92 याचिकाएं और 92 सुनवाई, जल्द आ सकता है 27% OBC आरक्षण पर फैसला
Neel Tiwari | Aug 21, 2026, 12:41 IST
obc reservation mp high court verdict august 2026
मध्य प्रदेश में 27% ओबीसी आरक्षण मामले की 92 सुनवाई पूरी हो चुकी हैं। 5 अगस्त को हाई कोर्ट ने फैसला सुरक्षित किया था। अगस्त में ही फैसले की संभावना है।
जबलपुर। मध्य प्रदेश में 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण से जुड़े मामले में अब जल्द फैसला आ सकता है। हाई कोर्ट के सूत्रों के मुताबिक अगले एक-दो दिनों में फैसला आने की संभावना है। हालांकि कोर्ट ने अभी तक फैसले की कोई आधिकारिक तारीख तय नहीं की है। इसलिए इसे सिर्फ संभावित समय माना जा रहा है।
इस मामले की शुरुआत 19 मार्च 2019 को हुई थी। इसकी मुख्य याचिका डब्ल्यूपी 5901/2019 आशिता दुबे विरुद्ध मध्य प्रदेश राज्य है। इसी याचिका में 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण को चुनौती दी गई थी। उस समय कोर्ट ने मामले में नोटिस जारी किया था और आरक्षण को लेकर अंतरिम व्यवस्था भी बनाई थी।
इस मामले से जुड़ी कई अन्य याचिकाएं भी हाई कोर्ट में चल रही हैं। 2021 में हाई कोर्ट ने 14 प्रतिशत से ज्यादा ओबीसी आरक्षण के आधार पर होने वाली नियुक्तियों पर रोक लगाने की व्यवस्था दी थी। अब सभी की नजर हाई कोर्ट के आने वाले फैसले पर है।
मामले की सुनवाई के दौरान कई बार स्थिति बदली। जनवरी 2024 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद हाई कोर्ट में सुनवाई प्रभावित हुई। इसके बाद कुछ याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट पहुंचीं। अगस्त 2024 में कुछ मामलों को सुप्रीम कोर्ट भेजने की प्रक्रिया भी हुई।
2026 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद मामला फिर जबलपुर हाई कोर्ट में आया। इसके बाद हाई कोर्ट ने सुनवाई के लिए विशेष डिवीजन बेंच बनाई। 23 मार्च और 2 अप्रैल को सुनवाई हुई। अप्रैल में कुछ याचिकाओं में बदलाव और दस्तावेजों से जुड़े मामलों के कारण सुनवाई आगे बढ़ गई।
13 और 14 मई को फिर सुनवाई (27 फीसदी ओबीसी आरक्षण मामला) हुई। वहीं 16 मई को मामले को आगे की सुनवाई के लिए रखा गया। बाद में अधिवक्ता आदित्य सांघी के उपलब्ध नहीं होने के कारण सुनवाई 24 जून तक टल गई। इसके बाद 24 जून को नई बेंच के सामने सुनवाई हुई। कोर्ट ने मामले में अंतिम सुनवाई की तैयारी शुरू कर दी। 15 जुलाई से इस मामले में रोजाना सुनवाई शुरू हुई।
15 जुलाई से 5 अगस्त तक मध्यप्रदेश ओबीसी आरक्षण केस में लगातार सुनवाई चली। इस दौरान कुल 14 बार सुनवाई हुई। सामान्य वर्ग की ओर से 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण पर आपत्तियां रखी गईं। वहीं ओबीसी पक्ष ने आरक्षण के समर्थन में अपनी दलीलें दीं। राज्य सरकार ने भी अपना पक्ष और तथ्य कोर्ट के सामने रखे।
पूरी बहस में सबसे बड़ा मुद्दा 50 प्रतिशत आरक्षण की सीमा रहा। इसके अलावा 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण बढ़ाने के आधार पर भी चर्चा हुई। सामान्य वर्ग की ओर से अमन लेखी, गोपाल शंकर नारायणन और अधिवक्ता आदित्य सांघी ने दलीलें रखीं। वहीं ओबीसी पक्ष से विनायक प्रसाद शाह और शशांक रत्नू ने अपना पक्ष रखा।
सुनवाई के दौरान इंदिरा साहनी केस समेत कई बड़े संवैधानिक फैसलों का हवाला दिया गया। आखिर में 5 अगस्त को हाई कोर्ट ने मामले में फैसला सुरक्षित रख लिया।
इस मामले की सुनवाई का सफर लंबा होने के साथ काफी पेचीदा भी रहा। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, 19 मार्च 2019 से 5 अगस्त 2026 तक यह मामला 92 बार सुनवाई के लिए सूचीबद्ध हुआ। यानी शुरुआत से फैसला सुरक्षित होने तक करीब सात साल चार महीने का समय लगा।
इस दौरान कई बार बेंच बदली और सुनवाई आगे बढ़ती रही। कुछ मामले सुप्रीम कोर्ट भी पहुंचे। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद इन्हें दोबारा हाई कोर्ट में सुनवाई के लिए भेजा गया। इसके बाद हाई कोर्ट ने विशेष बेंच बनाकर अंतिम सुनवाई पूरी कराई।
अब फैसला सुरक्षित है और सबकी नजर इस बात पर है कि 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण को लेकर हाई कोर्ट क्या निर्णय सुनाता है।
यह मामला सिर्फ आरक्षण के प्रतिशत तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर प्रदेश की भर्ती और चयन प्रक्रिया पर भी पड़ सकता है। साल 2019 में ओबीसी आरक्षण को 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत किया गया था। इससे प्रदेश में कुल आरक्षण 50 प्रतिशत से बढ़कर 63 प्रतिशत होने की स्थिति बनी।
इसी बदलाव को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई थी। 2021 के हाई कोर्ट आदेश में भी यही संवैधानिक सवाल मुख्य रूप से सामने आया था। अब कोर्ट के फैसले के बाद लंबित भर्तियों और आरक्षण व्यवस्था को लेकर स्थिति साफ होने की उम्मीद है। हालांकि इसका अंतिम असर अदालत के फैसले और उसमें दिए गए निर्देशों पर निर्भर करेगा।
हाई कोर्ट के विश्वसनीय सूत्रों के मुताबिक, इस मामले में फैसला अगस्त महीने में ही आ सकता है। हालांकि कोर्ट ने अभी तक फैसले की कोई आधिकारिक तारीख घोषित नहीं की है, इसलिए इसे संभावित समय ही माना जा रहा है।
फैसला सुरक्षित होने के बाद प्रदेश में इसे लेकर इंतजार और बढ़ गया है। सात साल से ज्यादा समय से चल रहे इस विवाद पर अब जल्द स्थिति साफ होने की उम्मीद है। सामान्य वर्ग, ओबीसी वर्ग और सरकार, तीनों की नजर इस फैसले पर है। इसके साथ ही हजारों अभ्यर्थी भी जबलपुर हाई कोर्ट के आदेश का इंतजार कर रहे हैं।
27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण से जुड़े इस मामले की शुरुआत साल 2019 में हुई थी। इसकी मुख्य याचिका डब्ल्यूपी 5901/2019 आशिता दुबे विरुद्ध मध्य प्रदेश राज्य 14 मार्च 2019 को रजिस्टर हुई थी। पहली सुनवाई 19 मार्च 2019 को हुई थी। इसके बाद मामला कई सालों तक हाई कोर्ट में चलता रहा।
23 जनवरी 2024 को शिवम गौतम विरुद्ध मध्य प्रदेश राज्य (W.P. No. 3668/2022) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इन प्रकरणों की सुनवाई पर हाई कोर्ट को रोक लगा दी थी। इसके बाद 2 जून 2024 को जस्टिस शील नागू की डिवीजन बेंच ने सुनवाई जुलाई 2024 तक टाल दी।
31 जुलाई 2024 को मामला तत्कालीन एक्टिंग चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की डिवीजन बेंच के सामने आया, लेकिन सुनवाई फिर चार सप्ताह के लिए आगे बढ़ गई।
इसके बाद 20 अगस्त 2024 को सुप्रीम कोर्ट के Transfer Petition (C) No. 1120/2023 में दिए गए आदेश के आधार पर इन मामलों को सुप्रीम कोर्ट ट्रांसफर कर दिया गया। इसका आदेश 2 सितंबर 2024 को जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की बेंच ने जारी किया।
19 फरवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने इन मामलों की सुनवाई के लिए विशेष बेंच बनाई और निर्देश दिया कि मामलों की सुनवाई हाई कोर्ट में ही होगी। इसके बाद सभी मामले दोबारा जबलपुर हाई कोर्ट भेज दिए गए।
सुप्रीम कोर्ट में चल रही सिविल अपील 11442/2026 और 11443/2026 के आदेश के बाद 26 फरवरी 2026 को हाई कोर्ट में इस मामले के लिए स्पेशल बेंच गठित की गई।
इसके बाद 23 मार्च 2026 को मामले की सुनवाई हुई। उस समय संजीव सचदेवा चीफ जस्टिस बन चुके थे। उनके साथ जस्टिस विनय सराफ की डिवीजन बेंच ने सुनवाई की, लेकिन सुप्रीम कोर्ट से सभी मामलों के ट्रांसफर होकर नहीं आने के कारण सुनवाई आगे बढ़ा दी गई।
2 अप्रैल 2026 को सभी याचिकाएं लिस्ट हुईं। इस दौरान कुछ याचिकाओं में संशोधन की मांग की गई। 27 अप्रैल को दस्तावेज अपलोड करने और अन्य कारणों से सुनवाई टल गई। कोर्ट ने तय किया कि 28 अप्रैल से मामले की लगातार तीन दिन सुनवाई होगी।
28 अप्रैल को कोर्ट को जानकारी दी गई कि तीन याचिकाएं अभी सुप्रीम कोर्ट से ट्रांसफर होकर लिस्ट नहीं हुई हैं। इसके बाद 13, 14 और 15 मई को लगातार सुनवाई का समय तय किया गया।
13 और 14 मई को सुनवाई हुई। इसके बाद मामला 16 मई को लिस्ट हुआ, लेकिन याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता आदित्य सांघी के उपलब्ध नहीं होने के कारण सुनवाई 24 जून तक टल गई।
इसके बाद हाई कोर्ट में ग्रीष्मकालीन अवकाश शुरू हो गया। इसी दौरान चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा सुप्रीम कोर्ट चले गए और जस्टिस विनय सराफ का ट्रांसफर इंदौर हो गया।
24 जून 2026 को मामला जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस बीपी शर्मा की डिवीजन बेंच में पहुंचा। कोर्ट ने तय किया कि अब इस मामले में अंतिम सुनवाई की जाएगी। इसके लिए 15 जुलाई 2026 की तारीख तय की गई।
8 जुलाई को सुनवाई के लिए जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस विनय सराफ की डिवीजन बेंच गठित की गई। हालांकि 14 जुलाई को प्रशासनिक गलती से मामला लिस्ट हो गया था। इसके बाद 15 जुलाई से रोजाना सुनवाई शुरू हुई।
15 जुलाई से 5 अगस्त तक मामले में कुल 14 बार सुनवाई हुई। इस दौरान सामान्य वर्ग की ओर से 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण के विरोध में तथ्य रखे गए। वहीं ओबीसी पक्ष और राज्य सरकार ने आरक्षण के समर्थन में अपनी दलीलें पेश कीं।
बहस के दौरान 27% ओबीसी रिजर्वेशनबढ़ाने के आधार और आरक्षण की 50 प्रतिशत सीमा समेत कई संवैधानिक मुद्दों पर चर्चा हुई।
19 मार्च 2019 से 5 अगस्त 2026 तक यह मामला (27 percent OBC reservation case) कुल 92 बार सुनवाई के लिए लिस्ट हुआ। यानी पहली सुनवाई से फैसला सुरक्षित होने तक करीब 7 साल, 4 महीने और 17 दिन का समय लगा। अब सभी की नजर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के अंतिम फैसले पर टिकी है। ताजा जानकारी के अनुसार सोमवार या मंगलवार को फैसला आने की पूरी उम्मीद है। जबलपुर हाईकोर्ट ओबीसी आरक्षण केस
मध्य प्रदेश में 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण केस पर फैसला कब, इसी से आजाद होंगे 13 फीसदी होल्ड पद
27% ओबीसी आरक्षण के मामले में पूरी हुई अंतिम सुनवाई, फैसला सुरक्षित
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इस मामले की शुरुआत 19 मार्च 2019 को हुई थी। इसकी मुख्य याचिका डब्ल्यूपी 5901/2019 आशिता दुबे विरुद्ध मध्य प्रदेश राज्य है। इसी याचिका में 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण को चुनौती दी गई थी। उस समय कोर्ट ने मामले में नोटिस जारी किया था और आरक्षण को लेकर अंतरिम व्यवस्था भी बनाई थी।
इस मामले से जुड़ी कई अन्य याचिकाएं भी हाई कोर्ट में चल रही हैं। 2021 में हाई कोर्ट ने 14 प्रतिशत से ज्यादा ओबीसी आरक्षण के आधार पर होने वाली नियुक्तियों पर रोक लगाने की व्यवस्था दी थी। अब सभी की नजर हाई कोर्ट के आने वाले फैसले पर है।
सात साल से ज्यादा लंबा रहा कानूनी सफर
2026 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद मामला फिर जबलपुर हाई कोर्ट में आया। इसके बाद हाई कोर्ट ने सुनवाई के लिए विशेष डिवीजन बेंच बनाई। 23 मार्च और 2 अप्रैल को सुनवाई हुई। अप्रैल में कुछ याचिकाओं में बदलाव और दस्तावेजों से जुड़े मामलों के कारण सुनवाई आगे बढ़ गई।
13 और 14 मई को फिर सुनवाई (27 फीसदी ओबीसी आरक्षण मामला) हुई। वहीं 16 मई को मामले को आगे की सुनवाई के लिए रखा गया। बाद में अधिवक्ता आदित्य सांघी के उपलब्ध नहीं होने के कारण सुनवाई 24 जून तक टल गई। इसके बाद 24 जून को नई बेंच के सामने सुनवाई हुई। कोर्ट ने मामले में अंतिम सुनवाई की तैयारी शुरू कर दी। 15 जुलाई से इस मामले में रोजाना सुनवाई शुरू हुई।
15 जुलाई से 5 अगस्त तक चली मैराथन बहस
पूरी बहस में सबसे बड़ा मुद्दा 50 प्रतिशत आरक्षण की सीमा रहा। इसके अलावा 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण बढ़ाने के आधार पर भी चर्चा हुई। सामान्य वर्ग की ओर से अमन लेखी, गोपाल शंकर नारायणन और अधिवक्ता आदित्य सांघी ने दलीलें रखीं। वहीं ओबीसी पक्ष से विनायक प्रसाद शाह और शशांक रत्नू ने अपना पक्ष रखा।
सुनवाई के दौरान इंदिरा साहनी केस समेत कई बड़े संवैधानिक फैसलों का हवाला दिया गया। आखिर में 5 अगस्त को हाई कोर्ट ने मामले में फैसला सुरक्षित रख लिया।
92 सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित
इस दौरान कई बार बेंच बदली और सुनवाई आगे बढ़ती रही। कुछ मामले सुप्रीम कोर्ट भी पहुंचे। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद इन्हें दोबारा हाई कोर्ट में सुनवाई के लिए भेजा गया। इसके बाद हाई कोर्ट ने विशेष बेंच बनाकर अंतिम सुनवाई पूरी कराई।
अब फैसला सुरक्षित है और सबकी नजर इस बात पर है कि 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण को लेकर हाई कोर्ट क्या निर्णय सुनाता है।
फैसले का असर भर्ती और आरक्षण व्यवस्था पर पड़ सकता है
इसी बदलाव को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई थी। 2021 के हाई कोर्ट आदेश में भी यही संवैधानिक सवाल मुख्य रूप से सामने आया था। अब कोर्ट के फैसले के बाद लंबित भर्तियों और आरक्षण व्यवस्था को लेकर स्थिति साफ होने की उम्मीद है। हालांकि इसका अंतिम असर अदालत के फैसले और उसमें दिए गए निर्देशों पर निर्भर करेगा।
21 से 25 अगस्त के बीच फैसले की चर्चा
फैसला सुरक्षित होने के बाद प्रदेश में इसे लेकर इंतजार और बढ़ गया है। सात साल से ज्यादा समय से चल रहे इस विवाद पर अब जल्द स्थिति साफ होने की उम्मीद है। सामान्य वर्ग, ओबीसी वर्ग और सरकार, तीनों की नजर इस फैसले पर है। इसके साथ ही हजारों अभ्यर्थी भी जबलपुर हाई कोर्ट के आदेश का इंतजार कर रहे हैं।
2019 से 2026 तक चला कानूनी सफर (पूरी टाइमलाइन)
23 जनवरी 2024 को शिवम गौतम विरुद्ध मध्य प्रदेश राज्य (W.P. No. 3668/2022) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इन प्रकरणों की सुनवाई पर हाई कोर्ट को रोक लगा दी थी। इसके बाद 2 जून 2024 को जस्टिस शील नागू की डिवीजन बेंच ने सुनवाई जुलाई 2024 तक टाल दी।
31 जुलाई 2024 को मामला तत्कालीन एक्टिंग चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की डिवीजन बेंच के सामने आया, लेकिन सुनवाई फिर चार सप्ताह के लिए आगे बढ़ गई।
इसके बाद 20 अगस्त 2024 को सुप्रीम कोर्ट के Transfer Petition (C) No. 1120/2023 में दिए गए आदेश के आधार पर इन मामलों को सुप्रीम कोर्ट ट्रांसफर कर दिया गया। इसका आदेश 2 सितंबर 2024 को जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की बेंच ने जारी किया।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद फिर हाई कोर्ट पहुंचा मामला
सुप्रीम कोर्ट में चल रही सिविल अपील 11442/2026 और 11443/2026 के आदेश के बाद 26 फरवरी 2026 को हाई कोर्ट में इस मामले के लिए स्पेशल बेंच गठित की गई।
इसके बाद 23 मार्च 2026 को मामले की सुनवाई हुई। उस समय संजीव सचदेवा चीफ जस्टिस बन चुके थे। उनके साथ जस्टिस विनय सराफ की डिवीजन बेंच ने सुनवाई की, लेकिन सुप्रीम कोर्ट से सभी मामलों के ट्रांसफर होकर नहीं आने के कारण सुनवाई आगे बढ़ा दी गई।
2 अप्रैल 2026 को सभी याचिकाएं लिस्ट हुईं। इस दौरान कुछ याचिकाओं में संशोधन की मांग की गई। 27 अप्रैल को दस्तावेज अपलोड करने और अन्य कारणों से सुनवाई टल गई। कोर्ट ने तय किया कि 28 अप्रैल से मामले की लगातार तीन दिन सुनवाई होगी।
28 अप्रैल को कोर्ट को जानकारी दी गई कि तीन याचिकाएं अभी सुप्रीम कोर्ट से ट्रांसफर होकर लिस्ट नहीं हुई हैं। इसके बाद 13, 14 और 15 मई को लगातार सुनवाई का समय तय किया गया।
13 और 14 मई को सुनवाई हुई। इसके बाद मामला 16 मई को लिस्ट हुआ, लेकिन याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता आदित्य सांघी के उपलब्ध नहीं होने के कारण सुनवाई 24 जून तक टल गई।
15 जुलाई से शुरू हुई लगातार सुनवाई
24 जून 2026 को मामला जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस बीपी शर्मा की डिवीजन बेंच में पहुंचा। कोर्ट ने तय किया कि अब इस मामले में अंतिम सुनवाई की जाएगी। इसके लिए 15 जुलाई 2026 की तारीख तय की गई।
8 जुलाई को सुनवाई के लिए जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस विनय सराफ की डिवीजन बेंच गठित की गई। हालांकि 14 जुलाई को प्रशासनिक गलती से मामला लिस्ट हो गया था। इसके बाद 15 जुलाई से रोजाना सुनवाई शुरू हुई।
14 सुनवाई के बाद 5 अगस्त को फैसला सुरक्षित
बहस के दौरान 27% ओबीसी रिजर्वेशनबढ़ाने के आधार और आरक्षण की 50 प्रतिशत सीमा समेत कई संवैधानिक मुद्दों पर चर्चा हुई।
19 मार्च 2019 से 5 अगस्त 2026 तक यह मामला (27 percent OBC reservation case) कुल 92 बार सुनवाई के लिए लिस्ट हुआ। यानी पहली सुनवाई से फैसला सुरक्षित होने तक करीब 7 साल, 4 महीने और 17 दिन का समय लगा। अब सभी की नजर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के अंतिम फैसले पर टिकी है। ताजा जानकारी के अनुसार सोमवार या मंगलवार को फैसला आने की पूरी उम्मीद है। जबलपुर हाईकोर्ट ओबीसी आरक्षण केस
मध्य प्रदेश में 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण केस पर फैसला कब, इसी से आजाद होंगे 13 फीसदी होल्ड पद
27% ओबीसी आरक्षण के मामले में पूरी हुई अंतिम सुनवाई, फैसला सुरक्षित
लापता बेटियों को ढूंढने में पुलिस की रफ्तार धीमी, 27% बढ़े अनसुलझे केस
ओबीसी आरक्षण पर होगा फैसला, 2500 सरपंच व 1750 पार्षद पद हो सकते हैं आरक्षित
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