एमपी, सीजी और राजस्थान में लोकसभा के साथ हो सकते विधानसभा चुनाव, जानें पूरा प्लान
Sourabh Bhatnagar | Aug 24, 2026, 12:39 IST
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एक देश-एक चुनाव को लेकर भाजपा आगे बढ़ रही है। जानकारी के मुताबिक इसका असर 2029 से ही दिख सकता है। इससे मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव लोकसभा चुनाव के साथ कराए जाने की संभावना बन रही है।
समझें क्या है पूरा मामला
- बीजेपी एक देश-एक चुनाव, महिला आरक्षण और यूसीसी पर आगे बढ़ रही।
- सूत्रों के मुताबिक इसका असर 2029 से ही दिखना शुरू हो सकता है।
- एमपी, राजस्थान, छत्तीसगढ़ विधानसभाओं का कार्यकाल दिसंबर 2028 तक है।
- इन राज्यों में तीन तरह की चुनावी संभावनाएं बताई जा रही हैं।
- जेपीसी नवंबर में शीत सत्र में अपनी रिपोर्ट सौंप सकती है।
राम मंदिर निर्माण और अनुच्छेद 370 हटाने जैसे बड़े फैसले पहले ही लागू हो चुके हैं। अब पार्टी का फोकस इन तीन मुद्दों पर है।
सूत्रों के मुताबिक, इन योजनाओं का असर साल 2029 से ही दिखना शुरू हो सकता है। हालांकि, एक देश-एक चुनाव को लेकर संसद में संविधान संशोधन विधेयक अभी लंबित है।
सरकार की योजना है कि इस विधेयक को पास कराया जाए। इसके लागू होने के बाद देश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने का रास्ता साफ हो सकता है।
विधेयक के मौजूदा प्रावधानों के अनुसार, एक देश-एक चुनाव व्यवस्था 2034 से लागू होने की बात कही गई है। लेकिन सूत्रों का कहना है कि सरकार इसे इससे पहले लागू करने की तैयारी कर सकती है।
इसके अलावा महिला आरक्षण और यूसीसी को लेकर भी बीजेपी अपने एजेंडे पर आगे बढ़ रही है। पार्टी इन मुद्दों को आने वाले समय की बड़ी राजनीतिक योजनाओं के तौर पर देख रही है।
2029 से दिख सकता है असर
इसके लिए चुनाव आयोग से सलाह लेकर रास्ता निकाला जा सकता है। अगर ऐसा होता है तो 2029 में लोकसभा चुनाव के साथ कुछ राज्यों में विधानसभा चुनाव भी कराए जा सकते हैं।
ऐसा होने पर एक देश-एक चुनाव की व्यवस्था का असर 2029 से ही दिखना शुरू हो जाएगा। हालांकि, यह पूरी तरह उस समय की राजनीतिक परिस्थितियों और सहमति पर निर्भर करेगा।
सूत्रों का कहना है कि अभी इस पर कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है। लेकिन सरकार के पास यह विकल्प मौजूद है और आने वाले समय में इस पर आगे बढ़ा जा सकता है।
एमपी-सीजी-राजस्थान पर क्या होगा असर
पहली संभावना यह है कि विधानसभा चुनावों को आगे बढ़ाने के लिए राष्ट्रपति शासन का विकल्प अपनाया जा सकता है। अगर ऐसा हुआ तो मार्च-अप्रैल 2029 में लोकसभा चुनाव के साथ ही इन राज्यों में विधानसभा चुनाव कराए जा सकते हैं।
दूसरी संभावना के मुताबिक, इन राज्यों में तय समय पर नई सरकारें बन सकती हैं। इसके बाद करीब छह महीने में विधानसभा भंग कर लोकसभा चुनाव के साथ दोबारा विधानसभा चुनाव कराने का रास्ता निकाला जा सकता है।
तीसरी संभावना यह है कि 2028 में विधानसभा चुनाव अपने तय समय पर ही हों। इसके बाद इन सरकारों का कार्यकाल 2033 तक चलेगा। फिर एक साल के लिए राष्ट्रपति शासन लगाकर 2034 में लोकसभा चुनाव के साथ विधानसभा चुनाव कराए जा सकते हैं।
हालांकि, इनमें से कौन सा विकल्प अपनाया जाएगा, यह उस समय की राजनीतिक स्थिति और संवैधानिक प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।
दूसरे राज्यों में क्या हो सकता है असर
वहीं, कुछ बीजेपी शासित राज्यों में चुनाव का समय आगे-पीछे किया जा सकता है। इनमें हरियाणा, महाराष्ट्र, दिल्ली, बिहार, पश्चिम बंगाल, असम और पुडुचेरी शामिल हैं। इन राज्यों में मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल तय समय से पहले खत्म किया जा सकता है। यह अंतर करीब छह महीने से लेकर दो साल तक हो सकता है।
एनडीए शासित त्रिपुरा, मेघालय, नगालैंड और मिजोरम में भी बदलाव की संभावना जताई जा रही है। इन राज्यों में विधानसभा चुनाव 2028 में होने हैं, लेकिन एक देश-एक चुनाव की व्यवस्था के तहत राष्ट्रपति शासन या 2029 में दोबारा चुनाव कराने जैसे विकल्पों पर विचार किया जा सकता है।
वहीं, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा, मणिपुर और गुजरात में 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं। इन राज्यों में क्या रणनीति अपनाई जाएगी, यह आने वाली सरकार और उस समय की राजनीतिक परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
आगे क्या होगा
संभावना है कि जेपीसी नवंबर में संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान अपनी रिपोर्ट पेश कर सकती है। अगर विधेयक संसद से पास हो जाता है तो इसके प्रावधान 2034 से लागू होने की बात कही गई है।
हालांकि, सूत्रों का कहना है कि इसका राजनीतिक असर 2029 से ही दिखाई देना शुरू (वन नेशन वन इलेक्शन) हो सकता है। ऐसे में आने वाले कुछ साल चुनावी और राजनीतिक लिहाज से काफी अहम माने जा रहे हैं।
मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों के मतदाताओं की नजर भी इस पूरे घटनाक्रम पर रहेगी। आने वाले समय में सरकार की रणनीति और चुनाव आयोग की सलाह के बाद तस्वीर और साफ हो सकती है।
वहीं, राजनीतिक दल भी इस मुद्दे पर अपनी तैयारियों में जुटे हैं। कई विपक्षी दलों ने इस विधेयक पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि इससे राज्यों की स्वायत्तता और संघीय ढांचे पर असर पड़ सकता है।
दूसरी तरफ, सरकार का तर्क है कि एक साथ चुनाव होने से चुनावी खर्च कम होगा और बार-बार चुनावों के कारण प्रशासनिक कामकाज पर पड़ने वाला असर भी घटेगा।
यही वजह है कि केंद्र सरकार इस विधेयक को लेकर गंभीर है। आने वाले शीत सत्र में इस मुद्दे पर संसद में बड़ी चर्चा होने की संभावना है।
FAQ
- प्रश्न 1: एक देश-एक चुनाव का असर एमपी, राजस्थान और छत्तीसगढ़ पर कब पड़ सकता है?
उत्तर: सूत्रों के मुताबिक इसका असर 2034 से पहले, यानी 2029 से ही दिख सकता है। तीनों राज्यों की मौजूदा विधानसभाओं का कार्यकाल दिसंबर 2028 तक है। ऐसे में इन्हें लोकसभा चुनाव 2029 के साथ जोड़ा जा सकता है। हालांकि यह अंतिम फैसला उस समय की राजनीतिक स्थिति पर निर्भर करेगा। - प्रश्न 2: एमपी-राजस्थान-छत्तीसगढ़ के लिए कौन सी तीन संभावनाएं बताई जा रही हैं?
उत्तर: पहली संभावना में राष्ट्रपति शासन के जरिए चुनाव आगे बढ़ाकर 2029 में कराए जा सकते हैं। दूसरी संभावना में नई सरकार बनने के छह महीने बाद विधानसभा भंग कर दोबारा चुनाव हो सकते हैं। तीसरी संभावना में 2028 में तय समय पर चुनाव हों और 2034 में लोकसभा के साथ अगला चुनाव कराया जाए। - प्रश्न 3: एक देश-एक चुनाव विधेयक की मौजूदा स्थिति क्या है?
उत्तर: यह संविधान संशोधन विधेयक अभी संसद में लंबित है। इस पर जेपीसी (Joint Parliamentary Committee) काम कर रही है, जो नवंबर के शीत सत्र में रिपोर्ट सौंप सकती है। विधेयक पारित होने पर इसके प्रावधान औपचारिक रूप से 2034 से लागू होंगे।
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