ऑडिट रिपोर्ट में बड़ा खुलासा: आरजीपीवी का 385 करोड़ रुपए का फंड गायब!

आरजीपीवी की ताजा ऑडिट रिपोर्ट में एक बड़ा वित्तीय घोटाला सामने आया है। इसमें विश्वविद्यालय के लगभग 385 करोड़ रुपए का फंड गायब हो गया है। जानें क्या है पूरा मामला...

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Amresh Kushwaha
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BHOPAL. राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (आरजीपीवी) में एक गंभीर वित्तीय गड़बड़ी का मामला सामने आया है। 2018-19 से 2022-23 तक की ऑडिट रिपोर्ट में विश्वविद्यालय के फंड में करोड़ों की राशि दिखाई गई थी। इसमें कॉर्पस फंड (Corpus Fund), यूआईटी (UIT) और यूआईटी सेल्फ फाइनेंस (UIT Self Finance) मद शामिल थे। वहीं, 2023-24 की रिपोर्ट में इन फंड्स का कोई हिसाब नहीं मिला। यह बड़ी वित्तीय गड़बड़ी का संकेत देता है। रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 385 करोड़ रुपए का फंड गायब हो गया है।

कहां गई 385 करोड़ की राशि?

वर्ष 2022-23 की बैलेंस शीट में कुल राशि 1742.81 करोड़ रुपए थी। ताजा ऑडिट रिपोर्ट में यह राशि घटकर 1357.65 करोड़ हो गई है। इसका मतलब करीब 385 करोड़ रुपए का फंड गायब हो गया है।

अब सवाल उठता है कि यह राशि कभी थी ही नहीं या इसे गायब कर दिया गया। रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि टैली डेटा में दर्ज राशि का न तो किसी अधिकारी ने सत्यापन किया है। न ही इसका कोई उचित रिकॉर्ड रखा गया है। यह पूरी अनियमितता विश्वविद्यालय प्रशासन की लापरवाही का परिणाम है।

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वित्तीय डेटा का नहीं हुआ सही तरीके से सत्यापन

गंभीर बात यह है कि इन वर्षों में विश्वविद्यालय के खाता विवरण का कोई दस्तावेजी प्रमाण नहीं था। अकाउंटिंग का सारा काम सिर्फ एक कर्मचारी पर निर्भर था। विश्वविद्यालय के पास बैंक खातों की पूरी सूची तक नहीं थी। इसका मतलब है कि विश्वविद्यालय के वित्तीय लेन-देन का कोई स्पष्ट रिकॉर्ड नहीं था। इसी वजह से यह गड़बड़ी सामने आई।

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आरजीपीवी में करोड़ों का घोटाला...

  • आरजीपीवी में वित्तीय गड़बड़ी: 2018-19 से 2022-23 तक की ऑडिट रिपोर्ट में विश्वविद्यालय के फंड में करोड़ों की राशि थी, लेकिन 2023-24 की रिपोर्ट में यह राशि गायब मिली।

  • 385 करोड़ रुपए का फंड गायब: वर्ष 2022-23 की बैलेंस शीट में 1742.81 करोड़ रुपए दिखाए गए थे, जो अब घटकर 1357.65 करोड़ रुपए हो गए हैं, यानी लगभग 385 करोड़ रुपए का फंड गायब हो गया है।

  • सत्यापन और रिकॉर्ड की कमी: वित्तीय डेटा का न तो सही तरीके से सत्यापन किया गया और न ही कोई दस्तावेजी प्रमाण रखा गया। विश्वविद्यालय के पास बैंक खातों की सूची भी नहीं थी।

  • कॉर्पस फंड का कोई खाता नहीं: विश्वविद्यालय ने कभी कॉर्पस फंड के लिए डेडिकेटेड खाता नहीं खोला। इसके लिए कोई ठोस लेखा-जोखा या प्रमाण नहीं था।

  • रजिस्ट्रार का बयान: आरजीपीवी के रजिस्ट्रार प्रो. मोहन सेन ने इसे गंभीर मामला बताते हुए राज्य शासन को सूचित करने की बात कही और वित्तीय अंतर को स्वीकार किया।

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कॉर्पस फंड के लिए न तो खाता था, न ही सही लेखा-जोखा

2023-24 की ऑडिट रिपोर्ट में विश्वविद्यालय प्रशासन ने साफ कहा है कि कुछ फंड्स का कोई ठोस आधार नहीं था। कॉर्पस फंड, यूआईटी और यूआईटी सेल्फ फाइनेंस मद में जो राशि दिखाई गई थी, उसका कोई प्रमाण नहीं था। विश्वविद्यालय ने कभी कॉर्पस फंड के लिए एक डेडिकेटेड खाता नहीं खोला है।

ऐसे में इन मदों में करोड़ों की राशि कैसे दिखाई गई? रिपोर्ट में यह भी आशंका जताई गई कि 300 से 385 करोड़ रुपए बिना रिकॉर्ड के गायब कर दिए गए हैं। इसके लिए कई बैंक खातों का निर्माण किया गया, लेकिन उनका कोई सही लेखा-जोखा नहीं रखा गया है।

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कॉर्पस फंड के लेकर प्रशासन की लापरवाही

कॉर्पस फंड का प्रस्ताव 19 जनवरी 2005 को आरजीपीवी की वित्त समिति की बैठक में किया गया था। इसमें कुल 3 करोड़ का प्रावधान रखा गया था। इस फंड के संचालन के लिए नियमों का एक स्टेच्युएट बनाने का फैसला लिया गया था। वहीं आज तक वह नियम पत्र नहीं बनाया गया। इसके साथ ही कोई लेजर भी तैयार नहीं किया गया है।

रजिस्ट्रार का बयान: यह मामला गंभीर है

आरजीपीवी के रजिस्ट्रार, प्रो. मोहन सेन ने कहा कि यह एक गंभीर मामला है। विश्वविद्यालय प्रशासन इस मामले को राज्य शासन को सूचित कर रहा है। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि ताजा बैलेंस शीट में वित्तीय स्थिति में अंतर पाया गया है।

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