पीजी के बाद ग्रामीण सेवा बॉन्ड से इन-सर्विस डॉक्टरों को HC से राहत

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने सरकारी अस्पतालों में काम कर रहे डॉक्टरों को बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने कहा कि पहले से काम कर रहे डॉक्टर को पीजी (पोस्ट ग्रेजुएशन) पूरा करने के बाद ग्रामीण सेवा का बॉन्ड नहीं भरना पड़ेगा। यह नियम केवल नए डॉक्टरों पर लागू होगा।

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Neel Tiwari
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News In Short

  • एमपी हाईकोर्ट ने इन-सर्विस सरकारी डॉक्टरों को पीजी के बाद ग्रामीण सेवा बॉन्ड से मुक्त किया।

  • कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ग्रामीण सेवा बॉन्ड की शर्त केवल नए अभ्यर्थियों पर लागू होगी।

  • जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की खंडपीठ ने नियम 11 की व्याख्या की।

  • डॉ. दीपाली बैरवा की याचिका पर आदेश, मूल शैक्षणिक दस्तावेज लौटाने के निर्देश।

  • मप्र में ग्रामीण सेवा न करने पर 10 से 30 लाख रुपए तक के बॉन्ड प्रावधान पर असर।

News In Detail

नियमों की स्पष्ट व्याख्या, इन-सर्विस डॉक्टर अलग श्रेणी में

यह अहम फैसला जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की खंडपीठ ने सुनाया है। कोर्ट ने मध्य प्रदेश के स्वायत्त मेडिकल और दंत स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम प्रवेश नियम 2017 की व्याख्या की। कोर्ट ने कहा कि नियम 11 के तहत ग्रामीण सेवा का बॉन्ड केवल नए उम्मीदवारों के लिए है। पहले से काम कर रहे डॉक्टरों को इसके लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। इन-सर्विस डॉक्टर, जो पहले से सरकारी सेवा में हैं, इस श्रेणी में नहीं आते।

डॉ. दीपाली बैरवा की याचिका पर आया आदेश

यह आदेश डॉ. दीपाली बैरवा की याचिका पर आया है। डॉ. बैरवा ने कोर्ट से अपील की थी कि उन्हें ग्रामीण सेवा बॉन्ड से मुक्त किया जाए। साथ ही, उन्होंने अपने शैक्षणिक दस्तावेज वापस करने की मांग की थी। कोर्ट ने उनके तर्कों को मानते हुए उन्हें राहत दी और दस्तावेज लौटाने का आदेश दिया।

ग्रामीण सेवा बॉन्ड भरना होता है अनिवार्य

मध्य प्रदेश में मेडिकल पढ़ाई या पीजी पूरी करने के बाद डॉक्टरों के लिए एक वर्ष की ग्रामीण सेवा अनिवार्य की गई है। यदि कोई डॉक्टर यह सेवा नहीं करता, तो उसे निर्धारित बॉन्ड राशि जमा करनी होती है। यह राशि कोर्स और लागू नियमों के अनुसार लगभग 10 लाख से 30 लाख रुपए तक होती है।

सरकारी डॉक्टरों के लिए मिसाल बना फैसला

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट का यह फैसला प्रदेश के उन डॉक्टरों के लिए एक मिसाल है, जो असमंजस में थे। पीजी के बाद ग्रामीण सेवा बॉन्ड को लेकर उनकी स्थिति अब साफ हो गई है। कोर्ट के इस फैसले से सरकारी डॉक्टरों को न सिर्फ कानूनी राहत मिली, बल्कि आर्थिक और प्रशासनिक राहत भी मिली है।

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