खतरे में एमपी के लाखों शिक्षकों की पेंशन: शिक्षा विभाग बोला- ये शिक्षक नहीं निकाय कर्मचारी हैं

Aman Vaishnav | May 15, 2026, 09:34 IST
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mp teachers pension seniority dispute high court affidavit
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एमपी के 3 लाख शिक्षकों की पेंशन और 20 साल की सीनियॉरिटी पर खतरा मंडरा रहा है। हलफनामे में शिक्षा विभाग ने कोर्ट को बताया कि 2018 से पहले भर्ती होने वाले शिक्षक, संविदा टीचर और अध्यापक सरकारी कर्मचारी नहीं थे। ये सीधे पंचायत और नगर निकाय के कर्मचारी थे।

मध्य प्रदेश में लगभग तीन लाख पुराने शिक्षक अब अपने पेंशन और 20 साल की सीनियॉरिटी को लेकर परेशान हैं। लोक शिक्षण संचालनालय के डायरेक्टर और ओआईसी ने जबलपुर हाई कोर्ट में जो हलफनामा दाखिल किया है। इससे इन शिक्षकों की स्थिति पर सवाल खड़े हो गए हैं।

शिक्षक पंचायत और नगर निकाय के कर्मचारी

हलफनामे में स्कूल शिक्षा विभाग ने कोर्ट को बताया कि 2018 से पहले 1997, 1998, 2001 और 2005 में भर्ती होने वाले शिक्षक, संविदा टीचर और अध्यापक सरकारी कर्मचारी नहीं थे।

ये सीधे पंचायत और नगर निकाय के कर्मचारी थे। विभाग का कहना है कि 73वें और 74वें संविधान संशोधन के बाद स्कूलों का प्रशासन पंचायत और निकायों को दे दिया गया था।

शिक्षक सिविल सेवा पेंशन नियमों से बाहर

इन शिक्षकों को 2018 में नया कैडर बनाकर फिर से नियुक्त किया गया था। क्योंकि 2011 से पहले निकायों में पेंशन का कोई सिस्टम नहीं था। इसलिए ये शिक्षक सिविल सेवा पेंशन नियमों के तहत शामिल नहीं होते हैं।

सरकार के मुताबिक उनकी सीनियॉरिटी केवल 2018 से गिनी जाएगी। इससे ये डर पैदा हो गया है कि 1997 से 2018 तक की उनकी सेवा जैसे शून्य मानी जा सकती है।

विभाग का हलफनामा विरोधाभासी

वहीं शिक्षकों की तरफ से अध्यापक राजेश मिश्रा पैरवी कर रहे हैं। राजेश मिश्रा का कहना है कि विभाग का हलफनामा खुद में ही विरोधाभासी है। भर्ती तो निकायों के जरिए हुई थी, लेकिन इन शिक्षकों को वेतन स्कूल शिक्षा विभाग के बजट से ही मिला है।

शिक्षकों ने कोर्ट को बताया कि मंदसौर जैसे कई निकायों ने लिखित में माना कि ये शिक्षक उनके नियंत्रण में नहीं थे। शिक्षकों ने मांग की है कि पूरी सेवा अवधि को पेंशन और सीनियॉरिटी में शामिल किया जाए।

पंचायत और नगर निकाय सिर्फ एक भर्ती एजेंसी

असल में पंचायत और नगर निकाय सिर्फ एक भर्ती एजेंसी की तरह काम कर रहे थे। कैग की 2023-24 की रिपोर्ट भी ये बताती है कि एमपी में स्कूलों की जमीन-जायदाद और स्टाफ का असली नियंत्रण कभी पंचायतों को नहीं दिया गया। शिक्षकों की ट्रांसफर पॉलिसी और ट्रेनिंग प्रोग्राम जैसी चीजें हमेशा मंत्रालय से ही तय होती रही है।

हलफनामा देकर मुकरे अफसर

दूसरी ओर डीपीआई डायरेक्टर केके द्विवेदी ने कहा कि उन्होंने कोई हलफनामा नहीं दिया है। जानकारी के अनुसार इस मामले की सुनवाई 3 जुलाई को होगी।

वहीं निकाय का कहना है कि हमने तो सिर्फ भर्ती कराई थी। पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग और नगरीय विकास और आवास विभाग दोनों के अफसरों ने भी यही बात कही कि ये शिक्षक हमारे कर्मचारी नहीं रहे।

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