MPPSC असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती में योग्यता का पेंच, हाईकोर्ट ने तीन उम्मीदवारों को दी राहत, 1 की याचिका खारिज
Neel Tiwari | Oct 01, 2026, 15:10 IST
MPPSC सहायक प्राध्यापक भर्ती मामले में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का फैसला
MPPSC असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती में योग्यता के नियमों पर हाई कोर्ट ने आयोग की मनमानी को झटका दिया। कोर्ट ने तीन उम्मीदवारों की अयोग्यता रद्द कर दी। वहीं एक उम्मीदवार की याचिका खारिज कर दी गई। कोर्ट ने सह-विषयों पर MPPSC के कड़े रुख को गलत माना। नियमों की संकीर्ण व्याख्या को अदालत ने रद्द कर दिया।
चार मामलों की एक साथ हुई सुनवाई
उम्मीदवारों ने अयोग्यता के फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी। कोर्ट ने चारों मामलों के तथ्यों को अलग-अलग देखा और भर्ती विज्ञापन की शर्तों के साथ विभाग के पुराने आदेशों की भी जांच की।
इसके बाद तीन मामलों में उम्मीदवारों को राहत दी गई। मुख्य याचिकाकर्ता कार्तिकेय की ओर से अधिवक्ता अभिषेक दुबे मामले में पैरवी कर रहे थे।
कार्तिकेय तिवारी की M.Tech पर MPPSC को झटका
कार्तिकेय तिवारी ने लाइफ साइंसेस में CSIR-UGC NET पास किया था और लिखित परीक्षा में सफल रहे थे। दस्तावेज जांच के दौरान MPPSC ने उनकी M.Tech डिग्री पर सवाल उठाते हुए उम्मीदवारी रोक दी। आयोग ने डिग्री को टेक्नोलॉजी फैकल्टी की डिग्री माना, जबकि भर्ती में विज्ञान फैकल्टी की योग्यता को आधार बनाया गया था।
हाई कोर्ट ने 22 दिसंबर 2022 के विभागीय आदेश को देखा। इस आदेश में प्राणीशास्त्र के 11 सह-विषय बताए गए थे, जिनमें बायोटेक्नोलॉजी भी शामिल थी। सूची में केवल M.Sc. की शर्त नहीं लिखी थी।
कोर्ट ने कहा कि बायोटेक्नोलॉजी पहले से मान्य सह-विषय था। ऐसे में M.Tech को अलग मानना नियमों की संकीर्ण व्याख्या होगी। कोर्ट ने कार्तिकेय की अयोग्यता का आदेश रद्द कर दिया। साथ ही उन्हें बायोटेक्नोलॉजी में M.Tech के आधार पर योग्य माना।
काश्मी शर्मा के NET पर भी बदला फैसला
दस्तावेज जांच में MPPSC ने उनके NET विषय को मान्य नहीं माना। आयोग ने लाइफ साइंसेस NET को जरूरी बताते हुए उनकी उम्मीदवारी खारिज कर दी थी।
हाई कोर्ट ने माना कि काश्मी की मुख्य डिग्री प्राणीशास्त्र में थी और उनकी M.Sc. योग्यता पर कोई विवाद नहीं था। विवाद केवल NET के विषय को लेकर था। राज्य ने पर्यावरण विज्ञान को प्राणीशास्त्र का सह-विषय माना था और यह विषय 2022 की सूची में भी शामिल था।
कोर्ट ने इसी आधार पर MPPSC के फैसले को गलत माना और काश्मी की अयोग्यता के दोनों आदेश रद्द कर दिए।
संगीत में Vocal डिग्री पर भी मिली राहत
गौरी शंकर के पास संगीत गायन में M.A. की डिग्री थी। उन्होंने संगीत विषय में MP-SET और UGC-NET भी पास किया था, लेकिन MPPSC ने डिग्री के नाम को आधार बनाकर उनकी उम्मीदवारी रोक दी।
आयोग ने संगीत और संगीत गायन को अलग माना था। हाई कोर्ट के सामने कई विश्वविद्यालयों के रिकॉर्ड रखे गए, जिनमें संगीत की अलग-अलग शाखाओं में गायन और वादन का उल्लेख था। कोर्ट ने डिग्री के नाम को अकेला आधार मानने से इनकार किया।
अदालत ने कहा कि ऐसी शर्त नहीं लगाई जा सकती, जिसके कारण ऐसी डिग्री मांगी जाए जो व्यावहारिक रूप से उपलब्ध ही न हो। कोर्ट ने गौरी शंकर की याचिका स्वीकार करते हुए उनकी अयोग्यता के दोनों आदेश रद्द कर दिए और संगीत गायन की M.A. डिग्री को मान्य माना।
Animal Biotechnology वाले उम्मीदवार को राहत नहीं
प्राणीशास्त्र के लिए विभाग ने 11 सह-विषयों की सूची बनाई थी। इसमें Biotechnology शामिल था, लेकिन Animal Biotechnology का नाम नहीं था।
डॉ. जायसवाल ने NDRI का समकक्षता प्रमाणपत्र पेश किया। इसमें दोनों डिग्रियों की समानता बताई गई थी। उन्होंने Animal Biotechnology को Biotechnology के बराबर मानने का तर्क दिया, लेकिन हाई कोर्ट ने इसे स्वीकार नहीं किया।
कोर्ट ने कहा कि शैक्षणिक समकक्षता तय करना विशेषज्ञों का काम है और अदालत खुद नई समकक्षता तय नहीं कर सकती। चूंकि Animal Biotechnology विभाग की घोषित सूची में शामिल नहीं था, इसलिए कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी।
हाई कोर्ट ने MPPSC की भूमिका भी साफ की
हाई कोर्ट ने इस तर्क को पूरी तरह खारिज नहीं किया, लेकिन विशेषज्ञों की समकक्षता और विभाग द्वारा घोषित सह-विषयों के बीच अंतर स्पष्ट किया।
कोर्ट ने तिलेश्वर सहारे मामले का भी उल्लेख किया। इसमें सह-विषय को लेकर विवाद सामने आया था। साथ ही कोर्ट ने समानता के आधार पर हस्तक्षेप किया था।
मौजूदा मामलों में भी हाई कोर्ट ने देखा कि जहां विभाग की सूची में विषय स्पष्ट रूप से शामिल था, वहां बाद में उसे संकीर्ण तरीके से नहीं देखा जा सकता। वहीं सूची से बाहर के विषय को केवल किसी दूसरे विषय के समान बताकर मान्य नहीं किया जा सकता।
11 सह-विषयों की सूची बनी फैसले का आधार
इसके अलावा Limnology, Entomology, Bio-Technology, Bio Science, Genetics, Bio-Informatics, Life Science और Genetic Engineering को भी सह-विषय माना गया था।
कार्तिकेय का मामला Bio-Technology से जुड़ा था, जबकि काश्मी का मामला Environmental Science NET से जुड़ा था। दोनों विषय विभाग की सूची में मौजूद थे।
इसी वजह से दोनों उम्मीदवारों को राहत मिली। वहीं Animal Biotechnology सूची में शामिल नहीं था। यही अंतर डॉ. कैलाश प्रसाद जायसवाल के मामले में महत्वपूर्ण साबित हुआ।
तीन उम्मीदवारों को राहत, एक की याचिका खारिज
काश्मी की M.Sc. और NET योग्यता को स्वीकार किया गया। गौरी शंकर की Music Vocal डिग्री को भी मान्य माना गया। वहीं डॉ. कैलाश प्रसाद जायसवाल की याचिका खारिज कर दी गई। Animal Biotechnology को घोषित सह-विषय की सूची से बाहर होने के कारण राहत नहीं मिली।
भर्ती प्रक्रिया पर फैसले का क्या असर होगा
वहीं विभाग की सूची से बाहर किसी विषय को केवल समकक्षता के आधार पर जोड़ने से कोर्ट ने इनकार किया।
फैसले से MPPSC की भूमिका भी स्पष्ट हुई। आयोग भर्ती प्रक्रिया चलाता है, जबकि मुख्य शैक्षणिक योग्यता की शर्त विभाग द्वारा तय की गई थी। इसलिए हाई कोर्ट ने यह अंतर रखा कि घोषित योग्यता की व्याख्या और किसी नई शैक्षणिक समकक्षता को तय करना दो अलग बातें हैं।
अंतरिम आदेश से तीनों उम्मीदवार प्रक्रिया में रहे
फैसले में भर्ती योग्यता की जांच के तरीके को भी स्पष्ट किया गया। कोर्ट ने भर्ती विज्ञापन की भाषा और विभाग के अपने आदेश को महत्व दिया। जहां सह-विषय की सूची साफ थी, वहां उम्मीदवारों को राहत मिली। वहीं सूची से बाहर के विषय को जोड़ने की मांग स्वीकार नहीं की गई।
MPPSC भर्ती विवाद में हाई कोर्ट का अहम संदेश
कार्तिकेय को घोषित बायोटेक्नोलॉजी विषय का लाभ मिला। काश्मी को घोषित पर्यावरण विज्ञान विषय का लाभ मिला। गौरी शंकर को संगीत की व्यावहारिक शाखा के आधार पर राहत मिली।
वहीं कैलाश प्रसाद जायसवाल को सूची से बाहर Animal Biotechnology के कारण राहत नहीं मिली। इस तरह फैसले में भर्ती योग्यता की सीमा को अलग-अलग मामलों के आधार पर स्पष्ट किया गया।
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