मध्यप्रदेश 27% OBC आरक्षण मामले में हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने पहुंची राज्य सरकार
MP OBC Reservation: सरकार की SLP के साथ दो भाजपा नेता भी पहुंचे SC, सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में यह होगी संभावनाएं
Neel Tiwari | Oct 19, 2026, 13:56 IST
मध्यप्रदेश 27% OBC आरक्षण मामले में हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने पहुंची राज्य सरकार
हाईकोर्ट से 27% OBC आरक्षण रद्द होने के बाद राज्य सरकार, भाजपा पिछड़ा वर्ग मोर्चा के अध्यक्ष और राजगढ़ विधायक अमर सिंह यादव सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए हैं। वहीं, यूथ फॉर इक्वलिटी ने भी कैविएट दाखिल किया है। आइए विस्तार से जानते हैं सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान क्या-क्या हो सकता है...
हाईकोर्ट के फैसले से शुरू हुई नई लड़ाई
सुप्रीम कोर्ट में कौन-कौन पहुंचा
सरकार किन आधारों पर दे सकती है चुनौती
सरकार यह भी सवाल उठा सकती है कि जब EWS को 10% आरक्षण देने की मंजूरी मिल चुकी है, तो पिछड़े वर्ग के लिए सीमा इतनी सख्त क्यों है।
सरकार का कहना होगा कि किस वर्ग को कितना प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए, यह तय करना राज्य का काम है, अदालत का नहीं। यह भी मांग हो सकती है कि जो नियुक्तियां हो चुकी हैं, वे इस फैसले से प्रभावित न हों।
सरकार की सबसे बड़ी मुश्किल क्या है
सुप्रीम कोर्ट आमतौर पर ऐसे मामलों में तथ्यों से जुड़े निष्कर्षों में दखल नहीं देता। इसलिए सरकार के लिए आंकड़ों की कमी को सिर्फ दलीलों के दम पर पूरा करना मुश्किल होगा। इसके अलावा, पिछड़ा वर्ग आयोग (NCBC) से सलाह न लेने और जल्दबाजी में अध्यादेश लाने का मुद्दा भी सरकार के लिए परेशानी खड़ी कर सकता है।
सामान्य वर्ग कैसे करेगा बचाव
सामान्य वर्ग यह भी दलील देगा कि आंध्र प्रदेश में स्थानीय निकायों में 34% OBC आरक्षण के खिलाफ सरकार की SLP सुप्रीम कोर्ट ने 9 अक्टूबर 2026 को खारिज कर दी थी। इस मामले में आधार के तौर पर इस्तेमाल किए गए आंकड़ों की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठे थे। उसका तर्क होगा कि ठोस आंकड़ों के बिना आरक्षण की सीमा नहीं बढ़ाई जा सकती।
कैविएट का असली मतलब
भाजपा नेताओं की SLP पर सबसे बड़ा सवाल
संविधान के अनुच्छेद 136 में याचिका दायर करने के लिए पक्षकार होना जरूरी नहीं है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट उनकी याचिकाएं सुनने की अनुमति दे सकता है। हालांकि, अदालत यह भी देखेगी कि वे इस फैसले से सीधे प्रभावित हुए हैं या नहीं।
उनके पक्ष में दलील दी जा सकती है कि यह फैसला लाखों पिछड़े वर्ग के लोगों को प्रभावित करता है। वहीं विरोध में कहा जा सकता है कि वे हाईकोर्ट में पक्षकार नहीं थे और राज्य सरकार पहले ही SLP दायर कर चुकी है। ऐसे में उनकी याचिकाओं को राजनीतिक या वैचारिक हित से जुड़ा बताया जा सकता है। यही सवाल विधायक अमर सिंह यादव की SLP पर भी उठ सकता है।
इन तीनों SLP की कानूनी हैसियत बराबर नहीं है। राज्य सरकार हाईकोर्ट में प्रतिवादी थी। इसलिए वह सीधे पीड़ित पक्ष मानी जाएगी। मोर्चा अध्यक्ष और विधायक अमर सिंह यादव हाईकोर्ट में पक्षकार नहीं थे। इसलिए उनकी याचिकाओं में पहला सवाल यही होगा कि वे सुनी जाने लायक हैं या नहीं।
गैर-पक्षकार की याचिका पर क्या कहता है कानून
अमर सिंह यादव के पक्ष में दलील दी जा सकती है कि वे जनप्रतिनिधि हैं। इस फैसले का असर पिछड़े वर्ग के बड़े हिस्से पर पड़ेगा। वहीं विरोध में कहा जा सकता है कि राज्य सरकार पहले ही याचिका दायर कर चुकी है। ऐसे में एक ही मुद्दे पर दो याचिकाएं दायर करने का कोई अलग आधार नहीं बनता।
वहीं अगर SLP की सीधी सुनवाई पर सवाल उठा तब भी रास्ता बंद नहीं होता। सबसे आम तरीका यह है कि अदालत इन्हें सरकार की SLP के साथ जोड़कर सुने और उन्हें हस्तक्षेपकर्ता के रूप में अपनी बात रखने दे।
इसका फायदा यह होगा कि वे सुनवाई में शामिल रहेंगे पर अलग से स्टे जैसी मांग करने का उनका अधिकार कमजोर रहेगा। अब अदालत का रुख यही देखने लायक होगा। अब तक यह सिर्फ एक कानूनी विश्लेषण है, किसी अदालती आदेश का हवाला नहीं।
सुनवाई में क्या-क्या हो सकता है
दूसरी संभावना यह है कि कोर्ट कुछ शर्तों के साथ राहत दे। छत्तीसगढ़ में 58% आरक्षण के मामले में 1 मई 2023 को हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाई गई थी। साथ ही भर्तियों को अंतिम फैसले के अधीन रखा गया था।
तीसरी संभावना है कि कोर्ट इस मामले को पहले से लंबित मामलों के साथ जोड़ दे। चौथी संभावना मामले को बड़ी बेंच के पास भेजने की है। हालांकि इसकी संभावना कम दिखती है।
मामला सुनवाई के लिए लिस्ट होने के बाद पहली सुनवाई में ही पता चलेगा कि कोर्ट क्या रुख अपनाता है। फिलहाल इनमें से कुछ भी तय नहीं है। ये सिर्फ हमारी लीगल एक्सपर्ट टीम के अनुमान हैं।
भाजपा विधायक अमर सिंह यादव की याचिका
सरकार के लिए राजनीतिक और कानूनी परीक्षा
सरकार, भाजपा पिछड़ा वर्ग मोर्चा और विधायक की अलग-अलग याचिकाएं राजनीतिक संदेश तो दे सकती हैं, लेकिन कानूनी तौर पर सबके तर्क लगभग एक जैसे रहेंगे। इसलिए अंतिम नतीजा ज्यादातर इस पर टिकेगा कि हाईकोर्ट के तथ्यात्मक निष्कर्षों को सुप्रीम कोर्ट कितना छूता है।
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