ओबीसी आरक्षण पर कानूनी लड़ाई या वोट बैंक की राजनीति? आदित्य सांघी ने राजनीतिक दलों पर उठाए सवाल

Neel Tiwari | Oct 20, 2026, 18:51 IST
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ओबीसी आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट पहुंचने की होड़।
ओबीसी आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट पहुंचने की होड़।

मध्यप्रदेश में 27% ओबीसी आरक्षण का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुका है। इसके बाद भाजपा नेताओं की SLP पर सवाल उठने लगे हैं। सामान्य वर्ग के वरिष्ठ अधिवक्ता आदित्य सांघी ने इसे वोट बैंक की राजनीति बताया। उन्होंने कहा कि याचिका दाखिल करना अलग बात है। सुप्रीम कोर्ट में याचिका सुनवाई योग्य होना असली सवाल है।

याचिका दाखिल करना आसान

मध्यप्रदेश में 27% ओबीसी आरक्षण पर कानूनी लड़ाई जारी है। अब सुप्रीम कोर्ट पहुंचे याचिकाकर्ताओं की पात्रता भी चर्चा का विषय बन गई है। सामान्य वर्ग की पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता आदित्य सांघी ने द सूत्र से विशेष बातचीत की। उन्होंने कहा कि कोई भी व्यक्ति संसाधन और खर्च जुटाकर याचिका दाखिल कर सकता है। अदालत उसकी याचिका सुनेगी या नहीं, यह ज्यादा महत्वपूर्ण है।

उनके मुताबिक जबलपुर हाईकोर्ट में जिसके खिलाफ फैसला आता है, वह सुप्रीम कोर्ट जा सकता है। सामान्यतः वही पक्ष सुप्रीम कोर्ट में फैसले को चुनौती देता है। इस मामले में राज्य सरकार हाईकोर्ट में प्रतिवादी थी। इसलिए सरकार के पास फैसले को चुनौती देने का सीधा आधार है।

ओबीसी आरक्षण पर बड़ा झटका: 27% आरक्षण रद्द, 13% होल्ड पदों पर अनारक्षित वर्ग की नियुक्ति के निर्देश | Big blow to OBC reservation: 27% reservation cancelled, directions for appointment of unreserved category in 13% hold posts
27% OBC आरक्षण पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, 13% होल्ड पदों पर अनारक्षित वर्ग को नियुक्ति के निर्देश
09 Oct 2026 ,
By Neel Tiwari
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण को लेकर बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने 2019 में ओबीसी आरक्षण 14 से बढ़ाकर 27 फीसदी करने वाले कानून को संविधान के खिलाफ मानते हुए रद्द कर दिया है। यानी अब ओबीसी वर्ग को फिर से 14 फीसदी आरक्षण मिलेगा। इसके साथ ही 13 फीसदी पदों पर अनारक्षित वर्ग के उम्मीदवारों को नियुक्ति देने के निर्देश दिए हैं।
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण को लेकर बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने 2019 में ओबीसी आरक्षण 14 से बढ़ाकर 27 फीसदी करने वाले कानून को संविधान के खिलाफ मानते हुए रद्द कर दिया है। यानी अब ओबीसी वर्ग को फिर से 14 फीसदी आरक्षण मिलेगा। इसके साथ ही 13 फीसदी पदों पर अनारक्षित वर्ग के उम्मीदवारों को नियुक्ति देने के निर्देश दिए हैं।

सुप्रीम कोर्ट याचिका सुनेगा या नहीं, यही मुख्य सवाल

भाजपा पिछड़ा वर्ग मोर्चा अध्यक्ष और राजगढ़ विधायक अमर सिंह यादव ने भी याचिकाएं लगाई हैं। सांघी के मुताबिक इन याचिकाओं की स्वीकार्यता पर सवाल उठ सकता है। दोनों नेता मूल प्रकरण में पक्षकार नहीं थे। ऐसे में उनकी याचिकाएं सुनवाई योग्य कैसे हैं, यह सवाल उठेगा। सांघी ने कहा कि भाजपा या कांग्रेस भी याचिका दायर कर सकती है। कोई आम व्यक्ति भी सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर सकता है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट याचिका सुनेगा या नहीं, यही मुख्य सवाल है।

भाजपा नेताओं के सुप्रीम कोर्ट पहुंचने को बताया 'चीप पॉलिटिक्स'

ओबीसी आरक्षण मामले में मुख्य याचिका की पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता ने सवाल उठाए। उन्होंने भाजपा नेताओं की याचिकाओं को राजनीतिक संदेश देने की कोशिश बताया। साथ ही इसे 'चीप पॉलिटिक्स' करार दिया। सांघी ने कहा कि राजनीतिक दल हाईकोर्ट में पक्षकार होते तो स्थिति अलग होती।

तब वे फैसले को चुनौती देने के लिए अलग कानूनी आधार रख सकते थे। लेकिन किसी विधायक या राजनीतिक पदाधिकारी का जनप्रतिनिधि होना ही पर्याप्त नहीं है। इससे सुप्रीम कोर्ट में उसकी याचिका पर सुनवाई सुनिश्चित नहीं होती। सांघी के मुताबिक याचिका दाखिल होने और कानूनी कसौटी पर टिकने में अंतर है। अदालत यह देखेगी कि याचिकाकर्ता का मामले से सीधा संबंध क्या है। साथ ही उसे अलग से सुनने की जरूरत क्यों है।

ज्यादा समय से भर्ती का इंतजार कर रहे अभ्यर्थी

सांघी ने ओबीसी आरक्षण (OBC Reservation) विवाद को राजनीतिक रंग दिए जाने पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि सामान्य और आरक्षित दोनों वर्गों के अभ्यर्थी लंबे समय से प्रभावित हैं। उनके मुताबिक आरक्षण को 14% से बढ़ाकर 27% करने पर विवाद हुआ। इसके अलावा 13% पदों को होल्ड रखने का मामला भी सामने आया। भर्ती प्रक्रिया से जुड़े अलग-अलग विवादों के कारण युवाओं को नुकसान उठाना पड़ा है।

सांघी ने राजनीतिक दलों को इस मुद्दे पर आगाह किया। उन्होंने कहा कि वोट बैंक की राजनीति से मामला और उलझ सकता है। इससे युवाओं की निराशा भी बढ़ सकती है। उनका तर्क है कि आरक्षण के मामले को राजनीतिक लाभ से ऊपर रखना चाहिए। इसका समाधान संवैधानिक और कानूनी आधार पर होना चाहिए। सांघी ने कहा कि अब अभ्यर्थियों को अनिश्चितता में नहीं रखना चाहिए। कानूनी प्रक्रिया को निर्णायक मोड़ तक पहुंचाना जरूरी है।

50% आरक्षण सीमा पर टिकी कानूनी बहस

सांघी ने 1992 के इंद्रा साहनी फैसले का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने सामान्य परिस्थितियों में आरक्षण की 50% सीमा तय की थी। इस सीमा से आगे जाने के लिए असाधारण परिस्थितियों का आधार जरूरी है। उनके मुताबिक मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने 27% ओबीसी आरक्षण से संबंधित कानून रद्द किया है। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कई निष्कर्ष भी दिए हैं। सांघी का मानना है कि इन निष्कर्षों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देना आसान नहीं होगा। हालांकि सरकार अपने पक्ष में संवैधानिक दलीलें और आंकड़े पेश कर सकती है। सुप्रीम कोर्ट भी हाईकोर्ट के फैसले की समीक्षा करने के लिए स्वतंत्र है।

यदि सुप्रीम कोर्ट हाईकोर्ट का फैसला बरकरार रखता है, तो इसका असर पड़ेगा। इसका प्रभाव मध्यप्रदेश की ओबीसी आरक्षण व्यवस्था पर होगा। वहीं सुप्रीम कोर्ट फैसला पलटता है, तो स्थिति बदल सकती है। अंतरिम राहत मिलने पर भी आरक्षण की स्थिति में बदलाव संभव है। फिलहाल सरकार और भाजपा नेताओं की ओर से कानूनी तर्क रखे जाएंगे। सामान्य वर्ग भी अदालत में अपना पक्ष रखेगा। इन सभी तर्कों पर अंतिम निर्णय सुप्रीम कोर्ट को करना है।

असली सवाल: सुप्रीम कोर्ट किसकी याचिका सुनेगा?

मध्य प्रदेश सरकार की SLP के साथ भाजपा नेताओं की याचिकाएं भी सुप्रीम कोर्ट पहुंची हैं। इनमें भाजपा पिछड़ा वर्ग मोर्चा अध्यक्ष और विधायक अमर सिंह यादव की याचिकाएं शामिल हैं। अब इन याचिकाओं का भविष्य सुप्रीम कोर्ट के रुख पर निर्भर करेगा। अदालत इन याचिकाओं पर अलग से सुनवाई कर सकती है।

इन्हें सरकार की याचिका के साथ भी जोड़ा जा सकता है। अदालत पहले इन याचिकाओं की स्वीकार्यता पर भी विचार कर सकती है। सामान्य वर्ग की ओर से यूथ फॉर इक्वलिटी ने भी कैविएट दाखिल किया है। इसका उद्देश्य संबंधित पक्ष को सुने बिना एकतरफा आदेश दिए जाने से बचाना है। हालांकि कैविएट अपने आप किसी अंतरिम राहत या स्टे को नहीं रोकता। ऐसे में 27% ओबीसी आरक्षण की कानूनी लड़ाई अब और महत्वपूर्ण हो गई है। अब सवाल अदालत में पक्ष रखने के अधिकार का भी है। कौन अपनी बात रखने का अधिकार स्थापित कर पाएगा, यह सुप्रीम कोर्ट तय करेगा।
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