फैकल्टी की नियुक्ति सरकार द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के आधार पर होती है। इसके लिए विज्ञापन जारी होता है, आवेदन जमा कराए जाते हैं और इंटरव्यू भी होता है। इसके बावजूद उन्हें कभी भी हटा दिया जाता है।
ऐसे मामलों में गेस्ट फैकल्टी के समर्थन में कई फैसले सुनाए जा चुके हैं लेकिन सरकार ऐसा व्यवहार करती है जैसे ये फैसले हुए ही नहीं। गेस्ट फैकल्टी नियमित प्राध्यापकों से संबंधित सभी योग्यता रखते हैं, उनकी नियुक्ति के दौरान उच्च शिक्षा विभाग भी यही मानता है। कोर्ट के फैसलों के बाद भी सरकार नियमों का हवाला देकर अड़ी हुई है। जब निर्णय उनके खिलाफ आता है तो सरकार दूसरे नियम का हवाला देकर मामले को अटका देती है।
वादा किया लेकिन अब की जा रही अनदेखी
याचिकाकर्ताओं की ओर से कोर्ट को बताया गया कि तत्कालीन सरकार ने अतिथि विद्धानों को नियमित पद आने पर नियुक्ति का भरोसा दिलाया था। पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के सरकारी आवास पर हुई पंचायत में इसकी मंच से घोषणा भी की गई थी लेकिन अब उन्हें फॉलेन आउट के नोटिस थमा दिए जाते हैं। नियमित नियुक्तियों में उन्हें 50 फीसदी आरक्षण दिया गया है, लेकिन नियुक्तियां इतनी कम आ रही हैं कि ज्यादातर गेस्ट फैकल्टी इनसे वंचित ही रह जाती है।
उनका कहना था जब सरकार उन्हें इस पद पर काम करने के लिए योग्य मानती है। वे सभी पात्रता पूरी करते हैं तो साल 1989 की तरह उन्हें नियमित नियुक्ति देने की जगह नए पाठ्यक्रमों के साथ पढ़कर आए युवाओं के साथ प्रतिस्पर्धा करने के लिए मजबूर क्यों किया जा रहा है।
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हरियाणा पैटर्न पर समिति भी दिखावा
गेस्ट फैकल्टी ने सरकार की नीयत पर सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है सरकार हाईकोर्ट से फैसला आने का इंतजार कर रही है। इसी वजह से गेस्ट फैकल्टी को भ्रमित करने के लिए हरियाणा सरकार की नीतियों के अध्ययन के लिए समिति का गठन किया गया है। इस समिति को 7 जनवरी को रिपोर्ट देनी थी लेकिन अब तक उसने क्या अध्ययन किया इसकी कोई खबर ही नहीं है। इससे साफ है सरकार गेस्ट फैकल्टी को सामाजिक सुरक्षा देने के नाम पर छलावा कर रही है। उधर हाईकोर्ट में गेस्ट फैकल्टी की 291 याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई पूरी हो चुकी है।
सरकार भी अपना पक्ष रख चुकी है। ऐसे में अब निर्णय हाईकोर्ट के पास सुरक्षित है। प्रदेश के पांच हजार से ज्यादा अतिथि विद्धानों का भविष्य इस निर्णय पर निर्भर है। उनका मानना है सरकार की ओर से पुरानी दलीलें और नियुक्ति नियमों का हवाला दिया गया है। जबकि उनकी ओर से मजबूत तर्क रखे गए हैं। ऐसे में उन्हें कोर्ट से ही सामाजिक सुरक्षा का आस है।
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