भोपाल में हाईकोर्ट के जजों की बैठक खत्म, सरकारी केसों पर जताई गहरी चिंता

भोपाल में राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी में हाई कोर्ट के न्यायाधीशों की दो दिन की बैठक समाप्त हुई। इस बैठक में न्यायाधीशों ने केंद्र और राज्य सरकारों के बेवजह केस दायर करने पर चिंता जताई। सभी ने अदालतों में लंबित मामलों के बढ़ने के कारणों पर चर्चा की।

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Aman Vaishnav
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News In Short

  • भोपाल में हाईकोर्ट के न्यायाधीशों की दो दिन की बैठक आयोजित हुई थी।

  • न्यायधीशों का कहना है कि केंद्र और राज्य सरकारें बेवजह केस दायर कर रही हैं यह मुख्य चिंता है।

  • वैकल्पिक विवाद समाधान (एडीआर) को बढ़ावा देने की सलाह दी गई है।

  • सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के न्यायाधीशों ने आपसी समाधान की जरूरत बताई है।

  • 7 साल तक की सजा वाले क्रिमिनल मामलों को प्राथमिकता देने की रणनीति बनाई गई है।

 News In Detail

भोपाल में राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी (एनजेए) में हाईकोर्ट के न्यायाधीशों की दो दिन की कॉन्फ्रेंस हुई थी। ये कॉन्फ्रेंस 7 फरवरी को शुरू हुई और 8 फरवरी को खत्म हुई।

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने इसका उद्घाटन किया था। दिल्ली के बाद भोपाल दूसरा शहर है जहां सुप्रीम कोर्ट के 9 और हाईकोर्ट के 25 चीफ जस्टिस एक साथ थे।

केंद्र और राज्य सरकारें बेवजह केस दायर कर रही

भोपाल में हुई नेशनल कॉन्फ्रेंस में सभी हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों ने चिंता जताई। न्यायाधीशों का कहना था कि केंद्र सरकार और राज्य सरकारें बेवजह केस दायर कर रही हैं। 

उनके मुताबिक, सरकारी केसों की वजह से मामलों की संख्या बढ़ रही है, और यही अदालतों में लंबित मामलों का सबसे बड़ा कारण बन रहा है।

न्यायाधीश बोले- पहले आपसी समझौते से समाधान ढूंढें

सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों ने एक और बात पर गंभीर चर्चा की। उन्होंने कहा कि सरकारों को वैकल्पिक विवाद समाधान (एडीआर) अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाए।

साथ ही ये भी कहा कि अब जब सरकार की ओर से केस दायर हो तो जज उन्हें कहें कि पहले आपसी समझौते से समाधान ढूंढें। इसके बाद ही अदालत का रुख करें।

इसके साथ ही सरकारी पक्ष को यह कहा जाएगा कि अदालतों में केस लड़ने से नुकसान होता है। इसके बजाय सरकारें मामूली नुकसान स्वीकार कर समाधान की दिशा में बढ़ें।

क्रिमिनल मामलों में लंबित केसों का बोझ कम करने के लिए एक रणनीति बनाई गई है। अब 7 साल तक की सजा वाले मामलों को प्राथमिकता से सुनवाई में रखा जाएगा।

देश को राष्ट्रीय न्यायिक नीति की जरूरत

सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता में यह माना गया कि देश को राष्ट्रीय न्यायिक नीति की जरूरत है। यह नीति न्यायपालिका को एकजुट, संगठित और मजबूत बनाएगी। यह अदालतों को तेज, सरल, पारदर्शी बनाने में मदद करेगी।

न्याय सिर्फ अदालत में, मीडिया में नहीं

कॉन्फ्रेंस में मीडिया ट्रायल को लेकर भी चिंता जताई गई है। सुप्रीम कोर्ट के जजों ने कहा कि न्याय सिर्फ अदालत में होना चाहिए, मीडिया में नहीं। जजों को मीडिया की चर्चा से संवेदनशील तो होना चाहिए, लेकिन उससे प्रभावित नहीं होना चाहिए।

एमपी हाईकोर्ट में सबसे ज्यादा क्रिमिनल केस

मध्यप्रदेश के वरिष्ठ वकीलों के मुताबिक, हाईकोर्ट में 65-70% केस ऐसे हैं जिनमें मध्यप्रदेश सरकार या केंद्र पार्टी हैं। इनमें कुछ केस ऐसे भी हैं जो एमपी शासन या केंद्र ने खुद दायर किए हैं। एमपी हाईकोर्ट में सबसे ज्यादा क्रिमिनल केस हैं।

न्यायधीशों का कहना है कि कोर्ट में लंबित मामलों में 10-15% सर्विस मैटर होते हैं। सरकार सबसे बड़ी जमीन मालिक है, इसलिए कई विवाद उसमें जुड़े हैं। इन मामलों को कोर्ट की बजाय मध्यस्थता से सुलझाने से निपटारा जल्दी होगा। अगर न्यायपालिका इस प्रक्रिया की शुरुआत करती है, तो मामला और तेज हो सकता है।

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