मध्यप्रदेश में गेहूं खरीदी की व्यवस्था सवालों के घेरे में, 5 मोर्चों पर 'जंग' लड़ रहे किसान
Ravi Kant Dixit | Apr 20, 2026, 20:02 IST
Photograph: (the sootr)
मध्यप्रदेश में MSP खरीदी संकट गहरा गया है। किसान फसल औने-पौने दाम पर बेचने को मजबूर हैं। सरकार दावा कर रही है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर खरीदी सुचारु है, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट है।
भोपाल. चाहे तपती दुपहरी हो या हाड़ कंपा देने वाली सर्द रात… चाहे आसमान से बरसती बारिश हो या फसल को तबाह करते ओले… देश और प्रदेश के किसान कभी पीछे नहीं हटते। मिट्टी से सोना उगाने वाले यही अन्नदाता हर संकट झेलकर देश की थाली भरते हैं, लेकिन आज वे अपने हक के लिए परेशान हैं। खेती-किसानी के गढ़ मध्यप्रदेश में हालात इतने खराब हैं कि किसानों के सब्र का बांध टूटने लगा है।
विडंबना देखिए… जिस साल 2026 को कृषि वर्ष घोषित किया गया है, उसी साल किसान बेबस नजर आ रहे हैं। सरकार मंचों से बड़े-बड़े दावे कर रही है कि व्यवस्था पारदर्शी है, खरीदी सुचारु रूप से चल रही है, पेमेंट समय पर हो रहा है, लेकिन जमीन पर तस्वीर उलट है।
यह गड़बड़ी नहीं, यह सुनियोजित प्रशासनिक विफलता है, जिसने किसानों को एक साथ पांच मोर्चों पर लड़ने के लिए मजबूर कर दिया है। 'द सूत्र' की यह खबर उसी सच्चाई को सामने रखती है...पढ़िए ये खास खबर!
मोर्चा 1:
सरकार के अपने आंकड़े ही व्यवस्था की पोल खोल रहे हैं। वर्ष 2026-27 में प्रदेश के 19 लाख 4 हजार 644 किसानों ने गेहूं बेचने के लिए पंजीयन कराया है। यह संख्या पिछले साल से 3 लाख 60 हजार ज्यादा है। अब हकीकत यह है कि 18 अप्रैल तक केवल 1 लाख 13 हजार किसानों से ही गेहूं खरीदा गया है। यह कुल पंजीकृत किसानों का करीब 6 प्रतिशत है। बाकी 94 प्रतिशत किसान अपनी बारी के इंतजार में बैठे हैं या फिर कम कीमत में बाजार में फसल बेचने को मजबूर हैं। सरकार 4.96 लाख मीट्रिक टन गेहूं खरीदी और 355 करोड़ रुपए के पेमेंट का ढिंढोरा पीट रही है, लेकिन यह नहीं बता रही कि 90% से ज्यादा किसान अभी भी लाइन में खड़े हैं।
मोर्चा 2:
सरकार ने व्यवस्था बनाई है कि पहले स्लॉट बुक करो, फिर फसल बेचो। सुनने में अच्छा लगता है, लेकिन हकीकत यह है कि यह सिस्टम किसानों के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बन गया है। पहले स्लॉट बुकिंग की आखिरी तारीख 23 अप्रैल 2026 रखी गई थी। फिर इसे बढ़ाकर 30 अप्रैल किया गया, पर तारीख बढ़ाने से क्या होगा, जब स्लॉट ही बुक नहीं हो रहे?
मोर्चा 3:
एमएसपी का मतलब होता है कि किसान को उसकी फसल का न्यूनतम सुरक्षित मूल्य मिले, लेकिन जब एमएसपी पर खरीदी ही नहीं होगी, तो यह सिर्फ एक सरकारी नारा बनकर रह जाता है। विदिशा जिले के खड़ाखेड़ी गांव के किसान राजू रघुवंशी की स्थिति चिंताजनक है। घर में बेटी की शादी है, लेकिन गेहूं एमएसपी पर नहीं बिक रहा है। ऐसे न जानें कितने किसान हैं।
मजबूरी में किसान बाजार में 2000 से 2400 रुपए प्रति क्विंटल में गेहूं बेचने को मजबूर हैं, जबकि एमएसपी 2625 रुपए तय है। यह सिर्फ आर्थिक नुकसान नहीं है, यह किसान की मेहनत पर चोट है। जिस फसल को उसने खून-पसीने से उगाया, वही उसे घाटे में बेचनी पड़ रही है।
मोर्चा 4:
सरकार किसानों को किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) देती है, ताकि वे सस्ते में कर्ज ले सकें। हर साल 31 मार्च तक बिना ब्याज के कर्ज चुकाने की सुविधा दी जाती थी और जरूरत पड़ने पर तारीख बढ़ाई जाती थी। इस बार सरकार ने तारीख नहीं बढ़ाई। अब किसान ओवरड्यू से बचने के लिए साहूकारों से भारी ब्याज पर पैसा उठा रहे हैं। 31 मार्च के बाद भुगतान करने पर 7% से 14% तक पेनल्टी लग रही है। सोसायटियों के पास पैसा ही नहीं है, जिससे नया कर्ज मिल नहीं रहा है। यानी एक तरफ फसल नहीं बिक रही, दूसरी तरफ कर्ज का बोझ बढ़ता जा रहा है।
मोर्चा 5:
अगर आप सोचते हैं कि गेहूं में ही समस्या है, तो आप गलत हैं। चना खरीदी की हालत और भी बदतर है। नियम यह बना दिया गया है कि यदि चने में एक भी दाना तेवड़ा का मिला तो पूरी फसल रिजेक्ट। सोचिए कि क्या यह व्यवहारिक है? क्या खेत में फसल इतनी परफेक्ट होती है कि एक भी दाना अलग न मिले? यह नियम नहीं, किसानों के साथ मजाक है। सिस्टम फेल है और किसान पिस रहा है। इसका असर बाजार तक में है। अक्षय तृतीया जैसे अबूझ मुहूर्त पर भी बाजार में वह रौनक नहीं दिखी, जो हर साल होती थी। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि किसान के पास पैसा नहीं है। शादी वाले घरों में संकट है, छोटे व्यापारियों की बिक्री घट गई है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था धीमी पड़ गई है।
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परेशान किसान अब अपनी आवाज खेतों से उठाकर सोशल मीडिया तक ले आए हैं। खरीदी केंद्रों पर हो रही देरी और तकनीकी परेशानियों से जूझ रहे किसान अब खुले तौर पर व्यथा लिख रहे हैं। विभाग की ओर से मिल रहे नोटिफिकेशन और मोबाइल मैसेज उनके गुस्से की नई वजह बन गए हैं। कोई लिख रहा है कि सत्यापन लंबित है, तो किसी के पास स्लॉट बुकिंग फेल होने का संदेश पहुंच रहा है। किसान इन मैसेज के स्क्रीनशॉट सोशल मीडिया पर पोस्ट कर रहे हैं, जो तेजी से वायरल हो रहे हैं। इन पोस्ट्स में दिख रहा है कि सिस्टम की खामियों का सीधा असर किसानों पर पड़ रहा है।
आपको बता दें कि प्रदेश में इंदौर, उज्जैन, भोपाल एवं नर्मदापुरम संभाग में 10 अप्रैल से एमएसपी पर रबी फसलों की खरीदी की जा रही है। वहीं, अन्य सभी संभागों में 15 अप्रैल से न्यूनतम समर्थन मूल्य पर गेहूं का उपार्जन किया जा रहा है। हालांकि एमएसपी पर गेहूं खरीदी 5 मई तक चलेगी, लेकिन इसके बाद क्या होगा, पता नहीं।
खाद्य मंत्री गोविंद सिंह राजपूत कहते हैं कि व्यवस्थाएं सुचारु हैं, खरीदी पारदर्शी है, किसानों को लाभ दिलाने के लिए सरकार प्रतिबद्ध है। लेकिन सवाल यह है कि अगर सब कुछ ठीक है तो 94% किसान क्यों इंतजार कर रहे हैं? स्लॉट क्यों नहीं मिल रहे? किसान बाजार में सस्ता क्यों बेच रहा है? कर्ज का बोझ क्यों बढ़ रहा है?
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी का कहना है कि ई-उपार्जन पोर्टल में सैटेलाइट सत्यापन की गंभीर त्रुटियों के कारण हजारों किसानों पर आर्थिक संकट मंडरा रहा है। सरकार की लापरवाही और अव्यवस्थित व्यवस्था की कीमत प्रदेश के किसान चुका रहे हैं। इसी गंभीर विषय को लेकर मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर सुधारात्मक कार्रवाई की मांग की है।
जीतू पटवारी ने मंडियों में कम दाम पर गेहूं खरीदी को लेकर भी सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है कि मोहन यादव मध्य प्रदेश में कृषि कल्याण वर्ष नहीं, किसान शोषण वर्ष मना रहे हैं। गेहूं पर सरकार ने ₹2700 एमएसपी का वादा किया था, लेकिन आज मोहन यादव मेरे किसान भाइयों की अच्छी फसल को खराब बताकर ₹400 से ₹600 कम में उनका गेहूं खरीद रहे हैं।
किसान संघ की चेतावनी:
मध्यप्रदेश में गेहूं खरीदी को लेकर बढ़ती अव्यवस्था पर अब किसान संगठन खुलकर सामने आ गए हैं। भारतीय किसान संघ के प्रांत प्रचार प्रमुख राहुल धूत ने चेतावनी दी है कि यदि एमएसपी पर खरीदी की व्यवस्था तुरंत नहीं सुधरी तो प्रदेशभर में बड़ा आंदोलन किया जाएगा।
उन्होंने बताया कि संगठन के पास लगातार किसानों की शिकायतें पहुंच रही हैं। कई किसानों की फसल को नॉन-एफएक्यू बताकर खरीदी से बाहर किया जा रहा है। स्लॉट बुकिंग नहीं हो पा रही, किसानों को असत्यापित घोषित किया जा रहा है। स्थिति यह है कि जिन किसानों का गेहूं तौल भी लिया जाता है, वहां भी सर्वर डाउन होने से बिल जनरेट नहीं हो पाता।
राहुल धूत ने सवाल उठाया कि 5 मई की तय समय सीमा में सभी पंजीकृत किसानों की फसल खरीदी संभव नहीं है, फिर भी तारीख बढ़ाने पर कोई निर्णय नहीं लिया गया है।
प्रदेश में इस साल कुल 3627 गेहूं खरीदी केंद्र बनाए गए हैं, ताकि किसान अपनी फसल आसानी से बेच सकें। पिछले साल (2025-26) में 15 लाख 44 हजार 55 किसानों ने गेहूं बेचने के लिए रजिस्ट्रेशन कराया था। इस साल गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) 2625 रुपए प्रति क्विंटल तय किया गया है।
खेती का दायरा भी बढ़ा है। इस बार किसानों ने 41.58 लाख हेक्टेयर जमीन में गेहूं बोया है, जो पिछले साल से 6.65 लाख हेक्टेयर ज्यादा है। सरकार का अनुमान है कि इस साल करीब 78 लाख मीट्रिक टन गेहूं खरीदा जाएगा। इसके लिए करीब 3 लाख 12 हजार बारदान (बोरियां) की जरूरत पड़ेगी। दावा है कि इसके लिए पर्याप्त व्यवस्था कर ली गई है। तुलना करें तो पिछले साल करीब 77 लाख मीट्रिक टन गेहूं खरीदा गया था। सरकार यह भी कह रही है कि दुनिया में हालात ठीक नहीं हैं, खासकर पश्चिम एशिया में युद्ध जैसी स्थिति है, फिर भी किसानों को नुकसान न हो, इसलिए इस साल खरीदी का लक्ष्य बढ़ाकर 78 लाख मीट्रिक टन रखा गया है।
यह समय बयानबाजी का नहीं, ठोस कार्रवाई का है। यदि सरकार सच में किसान हितैषी है तो तुरंत ये कदम उठाने होंगे। सभी पंजीकृत किसानों की खरीदी की गारंटी देने होगी। समयबद्ध कैलेंडर जारी करना होगा। स्लॉट बुकिंग सिस्टम खत्म या सरल करना होगा। एमएसपी पर 100% खरीदी सुनिश्चित करनी होगी। केसीसी की अंतिम तारीख बढ़ाई जाए, पेनल्टी खत्म हो। चना खरीदी के अव्यवहारिक नियम तुरंत हटाए जाएं।
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विडंबना देखिए… जिस साल 2026 को कृषि वर्ष घोषित किया गया है, उसी साल किसान बेबस नजर आ रहे हैं। सरकार मंचों से बड़े-बड़े दावे कर रही है कि व्यवस्था पारदर्शी है, खरीदी सुचारु रूप से चल रही है, पेमेंट समय पर हो रहा है, लेकिन जमीन पर तस्वीर उलट है।
यह गड़बड़ी नहीं, यह सुनियोजित प्रशासनिक विफलता है, जिसने किसानों को एक साथ पांच मोर्चों पर लड़ने के लिए मजबूर कर दिया है। 'द सूत्र' की यह खबर उसी सच्चाई को सामने रखती है...पढ़िए ये खास खबर!
मोर्चा 1:
पंजीयन लाखों का, खरीदी मुट्ठीभर
मोर्चा 2:
स्लॉट बुकिंग का खेल, तकनीक से तंग किसान
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मोर्चा 3:
मजबूरी में औने-पौने दाम पर बेच रहे फसल
मजबूरी में किसान बाजार में 2000 से 2400 रुपए प्रति क्विंटल में गेहूं बेचने को मजबूर हैं, जबकि एमएसपी 2625 रुपए तय है। यह सिर्फ आर्थिक नुकसान नहीं है, यह किसान की मेहनत पर चोट है। जिस फसल को उसने खून-पसीने से उगाया, वही उसे घाटे में बेचनी पड़ रही है।
मोर्चा 4:
KCC की तारीख नहीं बढ़ी, कर्ज के दलदल में किसान
मोर्चा 5:
चना खरीदी में तुगलकी फरमान... एक दाना और फसल रिजेक्ट
सोशल मीडिया पर गुस्सा जता रहे किसान
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5 मई तक चलेगी खरीदी... इसके बाद का पता नहीं?
सरकार का दावा बनाम सच्चाई
कांग्रेस का सवाल
जीतू पटवारी ने मंडियों में कम दाम पर गेहूं खरीदी को लेकर भी सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है कि मोहन यादव मध्य प्रदेश में कृषि कल्याण वर्ष नहीं, किसान शोषण वर्ष मना रहे हैं। गेहूं पर सरकार ने ₹2700 एमएसपी का वादा किया था, लेकिन आज मोहन यादव मेरे किसान भाइयों की अच्छी फसल को खराब बताकर ₹400 से ₹600 कम में उनका गेहूं खरीद रहे हैं।
किसान संघ की चेतावनी:
व्यवस्था नहीं सुधरी तो होगा बड़ा आंदोलन
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उन्होंने बताया कि संगठन के पास लगातार किसानों की शिकायतें पहुंच रही हैं। कई किसानों की फसल को नॉन-एफएक्यू बताकर खरीदी से बाहर किया जा रहा है। स्लॉट बुकिंग नहीं हो पा रही, किसानों को असत्यापित घोषित किया जा रहा है। स्थिति यह है कि जिन किसानों का गेहूं तौल भी लिया जाता है, वहां भी सर्वर डाउन होने से बिल जनरेट नहीं हो पाता।
राहुल धूत ने सवाल उठाया कि 5 मई की तय समय सीमा में सभी पंजीकृत किसानों की फसल खरीदी संभव नहीं है, फिर भी तारीख बढ़ाने पर कोई निर्णय नहीं लिया गया है।
ये हैं सरकार के दावे
खेती का दायरा भी बढ़ा है। इस बार किसानों ने 41.58 लाख हेक्टेयर जमीन में गेहूं बोया है, जो पिछले साल से 6.65 लाख हेक्टेयर ज्यादा है। सरकार का अनुमान है कि इस साल करीब 78 लाख मीट्रिक टन गेहूं खरीदा जाएगा। इसके लिए करीब 3 लाख 12 हजार बारदान (बोरियां) की जरूरत पड़ेगी। दावा है कि इसके लिए पर्याप्त व्यवस्था कर ली गई है। तुलना करें तो पिछले साल करीब 77 लाख मीट्रिक टन गेहूं खरीदा गया था। सरकार यह भी कह रही है कि दुनिया में हालात ठीक नहीं हैं, खासकर पश्चिम एशिया में युद्ध जैसी स्थिति है, फिर भी किसानों को नुकसान न हो, इसलिए इस साल खरीदी का लक्ष्य बढ़ाकर 78 लाख मीट्रिक टन रखा गया है।
अब चाहिए सीधा समाधान
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