सेडमैप-लोक शिक्षण में आउटसोर्सिंग का खेल? फर्जी नियुक्तियों पर बड़ा सवाल
Ramanand Tiwari | Feb 11, 2026, 22:02 IST
sedmap outsourcing fake
मध्यप्रदेश में सेडमैप और लोक शिक्षण विभाग में फर्जी नियुक्तियां की गईं। सार्वजनिक विज्ञापन जारी नहीं किया गया। उचित चयन प्रक्रिया भी नहीं अपनाई गई। मामले की जांच और कार्रवाई की मांग की जा रही है।
BHOPAL. मध्यप्रदेश में आउटसोर्सिंग के नाम पर भर्ती प्रक्रिया को लेकर बड़ा सवाल खड़ा हुआ है। सेडमैप (उद्यमिता विकास केंद्र) और लोक शिक्षण संचालनालय में कथित फर्जी नियुक्तियों का मामला सामने आया है। आरोप है कि रिटायर अधिकारियों को नियमों से हटकर पुनः नियुक्त किया गया। लाखों युवा नौकरी के इंतजार में हैं। यह रिपोर्ट आउटसोर्सिंग में संभावित फर्जीवाड़े के एंगल से तैयार की गई है। जहां पारदर्शिता और प्रक्रिया दोनों पर सवाल उठ रहे हैं।
जानकारी के अनुसार, लोक शिक्षण विभाग से सेवानिवृत्त प्रथम श्रेणी अधिकारियों को आउटसोर्सिंग के माध्यम से पुनः पदस्थ किया गया। इन पदों पर मासिक वेतन 35 हजार से 64 हजार रुपए तक बताया गया है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि इन पदों के लिए न तो सार्वजनिक विज्ञापन जारी हुआ। न ही ऑनलाइन आवेदन आमंत्रित किए गए।
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पूरा मामला गंभीर है क्योंकि चयन प्रक्रिया सार्वजनिक नहीं की गई। अगर पद रिक्त थे, तो क्यों नहीं खुली प्रतियोगी प्रक्रिया से भरे गए? यह बिंदु कथित फर्जीवाड़े को संदिग्ध बनाता है। रिटायर अधिकारियों को बिना खुला विज्ञापन पुनः नियुक्त किया गया। आवेदन और मेरिट प्रक्रिया का रिकॉर्ड सार्वजनिक नहीं किया गया। आउटसोर्स एजेंसी की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं।
2020 से अब तक अन्य विभागों में भी ऐसे मामलों की आशंका है। मेसर्स ओम पारस मैनपावर सर्विस, भोपाल का नाम सामने आया है। सवाल यह है कि एजेंसी को किस प्रक्रिया के तहत अधिकृत किया गया और भुगतान किन नियमों के आधार पर हुआ? अगर एजेंसी के माध्यम से नियुक्तियां हुईं, तो पारदर्शिता सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी किसकी थी?
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मामले की लिखित शिकायत मुख्यमंत्री कार्यालय सहित कई विभागों को भेजी गई है। इनमें स्कूल शिक्षा, श्रम, गृह, एमएसएमई विभाग, लोक शिक्षण संचालनालय और पुलिस महानिदेशक कार्यालय शामिल हैं। उच्च स्तरीय जांच और एफआईआर दर्ज करने की मांग की गई है।
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क्या सेडमैप पोर्टल पर इन पदों का विज्ञापन जारी हुआ था? कितने आवेदन प्राप्त हुए और चयन का आधार क्या था?
एजेंसी को भुगतान किस नियम के तहत हुआ? 2020 के बाद कितने विभागों में ऐसी नियुक्तियां हुईं? एजेंसी को अधिकृत करने की शर्तें क्या थीं?
युवा कांग्रेस प्रवक्ता विवेक त्रिपाठी ने कहा कि यह प्रशासनिक त्रुटि नहीं है। यह बेरोजगार युवाओं के अधिकारों से जुड़ा गंभीर विषय है। पारदर्शिता न होने पर युवाओं के भविष्य के साथ अन्याय होगा। उन्होंने निष्पक्ष जांच की मांग की। वे चाहते हैं कि आपराधिक प्रकरण दर्ज हो। संबंधित अधिकारियों और एजेंसी की भूमिका की जांच हो। फर्जी नियुक्तियां निरस्त की जाएं। ईओडब्ल्यू या एसआईटी से स्वतंत्र जांच कराई जाए।
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आउटसोर्सिंग व्यवस्था का मकसद त्वरित और जरूरत आधारित नियुक्ति है। लेकिन यदि प्रक्रिया पारदर्शी न हो, तो यह सवालों के घेरे में आ जाती है। अब देखना होगा कि शासन इस मामले में क्या कदम उठाता है। जांच किस दिशा में जाती है, यह भी अहम होगा।
आउटसोर्सिंग के नाम पर क्या हुआ?
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भर्ती प्रक्रिया पर क्यों उठ रहे हैं सवाल?
2020 से अब तक अन्य विभागों में भी ऐसे मामलों की आशंका है। मेसर्स ओम पारस मैनपावर सर्विस, भोपाल का नाम सामने आया है। सवाल यह है कि एजेंसी को किस प्रक्रिया के तहत अधिकृत किया गया और भुगतान किन नियमों के आधार पर हुआ? अगर एजेंसी के माध्यम से नियुक्तियां हुईं, तो पारदर्शिता सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी किसकी थी?
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शिकायत किन-किन तक पहुंची?
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सरकार के सामने उठे अहम सवाल
एजेंसी को भुगतान किस नियम के तहत हुआ? 2020 के बाद कितने विभागों में ऐसी नियुक्तियां हुईं? एजेंसी को अधिकृत करने की शर्तें क्या थीं?
विवेक त्रिपाठी का बयान
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पारदर्शिता बनाम प्रक्रिया
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