एमपी के इस गांव में फसल बीमा के नाम पर किसानों के साथ धोखा! मिले सिर्फ 17 रुपए

जबलपुर जिले में किसानों को फसल बीमा के तहत बहुत कम मुआवजा मिल रहा है। कुछ गांवों में किसानों को सिर्फ 17 रुपए दिए गए हैं। सैटेलाइट पद्धति से आकलन पर किसानों ने सवाल उठाया है और इसका विरोध किया है।

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Sandeep Kumar
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MP के जबलपुर जिले में इस बार किसानों को फसल बीमा के तहत 3.20 करोड़ रुपए का मुआवजा मिला। इसके बावजूद भी सर्वे प्रक्रिया में एक बड़ी गड़बड़ी सामने आई है। मुआवजा राशि किसानों को खसरे के आधार पर दी गई, जो नुकसान का सही आकलन नहीं कर पाई। इसके कारण कई किसानों को बहुत कम मुआवजा मिला। कुंवर हटा गांव के सभी किसानों को महज 17 रुपए का भुगतान किया गया, जो जिले में सबसे कम राशि है।

सैटेलाइट पद्धति से हुआ गलत आकलन 

इस बार फसल बीमा के लिए सैटेलाइट पद्धति का इस्तेमाल किया गया था, जिसे किसानों के लिए लाभकारी नहीं माना जा रहा। किसान संघ के राघवेंद्र पटेल का कहना है कि सैटेलाइट से फसल के नुकसान का सही आकलन नहीं किया जा सकता। उन्होंने उदाहरण दिया कि सैटेलाइट यह नहीं बता सकता कि पाला या वर्षा से प्रभावित फसल में फल बनेगा या नहीं।

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सैटेलाइट से वास्तविक आकलन नहीं 

किसान ने कहा कि सैटेलाइट की मदद से यह नहीं पता लगाया जा सकता कि एक पौधा किस कारण से मरेगा या उसकी जड़ें गल रही हैं। सैटेलाइट केवल दृश्य जानकारी प्रदान करता है, जो फसल के वास्तविक नुकसान का सही अनुमान नहीं दे सकता। इसलिए, फसल बीमा का वास्तविक आकलन सैटेलाइट पद्धति से नहीं किया जा सकता।

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कुंवर हटा गांव में 17 रुपए का मुआवजा 

हटा गांव के किसानों को सिर्फ 17 रुपए का मुआवजा मिला है, जो किसानों के लिए बहुत कम है। किसान इससे नाराज हैं और उनका कहना है कि यह किसानों के साथ धोखा है। उन्होंने सरकार और बीमा कंपनियों से यह सवाल उठाया है कि इस मुआवजे की राशि का आकलन किस आधार पर किया गया है।

वहीं, मझौली तहसील के चनोटा गांव के किसानों को 11 लाख 29 हजार रुपए का मुआवजा मिला, जो जिले में सबसे ज्यादा था। हालांकि, इस गांव के किसानों को भी सैटेलाइट से हुए आकलन पर सवाल उठाए गए हैं।

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सैटेलाइट पद्धति का विरोध 

किसानों का कहना है कि सैटेलाइट पद्धति से फसल बीमा का वास्तविक आकलन संभव नहीं है। इस पद्धति के तहत, किसानों को जो मुआवजा राशि मिल रही है, वह उनके वास्तविक नुकसान के अनुपात में बहुत कम है। इसके अलावा, किसान इसे "फसल बीमा की वास्तविकता" नहीं मानते और इसे "किसानों के साथ छल" मानते हैं।

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