News Strike: MP OBC आरक्षण पर फैसला कब? 27% लागू होगा या 14% वापस आएगा, BJP-Congress पर असर

Harish Divekar | Sept 24, 2026, 07:00 IST
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News strike23-09
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मध्य प्रदेश में ओबीसी आरक्षण को 14% से बढ़ाकर 27% करने के मामले पर हाईकोर्ट का फैसला सुरक्षित है। इस निर्णय पर हजारों युवाओं की नौकरियों और 87:13 फॉर्मूले का भविष्य टिका है। यह फैसला भाजपा और कांग्रेस के राजनीतिक समीकरणों पर भी गहरा प्रभाव डालेगा।

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ओबीसी आरक्षण पर हाई कोर्ट के आखिरी फैसले का इंतजार है। ये फैसला आम लोगों से ज्यादा कांग्रेस और बीजेपी पर असर डालेगा। ये वो फैसला होगा जो मप्र की राजनीति में बड़ा उलटफेर कर सकता है। मध्य प्रदेश में ओबीसी आरक्षण को लेकर चल रहा मामला अब उस मुकाम पर पहुंच चुका है। जहां सिर्फ एक फैसले से आर या पार की स्थिति बन सकती है। 2019 में 14 फीसदी से बढ़ाकर 27 फीसदी किया गया ओबीसी आरक्षण आज करीब सात साल बाद भी पूरी तरह लागू नहीं हो पाया है। सरकारी भर्तियों में हजारों उम्मीदवारों का भविष्य इसी मामले से जुड़ा हुआ है। किसी को नौकरी मिलने का इंतजार है। तो किसी को डर है कि अगर फैसला उसके खिलाफ गया तो उसकी सालों की मेहनत का क्या होगा? और सबसे दिलचस्प बात ये है कि मामला सिर्फ नौकरी और आरक्षण तक सीमित नहीं है। इसके तार सीधे मध्य प्रदेश की राजनीति से भी जुड़े हुए हैं।

नमस्कार

आपको बता दूं मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की विशेष बेंच ने 15 जुलाई से 5 अगस्त 2026 तक ओबीसी आरक्षण मामले की मैराथन सुनवाई की और दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया। ये पूरा मामला कैसे शुरू हुआ। 87:13 का फॉर्मूला क्यों बनाना पड़ा। सामान्य वर्ग, सरकार और ओबीसी पक्ष की अदालत में क्या दलीलें हैं। और फैसला 27 फीसदी के पक्ष में आया तो क्या होगा और अगर 14 फीसदी वाला पुराना सिस्टम वापस आया तो किसे फायदा और किसे नुकसान होगा। और राजनीति पर इसका क्या असर होगा। इन सबको बहुत तफ्सील से समझता हूं।

सबसे पहले बात 2019 की। मार्च 2019 में तत्कालीन कमलनाथ सरकार ने मध्य प्रदेश में ओबीसी आरक्षण को 14 फीसदी से बढ़ाकर 27 फीसदी करने का फैसला लिया। इस फैसले के बाद राज्य में कुल आरक्षण 50 फीसदी से ऊपर चला गया। यहीं से विवाद शुरू हुआ और इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दे दी गई। याचिकाकर्ताओं की मुख्य दलील थी कि राज्य में पहले से एससी, एसटी और ओबीसी को आरक्षण दिया जा रहा है। अगर ओबीसी का हिस्सा 14 से बढ़ाकर 27 फीसदी किया जाता है तो कुल आरक्षण करीब 63 फीसदी तक पहुंच जाता है।

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ओबीसी आरक्षण पर अंतरिम रोक आया 87:13 का फॉर्मूला

अब सवाल उठा कि क्या 50 फीसदी की सीमा को इस तरह पार किया जा सकता है? मामला हाईकोर्ट पहुंचा और 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण पर अंतरिम रोक लग गई। अदालत ने नियुक्तियों में फिलहाल 14 फीसदी ओबीसी आरक्षण के हिसाब से आगे बढ़ने की व्यवस्था की। लेकिन इससे एक बड़ी समस्या पैदा हो गई। और कई सवाल उठे जैसे सरकारी भर्तियां कैसे हों? परीक्षा हो चुकी है, उम्मीदवारों का चयन हो चुका है, लेकिन आरक्षण का विवाद अदालत में है। अगर पूरी भर्ती रोक दी जाए तो हजारों युवाओं का भविष्य अटक जाएगा।

यहीं से आया 87:13 का फॉर्मूला। इसे भी बिल्कुल आसान भाषा में समझिए। मान लीजिए किसी भर्ती में 100 पद हैं। विवादित आरक्षण की वजह से सभी 100 पदों पर नियुक्ति नहीं की जा सकती। तो सरकार ने एक व्यवस्था बनाई कि 87 फीसदी पदों पर प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाए और बाकी 13 फीसदी पदों को फिलहाल रोककर रखा जाए। यानी 87 फीसदी उम्मीदवारों को नियुक्ति मिल सकती है, लेकिन 13 फीसदी पदों पर फैसला अदालत के अंतिम निर्णय के बाद होगा। इसी 13 फीसदी हिस्से में ओबीसी और अनारक्षित वर्ग के उम्मीदवारों की अलग अलग सूची बनाई जाती है।

अब यहां सबसे बड़ा पेंच समझिए। इन 13 फीसदी उम्मीदवारों की परीक्षा या चयन प्रक्रिया हो सकती है। लेकिन इन पदों पर नियुक्ति का अंतिम फैसला अदालत के निर्णय से जुड़ा रहता है। यानी हजारों उम्मीदवारों के लिए ये 13 फीसदी सिर्फ आंकड़ा नहीं है। ये उनकी नौकरी, करियर और कई साल की मेहनत का सवाल है।

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अनारक्षित वर्ग के उम्मीदवारों के अवसर पर असर!

अब आते हैं अदालत में चली सबसे अहम बहस पर। सामान्य वर्ग की ओर से सबसे बड़ा तर्क 50 फीसदी आरक्षण की सीमा को लेकर दिया गया। वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक इंदिरा साहनी फैसले का हवाला दिया। इस फैसले में सामान्य परिस्थितियों में आरक्षण की सीमा 50 फीसदी रखने की बात कही गई थी। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि मध्य प्रदेश में ओबीसी आरक्षण को 14 से 27 फीसदी करने के लिए सरकार के पास ऐसा ठोस आधार नहीं था। जिससे 50 फीसदी की सीमा पार करने को सही ठहराया जा सके। उनका एक और बड़ा सवाल है सरकार के पास आखिर ऐसा कौन सा प्रमाणिक और वैज्ञानिक डेटा था। जिसके आधार पर ओबीसी आरक्षण में अचानक 13 फीसदी की बढ़ोतरी कर दी गई? याचिकाकर्ताओं ने ये भी कहा कि आरक्षण का इतना बड़ा हिस्सा होने से अनारक्षित वर्ग के उम्मीदवारों के अवसर प्रभावित होते हैं और ये संविधान में दिए गए समानता के अधिकार से जुड़ा सवाल है।

राज्य की आधी से ज्यादा आबादी ओबीसी!

यानी सामान्य वर्ग का पूरा मामला मुख्य रूप से तीन चीजों के आसपास घूमता है 50 फीसदी की सीमा, ठोस आंकड़ों की जरूरत और समान अवसर। अब जानते हैं कि इस मामले में सरकार और ओबीसी पक्ष ने क्या कहा। इनकी सबसे बड़ी दलील है कि मध्य प्रदेश में ओबीसी आबादी राज्य की कुल आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा है। सरकार ने अलग अलग आंकड़ों और सर्वे का हवाला देते हुए अदालत में ओबीसी आबादी 50 फीसदी से अधिक होने का दावा किया है। सरकार का कहना है कि अगर राज्य की आधी से ज्यादा आबादी ओबीसी है।तो उसे सिर्फ 14 फीसदी आरक्षण तक सीमित रखना ठीक नहीं है। दूसरी दलील है प्रतिनिधित्व की। सरकार का कहना है कि आबादी बड़ी होने के बावजूद सरकारी नौकरियों और प्रशासनिक सेवाओं में ओबीसी का प्रतिनिधित्व उस अनुपात में नहीं है। यानी सरकार का तर्क है कि सिर्फ आबादी देखना काफी नहीं है। ये भी देखना होगा कि सरकारी संस्थानों में उस वर्ग की हिस्सेदारी कितनी है। लेकिन ओबीसी पक्ष ने इस बहस में एक और बड़ा कानूनी सवाल उठा दिया। उसका तर्क है कि देश में 10 फीसदी ईडब्ल्यूएस आरक्षण लागू होने के बाद 50 फीसदी की सीमा का सवाल खुद नए संवैधानिक संदर्भ में देखा जाना चाहिए।

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ज्यादा आरक्षण की मांग को खारिज क्यों किया जाए?

ओबीसी पक्ष का कहना है कि अगर आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्ग के लिए अलग से आरक्षण की व्यवस्था के बाद कुल सीमा 50 फीसदी से आगे जाती है। तो सामाजिक और शिक्षा से जुड़े पिछड़ेपन के आधार पर ओबीसी के लिए ज्यादा आरक्षण की मांग को सिर्फ 50 फीसदी की सीमा के आधार पर खारिज क्यों किया जाए? यहीं पर मामला और पेचीदा हो जाता है। क्योंकि एक तरफ इंदिरा साहनी का फैसला है। दूसरी तरफ बाद के संवैधानिक बदलाव और आरक्षण से जुड़े नए न्यायिक फैसले हैं। अब सवाल है कि हाईकोर्ट इन सभी पहलुओं को किस तरह देखता है। और अब सबसे बड़ा सवाल अगर फैसला 27 फीसदी के पक्ष में आया तो क्या होगा? अगर अदालत 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण को वैध मानती । तो सबसे बड़ा फायदा उन उम्मीदवारों को हो सकता है जो 13 फीसदी वाले विवादित हिस्से में नियुक्ति का इंतजार कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में सरकार के लिए उन पदों पर नियुक्ति का रास्ता साफ हो सकता है। ओबीसी संगठनों के लिए ये बड़ी जीत होगी और सरकार भी इसे सामाजिक न्याय की दिशा में बड़ी उपलब्धि के तौर पर पेश कर सकती है। लेकिन अगर अदालत 27 फीसदी आरक्षण को मंजूरी नहीं देती और पुराना 14 फीसदी वाला ढांचा कायम रहता है। तो तस्वीर पूरी तरह बदल सकती है। ऐसे में 13 फीसदी वाले विवादित पदों पर अनारक्षित वर्ग के उम्मीदवारों के पक्ष में रास्ता खुल सकता है लेकिन ये भी अंतिम आदेश की शर्तों और आगे की कानूनी प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।

और यहां एक बात बहुत जरूरी है। कोर्ट का फैसला आते ही हर चीज उसी दिन बदल जाएगी, ऐसा जरूरी नहीं है। फैसले के बाद भी सरकार, याचिकाकर्ता या दूसरे पक्ष सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं। यानी हाईकोर्ट का फैसला बेहद महत्वपूर्ण होगा। लेकिन कानूनी लड़ाई वहीं खत्म हो जाए ऐसा जरूरी नहीं है अब जरा राजनीति पर इसका इंपेक्ट भी समझिए। मध्य प्रदेश में ओबीसी आबादी को चुनावी नजरिए से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। इसलिए हाईकोर्ट का फैसला सिर्फ कानूनी दस्तावेज नहीं रहेगा। इसका राजनीतिक असर भी दिखाई दे सकता है।

मुख्यमंत्री मोहन यादव खुद ओबीसी पृष्ठभूमि से..

अगर 27 फीसदी आरक्षण बरकरार रहता है तो बीजेपी सरकार इसे ओबीसी हित में बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश कर सकती है। मुख्यमंत्री मोहन यादव खुद ओबीसी पृष्ठभूमि से आते हैं। इसलिए राजनीतिक संदेश और भी मजबूत हो सकता है। बीजेपी ये कह सकती है कि उसने ओबीसी आरक्षण की लड़ाई को मजबूती से आगे बढ़ाया और अदालत में इसका बचाव किया। दूसरी तरफ कांग्रेस के सामने भी एक दिलचस्प स्थिति होगी। क्योंकि 27 फीसदी आरक्षण बढ़ाने का फैसला 2019 में कमलनाथ सरकार के समय हुआ था। अगर आरक्षण बरकरार रहता है तो कांग्रेस भी ये दावा कर सकती है कि इसकी शुरुआत उसी ने की थी। लेकिन अगर 27 फीसदी आरक्षण खारिज हो जाता है। तो कांग्रेस बीजेपी सरकार पर निशाना साध सकती है और सवाल उठा सकती है कि सरकार ने अदालत में ओबीसी के पक्ष को मजबूती से क्यों नहीं रखा।

कांग्रेस के लिए जातिगत जनगणना और ओबीसी प्रतिनिधित्व का मुद्दा भी फिर से बड़ा राजनीतिक हथियार बन सकता है। यानी एक ही फैसला दोनों पार्टियों के लिए अलग अलग राजनीतिक कहानी तैयार कर सकता है। कहने का मतलब ये कि फैसला आरक्षण के पक्ष में आया तो भी कांग्रेस उसका क्रेडिट ले सकती है और फेवर में नहीं आया तो कांग्रेस बीजेपी के खिलाफ एक नया मुद्दा छेड़ सकती है।

अब बीजेपी के एंगल से देखें तो आरक्षण के पक्ष में फैसला न आने पर बीजेपी को ओबीसी को रिझाने के लिए अलग अलग पैतरें आजमाने पड़ेंगे। पर फायदा ये होगा कि बीजेपी का कोर वोटर यानी कि जनरल कैटेगरी के लोग बीजेपी के पाले में ही रहेंगे। यानी दोनों तरफ विन विन सिचुएशन जैसे हालात हैं तो चैलेंज भी हैं। इंतजार है तो बस हाई कोर्ट के फैसले का। जिसके बाद तय होगा कि प्रदेश के युवाओं का भविष्य और सियासत की बिसात कैसी जमा होगी।

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