आदिवासी Gen-z को लेकर मप्र सरकार में मंथन, सीएम हाउस में नेताओं की बैठक
Jitendra Shrivastava | Aug 24, 2026, 19:00 IST
Photograph: (THESOOTR)
BHOPAL. बालाघाट में बच्चों की मौत और जयस के बढ़ते असर के बीच मध्य प्रदेश सरकार ने आदिवासी जेन जी को साधने के लिए बैठक बुलाई। जानिए बीजेपी की रणनीति और आदिवासी नेताओं की नाराजगी की पूरी कहानी।
देशभर में चल रहे जेन जी के प्रदर्शनों को लेकर मप्र सरकार भी गंभीर है। सरकार की चिंता इस स्तर तक है कि सोमवार 24 अगस्त को आनन- फानन एक गोपनीय मीटिंग की गई। मुद्दा था- आदिवासियों का नेतृत्व करने वाले बड़े चेहरे की तलाश और आदिवासी जेन जी (Gen-z) को पार्टी से जोड़ने की कवायद।
बैठक में सबसे बड़ी चिंता यह भी जताई गई कि कहीं स्कूल और हॉस्टलों की खराब हालत को आदिवासी युवा जयस के साथ न जुड़ जाएं। बता दें कि इस बैठक में सरकार के सभी जिम्मेदारी मंत्री- सांसदों सहित बीजेपी के आदिवासी विधायक भी शामिल रहे।
दरअसल, बालाघाट के बिरसा इलाके में बीमारी से 24 बच्चों की मौत हो चुकी है। यह इलाका बैगा आदिवासी बहुल है। इसी बीच आदिवासी जयस संगठन का असर लगातार बढ़ रहा है। सरकार अब आदिवासी युवाओं को पार्टी से जोड़ने की कोशिश में जुट गई है।
मध्य प्रदेश में 230 में से 47 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। इसके अलावा करीब 84 सीटों पर आदिवासी वोट सीधा असर डालता है।
2013 में बीजेपी ने इन सीटों पर बड़ी जीत दर्ज की थी। लेकिन 2018 में तस्वीर बदल गई। बीजेपी सिर्फ 34 सीटों पर सिमट गई। कांग्रेस को 30 सीटें मिलीं। इन्हीं एसटी सीटों ने कांग्रेस को सत्ता तक पहुंचाया था। जाहिर है सरकार किसी भी तरह की चूक नहीं करना चाहती है।
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बालाघाट के बिरसा और बैहर इलाके के गांवों में पिछले डेढ़ महीने से बीमारी फैली है। जिला प्रशासन ने शुरू में सिर्फ 8 मौतों की पुष्टि की। स्थानीय विधायक और कांग्रेस नेताओं ने 19 से 24 बच्चों की मौत का दावा किया।
जांच में सामने आया कि मौतों की मुख्य वजह मीजल्स, मलेरिया और कुपोषण है। सरकार के शुरुआती दावे में इसे दूषित पानी बताया गया था, लेकिन ICMR की रिपोर्ट ने संक्रमण की पुष्टि की।
टीकाकरण में हुई लापरवाही भी बड़ी वजह निकली। जिला टीकाकरण अधिकारी परेश उपलप और जिला मलेरिया अधिकारी मनीषा जुनेजा को हटाया गया।
डिप्टी सीएम राजेंद्र शुक्ल 22 अगस्त को प्रभावित गांव मछुरदा पहुंचे। जनजाति मंत्री कुंवर विजय शाह ने भी दौरा किया। लेकिन सवाल यह है, क्या यह दौरे नुकसान के बाद की भरपाई भर हैं?
एक बात और समझनी होगी। सिर्फ बालाघाट अकेला मुद्दा नहीं है। छतरपुर के बुंदेलखंड इलाके में केन बेतवा परियोजना को लेकर आदिवासी परिवार महीनों से सत्याग्रह कर रहे हैं।
इस परियोजना से करीब 21 गांवों के 7,000 परिवार प्रभावित होंगे। सरकार प्रति एकड़ करीब साढ़े 12 लाख रुपए मुआवजा दे रही है, लेकिन जमीन, जंगल और आजीविका का नुकसान इससे पूरा नहीं होता। यही गुस्सा कहीं न कहीं आदिवासी युवाओं के मन में जमा हो रहा है।
और यही वो जगह है जहां जयस जैसा संगठन मजबूत होता दिखता है। 2012 में बना यह संगठन अब मध्य प्रदेश के अलावा कई राज्यों में सक्रिय है। इसका सीधा दावा है कि प्रदेश की दर्जनों सीटों पर हार जीत आदिवासी वोट से तय होती है।
सीएम मोहन यादव खुद इस बैठक की अगुआई कर रहे थे। बीजेपी के आदिवासी सांसद और विधायक इसमें मौजूद रहे। बीजेपी का कहना है कि सरकार आदिवासी कल्याण के लिए लगातार काम कर रही है और अधिकारियों पर तुरंत कार्रवाई हुई है।
अगर सरकार सिर्फ बैठकों तक सीमित रही तो नाराजगी और बढ़ सकती है। स्कूल, अस्पताल और पुनर्वास जैसे मुद्दों पर ठोस काम दिखना जरूरी होगा। 2028 के विधानसभा चुनाव से पहले यह मुद्दा बार बार सामने आएगा।
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बैठक में सबसे बड़ी चिंता यह भी जताई गई कि कहीं स्कूल और हॉस्टलों की खराब हालत को आदिवासी युवा जयस के साथ न जुड़ जाएं। बता दें कि इस बैठक में सरकार के सभी जिम्मेदारी मंत्री- सांसदों सहित बीजेपी के आदिवासी विधायक भी शामिल रहे।
दरअसल, बालाघाट के बिरसा इलाके में बीमारी से 24 बच्चों की मौत हो चुकी है। यह इलाका बैगा आदिवासी बहुल है। इसी बीच आदिवासी जयस संगठन का असर लगातार बढ़ रहा है। सरकार अब आदिवासी युवाओं को पार्टी से जोड़ने की कोशिश में जुट गई है।
मप्र में क्यों जरूरी हैं आदिवासियों का साथ
2013 में बीजेपी ने इन सीटों पर बड़ी जीत दर्ज की थी। लेकिन 2018 में तस्वीर बदल गई। बीजेपी सिर्फ 34 सीटों पर सिमट गई। कांग्रेस को 30 सीटें मिलीं। इन्हीं एसटी सीटों ने कांग्रेस को सत्ता तक पहुंचाया था। जाहिर है सरकार किसी भी तरह की चूक नहीं करना चाहती है।
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आदिवासियों के मुद्दे पर सरकार अचानक क्यों सक्रिय हुई?
जांच में सामने आया कि मौतों की मुख्य वजह मीजल्स, मलेरिया और कुपोषण है। सरकार के शुरुआती दावे में इसे दूषित पानी बताया गया था, लेकिन ICMR की रिपोर्ट ने संक्रमण की पुष्टि की।
टीकाकरण में हुई लापरवाही भी बड़ी वजह निकली। जिला टीकाकरण अधिकारी परेश उपलप और जिला मलेरिया अधिकारी मनीषा जुनेजा को हटाया गया।
डिप्टी सीएम राजेंद्र शुक्ल 22 अगस्त को प्रभावित गांव मछुरदा पहुंचे। जनजाति मंत्री कुंवर विजय शाह ने भी दौरा किया। लेकिन सवाल यह है, क्या यह दौरे नुकसान के बाद की भरपाई भर हैं?
एक बात और समझनी होगी। सिर्फ बालाघाट अकेला मुद्दा नहीं है। छतरपुर के बुंदेलखंड इलाके में केन बेतवा परियोजना को लेकर आदिवासी परिवार महीनों से सत्याग्रह कर रहे हैं।
इस परियोजना से करीब 21 गांवों के 7,000 परिवार प्रभावित होंगे। सरकार प्रति एकड़ करीब साढ़े 12 लाख रुपए मुआवजा दे रही है, लेकिन जमीन, जंगल और आजीविका का नुकसान इससे पूरा नहीं होता। यही गुस्सा कहीं न कहीं आदिवासी युवाओं के मन में जमा हो रहा है।
और यही वो जगह है जहां जयस जैसा संगठन मजबूत होता दिखता है। 2012 में बना यह संगठन अब मध्य प्रदेश के अलावा कई राज्यों में सक्रिय है। इसका सीधा दावा है कि प्रदेश की दर्जनों सीटों पर हार जीत आदिवासी वोट से तय होती है।
कौन-कौन शामिल रहे
बैठक में क्या-क्या खास रहा
- सरकार बालाघाट में 24 आदिवासी बच्चों की मौत के बाद चिंतित है।
- लगातार शिकायतें आ रही हैं कि प्रदेश के आदिवासी और सरकारी स्कूल व छात्रावासों की हालत खराब है।
- राजनीतिक दृष्टि से आदिवासी संगठन जयस प्रदेश में काफी सक्रिय है।
- इससे सरकार चिंतित है कि कहीं आदिवासी युवा जयस के साथ सड़कों पर न उतर आएं।
- इस संगठन के साथ सबसे ज्यादा आदिवासी युवा जुड़े हुए हैं।
- बैठक में आदिवासियों के हित में नई योजनाओं की घोषणाएं करने पर भी चिंतन हुआ।
आगे क्या होगा
FAQ
- जयस संगठन क्या है?
जय आदिवासी युवा शक्ति यानी जयस 2012 में बना एक आदिवासी संगठन है। यह मध्य प्रदेश की कई आरक्षित सीटों पर असरदार माना जाता है। इसके संस्थापक डॉ हीरालाल अलावा हैं। - मध्य प्रदेश में आदिवासी वोट बैंक कितना अहम है?
प्रदेश में 47 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। करीब 84 सीटों पर आदिवासी वोट सीधा असर डालता है। 2018 में यही वोट बैंक सत्ता परिवर्तन की बड़ी वजह बना था। - बालाघाट में बच्चों की मौत की असली वजह क्या है?
जांच में मीजल्स, मलेरिया और कुपोषण मुख्य वजह सामने आई है। टीकाकरण में लापरवाही भी बड़ा कारण रही। मौतों का सही आंकड़ा अब भी विवादित है।
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