मध्य प्रदेश में पानी और पर्यावरण पर सवाल, NGT ने सरकार से मांगा जवाब

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने मध्य प्रदेश में पीने के पानी की गुणवत्ता और बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई को लेकर सरकार से जवाब मांगा है। यह मामला स्वास्थ्य और पर्यावरण से जुड़ा गंभीर मुद्दा है।

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  • नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने मध्य प्रदेश में पीने के पानी में गंदगी और बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई को लेकर सख्त रुख अपनाया है।
  • मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर ट्रिब्यूनल ने स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लेते हुए राज्य सरकार और संबंधित विभागों से जवाब मांगा है।
  • ट्रिब्यूनल ने कहा कि लोगों को दूषित पानी देना और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाना किसी भी हाल में स्वीकार्य नहीं है।
  • रिपोर्ट्स में कई क्षेत्रों में दूषित पानी की सप्लाई और लाखों पेड़ों की कटाई का दावा किया गया है।
  • NGT ने इसे पर्यावरण और जनस्वास्थ्य कानूनों का संभावित उल्लंघन माना है।

News In Detail

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में पेयजल की स्थिति और पर्यावरण के साथ हो रहे खिलवाड़ को लेकर कड़ा रुख अपनाया है। ट्रिब्यूनल ने इन तीनों राज्यों की सरकारों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।

NGT ने मध्य प्रदेश में आई रिपोर्ट्स को गंभीरता से लिया है। इन रिपोर्ट्स में एक ओर जहां पीने के पानी की गुणवत्ता पर सवाल उठाए गए हैं। वहीं दूसरी ओर विकास परियोजनाओं के नाम पर बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई का भी जिक्र है।

NGT का कहना है कि ये दोनों मुद्दे आपस में जुड़े हुए हैं। क्योंकि स्वस्थ पर्यावरण के बिना सुरक्षित पानी देना और जनस्वास्थ्य की सुरक्षा करना संभव नहीं है। इसे सिर्फ एक सामान्य प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि एक बड़ी संस्थागत और पर्यावरणीय विफलता माना गया है।

क्यों दखल में आया NGT?

NGT के संज्ञान में आई रिपोर्ट्स के मुताबिक, राज्य के कई हिस्सों में पानी की सप्लाई और पर्यावरण संरक्षण को लेकर गंभीर लापरवाही सामने आई है। ट्रिब्यूनल ने कहा कि जब ऐसे मुद्दों का असर सीधे आम नागरिकों पर पड़ता है, तो न्यायिक हस्तक्षेप जरूरी हो जाता है।

नल से पानी या जहर?

रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि कई इलाकों (इंदौर) में पाइपलाइन से सप्लाई किया जा रहा पानी दूषित है। कई जगहों पर सीवेज पानी के मिलने की आशंका जताई गई है। NGT ने कहा है कि यदि लोग इस तरह के पानी को पीने के लिए मजबूर हैं, तो यह जनस्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा है।

बता दें कि बीते दिनों में मिनी मुंबई कहे जाने वाले इंदौर में गंदा पानी पीने से कई लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। वहीं वहीं भोपाल के कई इलाकों में 'ई-कोलाई' जैसे खतरनाक बैक्टीरिया पाए गए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, भोपाल के आदमपुर और हरिपुरा जैसे इलाकों में भूजल पूरी तरह से प्रदूषित हो चुका है, जिससे लोग गंभीर बीमारियों का शिकार हो रहे हैं।

अन्य राज्यों में भी गंभीर हालात, NGT ने जताई चिंता

NGT के सामने आई रिपोर्ट्स में यह भी सामने आया है कि पेयजल में सीवेज मिलाने की समस्या सिर्फ मध्य प्रदेश तक सीमित नहीं है। राजस्थान के उदयपुर, जोधपुर, कोटा, बांसवाड़ा, जयपुर और अजमेर जैसे शहरों में भी सीवेज का पानी पेयजल लाइनों में मिल रहा है।

ये समस्या दशकों पुरानी जर्जर पाइपलाइनों की वजह से हो रही है। वहीं, उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा (सेक्टर डेल्टा-1) में दूषित पानी पीने से बच्चों समेत कई लोग बीमार पड़ गए, जिनमें उल्टी और दस्त जैसे लक्षण देखने को मिले। इन मामलों को NGT ने जनस्वास्थ्य के लिए एक चेतावनी के रूप में देखा है।

सिस्टम फेल या लापरवाही?

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल एनजीटी ने यह भी सवाल उठाया है कि क्या यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि पीने के पानी की गुणवत्ता समय-समय पर ठीक से जांची जाए? क्या जर्जर और पुरानी पाइपलाइनों को समय पर बदला गया है?

NGT का संकेत साफ है अगर निगरानी व्यवस्था मजबूत होती, तो ऐसी स्थिति पैदा ही नहीं होती। इससे प्रशासनिक लापरवाही और सिस्टम फेलियर की आशंका गहराती है।

विकास के नाम पर जंगल साफ?

पानी के मुद्दे के साथ-साथ ट्रिब्यूनल ने ये भी पाया कि मध्य प्रदेश में सड़क, रेलवे, खनन और दूसरी विकास परियोजनाओं के लिए लाखों पेड़ों को काटने की इजाजत दी गई है या ये प्रक्रिया चल रही है। इनमें से कई पेड़ दशकों पुराने हैं। इनकी भरपाई सिर्फ कागजी पौधारोपण से नहीं हो सकती।

क्या नियमों की अनदेखी हुई?

NGT अब यह जांच कर रहा है कि:

  • क्या पेड़ों की कटाई से पहले जरूरी पर्यावरणीय मंजूरी ली गई थी,
  • क्या तय शर्तों का पालन हुआ,
  • और क्या पर्यावरणीय नुकसान की भरपाई के लिए कोई ठोस कदम उठाए गए।

MP में बड़े पैमाने पर पेड़ कटाई पर NGT का संज्ञान

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की नई दिल्ली पीठ ने मध्य प्रदेश में हो रही बड़े पैमाने पर पेड़ कटाई को लेकर एक मीडिया रिपोर्ट पर खुद संज्ञान लिया है। रिपोर्ट के मुताबिक, सड़क, कोयला ब्लॉक, रेलवे लाइन और राष्ट्रीय राजमार्ग जैसी विकास परियोजनाओं के लिए 50 से 100 साल पुराने 15 लाख से ज्यादा पेड़ों को काटा जा चुका है या काटने का प्रस्ताव है।

ये गतिविधियां भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, सिंगरौली, खंडवा, विदिशा और उज्जैन जैसे जिलों में हो रही हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इतनी बड़ी पेड़ कटाई का वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) पर बुरा असर पड़ा है।

कटाई के प्रमुख उदाहरण

रिपोर्ट में कुछ ठोस उदाहरण भी दिए गए हैं। सिंगरौली में 1397.54 हेक्टेयर वन भूमि पर करीब 35 हजार पेड़ों को काटा गया है, वहीं घने जंगलों में 5.7 लाख पेड़ों की कटाई का प्रस्ताव है। खंडवा में रेलवे परियोजना के लिए 1.25 लाख पेड़ काटे जा रहे हैं, और विदिशा में भोपाल-कानपुर राजमार्ग के लिए 25 हजार पेड़ों की कटाई हो रही है। इसके अलावा, भोपाल, इंदौर-उज्जैन और ग्वालियर में सड़क चौड़ीकरण के नाम पर हजारों पेड़ों को हटाया जा रहा है।

किन-किन से जवाब तलब

NGT ने इस मामले में राज्य सरकार और कई एजेंसियों को नोटिस जारी किया है:

  • राज्य सरकार
  • प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड
  • वन और पर्यावरण से जुड़े विभाग
  • संबंधित स्थानीय निकाय

साथ ही NGT ने साफ किया है कि पानी की निगरानी, पेड़ों की कटाई की अनुमति और पर्यावरणीय नुकसान की भरपाई पर ठोस और ज़मीनी जवाब देना अनिवार्य है।

NGT की सख्त टिप्पणी

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की प्रधान पीठ अध्यक्षता न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव और विशेषज्ञ सदस्य डॉ. ए. सेंथिल वेल कर रहे हैं। उन्होंने कहा है कि पीने के पानी का गंदा होना और विकास परियोजनाओं के नाम पर बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई किसी भी हालत में स्वीकार्य नहीं है।

पीठ ने माना कि ऐसी घटनाएं गंभीर पर्यावरणीय और जनस्वास्थ्य संकट की ओर इशारा करती हैं। ये मामले पहली नजर में पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 और जल प्रदूषण नियंत्रण अधिनियम, 1974 का उल्लंघन करते हैं।

ट्रिब्यूनल ने साफ किया कि नागरिकों के सुरक्षित पेयजल के अधिकार से कोई समझौता नहीं किया जा सकता, और अगर नियमों का पालन नहीं किया गया तो संबंधित विभागों और अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराया जाएगा। यह राज्य सरकार और प्रशासन के लिए एक स्पष्ट चेतावनी है।

मामला क्यों गंभीर है

यह केवल पानी या पेड़ों तक सीमित नहीं है। दूषित पानी सीधे लोगों की सेहत पर असर डालता है, जबकि पेड़ों की कटाई पर्यावरणीय संतुलन बिगाड़ती है। NGT ने इसे ऐसा मुद्दा माना है, जिसका असर आज ही नहीं, आने वाले वर्षों तक देखने को मिल सकता है।

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