मध्य प्रदेश में पानी और पर्यावरण पर सवाल, NGT ने सरकार से मांगा जवाब
thesootr Desk | Jan 15, 2026, 14:28 IST
ngt to mp government
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने मध्य प्रदेश में पीने के पानी की गुणवत्ता और बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई को लेकर सरकार से जवाब मांगा है। यह मामला स्वास्थ्य और पर्यावरण से जुड़ा गंभीर मुद्दा है।
NewsIn Short
- नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने मध्य प्रदेश में पीने के पानी में गंदगी और बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई को लेकर सख्त रुख अपनाया है।
- मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर ट्रिब्यूनल ने स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लेते हुए राज्य सरकार और संबंधित विभागों से जवाब मांगा है।
- ट्रिब्यूनल ने कहा कि लोगों को दूषित पानी देना और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाना किसी भी हाल में स्वीकार्य नहीं है।
- रिपोर्ट्स में कई क्षेत्रों में दूषित पानी की सप्लाई और लाखों पेड़ों की कटाई का दावा किया गया है।
- NGT ने इसे पर्यावरण और जनस्वास्थ्य कानूनों का संभावित उल्लंघन माना है।
News In Detail
NGT ने मध्य प्रदेश में आई रिपोर्ट्स को गंभीरता से लिया है। इन रिपोर्ट्स में एक ओर जहां पीने के पानी की गुणवत्ता पर सवाल उठाए गए हैं। वहीं दूसरी ओर विकास परियोजनाओं के नाम पर बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई का भी जिक्र है।
NGT का कहना है कि ये दोनों मुद्दे आपस में जुड़े हुए हैं। क्योंकि स्वस्थ पर्यावरण के बिना सुरक्षित पानी देना और जनस्वास्थ्य की सुरक्षा करना संभव नहीं है। इसे सिर्फ एक सामान्य प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि एक बड़ी संस्थागत और पर्यावरणीय विफलता माना गया है।
क्यों दखल में आया NGT?
नल से पानी या जहर?
बता दें कि बीते दिनों में मिनी मुंबई कहे जाने वाले इंदौर में गंदा पानी पीने से कई लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। वहीं वहीं भोपाल के कई इलाकों में 'ई-कोलाई' जैसे खतरनाक बैक्टीरिया पाए गए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, भोपाल के आदमपुर और हरिपुरा जैसे इलाकों में भूजल पूरी तरह से प्रदूषित हो चुका है, जिससे लोग गंभीर बीमारियों का शिकार हो रहे हैं।
अन्य राज्यों में भी गंभीर हालात, NGT ने जताई चिंता
ये समस्या दशकों पुरानी जर्जर पाइपलाइनों की वजह से हो रही है। वहीं, उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा (सेक्टर डेल्टा-1) में दूषित पानी पीने से बच्चों समेत कई लोग बीमार पड़ गए, जिनमें उल्टी और दस्त जैसे लक्षण देखने को मिले। इन मामलों को NGT ने जनस्वास्थ्य के लिए एक चेतावनी के रूप में देखा है।
सिस्टम फेल या लापरवाही?
NGT का संकेत साफ है अगर निगरानी व्यवस्था मजबूत होती, तो ऐसी स्थिति पैदा ही नहीं होती। इससे प्रशासनिक लापरवाही और सिस्टम फेलियर की आशंका गहराती है।
विकास के नाम पर जंगल साफ?
क्या नियमों की अनदेखी हुई?
- क्या पेड़ों की कटाई से पहले जरूरी पर्यावरणीय मंजूरी ली गई थी,
- क्या तय शर्तों का पालन हुआ,
- और क्या पर्यावरणीय नुकसान की भरपाई के लिए कोई ठोस कदम उठाए गए।
MP में बड़े पैमाने पर पेड़ कटाई पर NGT का संज्ञान
ये गतिविधियां भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, सिंगरौली, खंडवा, विदिशा और उज्जैन जैसे जिलों में हो रही हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इतनी बड़ी पेड़ कटाई का वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) पर बुरा असर पड़ा है।
कटाई के प्रमुख उदाहरण
किन-किन से जवाब तलब
- राज्य सरकार
- प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड
- वन और पर्यावरण से जुड़े विभाग
- संबंधित स्थानीय निकाय
NGT की सख्त टिप्पणी
पीठ ने माना कि ऐसी घटनाएं गंभीर पर्यावरणीय और जनस्वास्थ्य संकट की ओर इशारा करती हैं। ये मामले पहली नजर में पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 और जल प्रदूषण नियंत्रण अधिनियम, 1974 का उल्लंघन करते हैं।
ट्रिब्यूनल ने साफ किया कि नागरिकों के सुरक्षित पेयजल के अधिकार से कोई समझौता नहीं किया जा सकता, और अगर नियमों का पालन नहीं किया गया तो संबंधित विभागों और अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराया जाएगा। यह राज्य सरकार और प्रशासन के लिए एक स्पष्ट चेतावनी है।
मामला क्यों गंभीर है
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