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News In Short
सुप्रीम कोर्ट में 21 जनवरी 2026 को OBC 27 प्रतिशत आरक्षण से जुड़े सभी मामले लिस्ट हैं।
इस मामले में जस्टिस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक आराधे की खंडपीठ सुनवाई करेगी।
कानून पर स्टे नहीं, फिर भी सरकार ने आरक्षण लागू नहीं किया है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट को संवैधानिकता तय करने का अधिकार है।
हजारों अभ्यर्थियों के पद अब भी होल्ड पर है।
News In Detail
सुप्रीम कोर्ट में 21 जनवरी 2026 को OBC के 27 प्रतिशत आरक्षण पर सुनवाई होगी। इससे जुड़ीं सभी याचिकाएं मध्य प्रदेश सरकार ने हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट भेजी थीं। लंबे समय से ये मामले लंबित थे। अब इन मामलों में अंतिम बहस होने की संभावना जताई जा रही है।
सरकार पर बार-बार समय लेने के आरोप
OBC आरक्षण समर्थकों का आरोप है कि मध्य प्रदेश सरकार की ओर से इन मामलों में अंतिम बहस नहीं की जा रही है। साथ ही, बार-बार बहस के नाम पर समय लिया जा रहा है। कोर्ट कई बार स्पष्ट कर चुका है कि यदि कानून पर कोई स्टे नहीं है तो उसे लागू क्यों नहीं किया जा रहा है।
2019 में पारित कानून, आज तक लागू नहीं
मध्य प्रदेश विधानसभा ने 14 अगस्त 2019 को OBC के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण का कानून पारित किया था। ओबीसी वर्ग के अनुसार न तो इस कानून पर हाईकोर्ट ने रोक लगाई और न ही सुप्रीम कोर्ट ने रोक लागई है। इसके बावजूद सरकार ने इसे आज तक लागू नहीं किया है। RTI के जवाबों में सरकार अलग-अलग अंतरिम आदेशों का हवाला देकर आरक्षण लागू न करने की बात कहती रही है।
हाईकोर्ट के आदेशों का हवाला और भ्रम की स्थिति
सरकार ने कभी याचिका क्रमांक 18105/21 के आदेश तो कभी 3668/22 के आदेश का हवाला दिया है। इसके साथ ही, पदों को अनहोल्ड नहीं किया है। जबकि इन किसी भी आदेश में 27 प्रतिशत आरक्षण कानून पर रोक नहीं लगाई गई थी। बाद में संबंधित याचिकाएं खारिज भी हो चुकी हैं। इनकी पुष्टि सुप्रीम कोर्ट से भी हो चुकी है।
113 प्रतिशत रिजल्ट और 87 प्रतिशत नियुक्तियां
मध्य प्रदेश सरकार के जरिए भर्तियों में विज्ञापन 27 प्रतिशत OBC आरक्षण के हिसाब से निकाले जा रहे हैं। वहीं, नियुक्तियां केवल 14 प्रतिशत पदों पर दी जा रही हैं।
महाधिवक्ता के अभिमत के आधार पर 113 प्रतिशत परिणाम जारी किया गया था। इसके बाद, 13 प्रतिशत OBC और 13 प्रतिशत सामान्य वर्ग के पद होल्ड कर दिए गए हैं। इस कारण, हजारों अभ्यर्थियों का भविष्य अब अधर में लटक गया है।
अभ्यर्थियों के अंक और परिणाम भी सार्वजनिक नहीं
होल्ड किए गए अभ्यर्थियों के न तो अंक सार्वजनिक किए जा रहे हैं और न ही उनका अंतिम परिणाम घोषित किया गया है। सरकार की ओर से उनकी नियुक्ति को लेकर भी कोई स्पष्टता नहीं दी जा रही है। इससे असंतोष लगातार बढ़ रहा है।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: हाईकोर्ट को अधिकार
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि राज्य के किसी कानून की संवैधानिकता की जांच का प्रथम अधिकार अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट को है। इसी आधार पर 20 अभ्यर्थियों की याचिका खारिज करते हुए उन्हें हाईकोर्ट जाने की स्वतंत्रता दी गई है। इससे सभी लंबित मामले हाईकोर्ट को वापस भेजे जा सकते हैं।
सरकार की सहमति न बनने से अटका मामला
पिछली दो सुनवाइयों में सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया था कि आदेश निरस्त हो सकते हैं। इसके बाद मामले हाईकोर्ट को वापस भेजे जा सकते हैं। वहीं, इसके लिए सरकार की सहमति जरूरी है। चूंकि सभी मामले सरकार के अनुरोध पर सुप्रीम कोर्ट ट्रांसफर हुए हैं। इसके बाद भी असहमति के चलते यह प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी है।
ओबीसी पक्ष का दावा कोई कानूनी बाधा नहीं
OBC पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर का कहना है कि OBC के 27 प्रतिशत आरक्षण को लागू करने और होल्ड पदों को अनहोल्ड करने में कोई कानूनी बाधा नहीं है। सरकार चाहे तो अंतिम निर्णय के अधीन रहते हुए भी आरक्षण लागू कर सकती है। साथ ही, अभ्यर्थियों को राहत दे सकती है। हालांकि इन होल्ड पदों का प्रभाव केवल आरक्षित वर्ग पर ही नहीं पड़ रहा अनारक्षित वर्ग के अभ्यर्थी भी इस दायरे से प्रभावित हैं।
जानें OBC आरक्षण का इतिहास
भारत में ओबीसी को आरक्षण देने की प्रक्रिया 1950 के दशक में शुरू हुई थी, जब भारतीय संविधान में सामाजिक और शैक्षिक पिछड़े वर्गों को आरक्षण देने का प्रावधान किया गया था। लेकिन, समय-समय पर इस आरक्षण की प्रतिशतता और उसे लागू करने के तरीकों में बदलाव होते रहे हैं। 1980 के दशक में, मंडल कमीशन की सिफारिशों के बाद ओबीसी के लिए 27% आरक्षण लागू किया गया था, जो अब भी विवादों में है।
मंडल आयोग की रिपोर्ट (1980)
ओबीसी आरक्षण का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ 1980 में मंडल आयोग की रिपोर्ट के रूप में आया। इस आयोग का गठन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने किया था। इसका उद्देश्य पिछड़े वर्गों की पहचान करना और उनके लिए आरक्षण की सिफारिश करना था।
आयोग ने 52% भारतीयों को OBC श्रेणी में रखा और सिफारिश की कि उन्हें सरकारी नौकरियों में 27% आरक्षण दिया जाए। 1980 में मंडल आयोग की रिपोर्ट के बाद, 1990 में तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने इस रिपोर्ट को लागू करने का निर्णय लिया।
इसके बाद, ओबीसी के लिए 27% आरक्षण सरकारी नौकरियों और शैक्षिक संस्थानों में लागू किया गया। यह कदम भारतीय राजनीति और समाज में काफी विवादास्पद था, लेकिन इसे लंबे समय तक बहस और विरोध का सामना करने के बावजूद लागू किया गया।
21वीं सदी में ओबीसी आरक्षण
ओबीसी आरक्षण का मुद्दा 21वीं सदी में भी अमह बना रहा। 2006 में, सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला लिया था। इसमें यह कहा गया कि ओबीसी के लिए आरक्षण को शैक्षिक संस्थानों में 27% और अन्य क्षेत्रों में लागू किया जा सकता है।
हालांकि, 50% से अधिक आरक्षण के खिलाफ कोर्ट ने निर्णय दिया और इसे संविधान की मूल संरचना के खिलाफ माना था। इसके बाद, ओबीसी आरक्षण को लेकर विभिन्न राज्यों में नीतियों में बदलाव हुए थे। कुछ राज्यों ने ओबीसी के आरक्षण को बढ़ाया था। इसके साथ ही, आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए भी आरक्षण देने की दिशा में कदम उठाए गए थे।
OBC आरक्षण की वर्तमान स्थिति
आज के समय में ओबीसी आरक्षण एक जटिल और विवादास्पद मुद्दा बन चुका है। कई लोग इसे समाज के कमजोर वर्गों की मदद करने के रूप में मानते हैं, जबकि अन्य इसे सामाजिक असमानता को बढ़ावा देने वाला मानते हैं। ओबीसी के आरक्षण को लेकर कई बार आंदोलन और विरोध प्रदर्शन होते रहे हैं। इनमें प्रमुख रूप से सरकारी नौकरियों और शिक्षा संस्थानों में सीटों की संख्या को लेकर संघर्ष होते हैं।
संविधान में ओबीसी आरक्षण को लेकर कोई विशेष रूप से निर्धारित सीमा नहीं है। यह राज्यों पर निर्भर करता है कि वे इसे कैसे लागू करें। वर्तमान में, OBC के लिए 27% आरक्षण सरकारी नौकरी और शिक्षा संस्थानों में दिया जा रहा है, लेकिन इसमें भी आर्थिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों की स्थिति पर विचार किए जाने की आवश्यकता महसूस हो रही है।
Sootr Knowledge
जानें OBC आरक्षण का इतिहास
भारत में ओबीसी को आरक्षण देने की प्रक्रिया 1950 के दशक में शुरू हुई थी, जब भारतीय संविधान में सामाजिक और शैक्षिक पिछड़े वर्गों को आरक्षण देने का प्रावधान किया गया था। समय-समय पर इस आरक्षण की प्रतिशतता और उसे लागू करने के तरीकों में बदलाव होते रहे हैं। 1980 के दशक में, मंडल कमीशन की सिफारिशों के बाद ओबीसी के लिए 27% आरक्षण लागू किया गया था, जो अब भी विवादों में है।
मंडल आयोग की रिपोर्ट (1980)
ओबीसी आरक्षण का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ 1980 में मंडल आयोग की रिपोर्ट के रूप में आया था। इस आयोग का गठन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने किया था। इसका उद्देश्य पिछड़े वर्गों की पहचान करना और उनके लिए आरक्षण की सिफारिश करना था। आयोग ने 52% भारतीयों को OBC श्रेणी में रखा और सिफारिश की कि उन्हें सरकारी नौकरियों में 27% आरक्षण दिया जाए।
1980 में मंडल आयोग की रिपोर्ट आई थी। 1990 में प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह ने इसे लागू किया था। इसके बाद, ओबीसी के लिए 27% आरक्षण सरकारी नौकरियों और शैक्षिक संस्थानों में लागू हुआ था। यह कदम भारतीय राजनीति और समाज में विवादास्पद था। बावजूद इसके, इसे लंबे समय तक बहस और विरोध का सामना करने के बाद लागू किया गया था।
21वीं सदी में ओबीसी आरक्षण
ओबीसी आरक्षण का मुद्दा 21वीं सदी में भी अहम बना रहा। 2006 में, सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। इसमें यह कहा गया कि ओबीसी के लिए आरक्षण को शैक्षिक संस्थानों में 27% और अन्य क्षेत्रों में लागू किया जा सकता है। हालांकि, 50% से अधिक आरक्षण के खिलाफ कोर्ट ने लिया था। इसे संविधान की मूल संरचना के खिलाफ माना गया था।
इसके बाद, ओबीसी आरक्षण को लेकर विभिन्न राज्यों में नीतियों में बदलाव हुए थे। कुछ राज्यों ने ओबीसी के आरक्षण को बढ़ाया था। इसके साथ ही, आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए भी आरक्षण देने की दिशा में कदम उठाए थे।
OBC आरक्षण की वर्तमान स्थिति
आज के समय में ओबीसी आरक्षण एक जटिल और विवादास्पद मुद्दा बन चुका है। कई लोग इसे समाज के कमजोर वर्गों की मदद करने के रूप में मानते हैं, जबकि अन्य इसे सामाजिक असमानता को बढ़ावा देने वाला मानते हैं। ओबीसी के आरक्षण को लेकर कई बार आंदोलन और विरोध प्रदर्शन होते रहे हैं। इनमें प्रमुख रूप से सरकारी नौकरियों और शिक्षा संस्थानों में सीटों की संख्या को लेकर संघर्ष होते हैं।
संविधान में ओबीसी आरक्षण को लेकर कोई विशेष रूप से निर्धारित सीमा नहीं है। यह राज्यों पर निर्भर करता है कि वे इसे कैसे लागू करें। वर्तमान में, OBC के लिए 27% आरक्षण सरकारी नौकरी और शिक्षा संस्थानों में दिया जा रहा है। वहीं, इसमें भी आर्थिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों की स्थिति पर विचार किए जाने की आवश्यकता महसूस हो रही है।
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