राहत लेने पहुंचे थे हाईकोर्ट, बढ़ गई मुश्किल: सुभाष शुक्ला को 15 दिनों में जमा करने होंगे 4.48 लाख रूपए

बाल श्रवण योजना घोटाले में फंसे DEIM सुभाष शुक्ला को जबलपुर हाईकोर्ट ने सशर्त राहत दी है। कोर्ट ने उन्हें 15 दिनों में 4.48 लाख जमा करने का आदेश दिया है।

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Neel Tiwari
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Subhash Shukla will have to deposit Rs 4.48 lakh in 15 days

Photograph: (the sootr)

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NEWS IN SHORT

  • सुभाष शुक्ला की सेवा समाप्ति पर हाईकोर्ट की अंतरिम रोक
  • 8.96 लाख की वसूली पर सशर्त स्टे, 50% राशि जमा करना जरूरी
  • 15 दिन में पैसे नहीं जमा किए तो स्वतः खत्म होगा स्टे
  • जनहित याचिका के आधार पर PIL हस्तक्षेप स्वीकार
  • अगली सुनवाई फरवरी 2026 के अंतिम सप्ताह में 

INTRO

बाल श्रवण योजना घोटाले में कार्रवाई से राहत पाने के लिए DEIM सुभाष शुक्ला जबलपुर हाईकोर्ट पहुंचे थे। हाईकोर्ट ने उनकी बर्खास्तगी और वसूली पर रोक तो लगा दी, लेकिन यह राहत पूरी तरह शर्तों के साथ दी गई।

अब सुभाष शुक्ला को 15 दिनों के भीतर 8.96 लाख रुपए की वसूली का 50 प्रतिशत यानी 4.48 लाख रुपए जमा करना अनिवार्य हो गया है। सुभाष शुक्ला के लिए तो यह मामला वैसा ही है कि जैसे गए थे हरि भजन को, ओटन लगे कपास।

NEWS IN DETAIL

मुख्यमंत्री बाल श्रवण योजना में वित्तीय अनियमितताओं के गंभीर आरोपों का सामना कर रहे जिला शीघ्र हस्तक्षेप प्रबंधक (DEIM) सुभाष शुक्ला ने अपनी संविदा सेवा समाप्ति और 8.96 लाख रुपए की वसूली के आदेश को चुनौती देते हुए जबलपुर हाईकोर्ट का रुख किया था।

शुक्ला का मकसद साफ था अपनी नौकरी बचाना और वसूली की कार्रवाई पर रोक लगवाना। मामले की पृष्ठभूमि में पहले ही CAG ऑडिट, विभागीय जांच और NHM की सख्त कार्रवाई शामिल रही है।

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एक साथ हो रही थी वसूली और बर्खास्तगी की कार्रवाई

हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने यह मुद्दा उठाया कि विभाग ने सुभाष शुक्ला के खिलाफ दोहरी दंडात्मक कार्रवाई की है। एक ओर 8.96 लाख रुपए की वसूली का आदेश पारित किया गया, वहीं दूसरी ओर एचआर मैनुअल 2025 के तहत उनकी संविदा सेवा समाप्त करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई। इस दोहरी कार्रवाई को याचिका में असंवैधानिक और नियमों के खिलाफ बताया गया।

हाईकोर्ट ने बर्खास्तगी के आदेश पर लगाई रोक

जबलपुर हाईकोर्ट में मनिंदर एस. भट्टी की सिंगल बेंच ने 20 जनवरी 2026 को जारी सेवा समाप्ति आदेश के प्रभाव और संचालन पर अंतरिम रोक लगा दी। कोर्ट ने माना कि प्रथम दृष्टया याचिकाकर्ता की शिकायत पर विचार किया जाना आवश्यक है। अंतिम निर्णय से पहले सेवा समाप्ति जैसे कठोर कदम पर रोक उचित है, लेकिन इसके साथ ही जो शर्तें लगाई गई वह सुभाष शुक्ला के लिए मुसीबत बन गई।

वसूली पर राहत मिली, लेकिन शर्तों के साथ

हालांकि वसूली के मामले में कोर्ट ने पूरी राहत नहीं दी। हाईकोर्ट ने 8.96 लाख रुपए की वसूली पर सशर्त स्टे देते हुए स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता को कुल राशि का 50 प्रतिशत यानी 4,48,000 रुपए 15 दिनों के भीतर नेशनल हेल्थ मिशन के पास जमा करना होगा। कोर्ट का यह रुख साफ संकेत देता है कि प्रथम दृष्टया आर्थिक अनियमितता के आरोपों को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

15 दिनों की समयसीमा, नहीं भरे पैसे तो राहत खत्म

कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट ‘डिफॉल्ट क्लॉज’ भी जोड़ दिया है। यदि सुभाष शुक्ला तय 15 दिनों की अवधि में 4.48 लाख रुपए जमा करने में असफल रहते हैं, तो वसूली पर दिया गया स्टे स्वतः समाप्त हो जाएगा। यानी हाईकोर्ट से मिली राहत पूरी तरह याचिकाकर्ता की आर्थिक अनुपालना पर निर्भर कर दी गई है।

नियमों के उल्लंघन का दिया गया तर्क

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता अतुल कुमार जैन ने कोर्ट के समक्ष तर्क रखा कि NHM के एच.आर. मैनुअल 2025 की कंडिका 11.6.1 के अनुसार सेवा समाप्ति से पहले पृथक और विधिवत विभागीय जांच अनिवार्य थी। उनका कहना था कि बिना ऐसी जांच किए सीधे सेवा समाप्ति की कार्रवाई करना नियमों का उल्लंघन है, इसी आधार पर अंतरिम राहत मांगी गई।

जनहित याचिका का भी पड़ा असर

सुनवाई के दौरान एक महत्वपूर्ण मोड़ तब आया, जब इस मामले से संबंधित एक जनहित याचिका के आधार पर हस्तक्षेप आवेदन पेश किया गया। वरिष्ठ अधिवक्ता अमिताभ गुप्ता ने बताया कि बाल श्रवण योजना में कथित घोटाले को लेकर पहले से ही डिवीजन बेंच में जनहित याचिका लंबित है। यह याचिका शैलेंद्र बारी के द्वारा लगाई गई है और पूरी प्रशासनिक कार्रवाई उसी के चलते शुरू हुई थी। कोर्ट ने इस हस्तक्षेप को स्वीकार करते हुए उन्हें कार्यवाही में शामिल होने की अनुमति दे दी।

NHM को जवाब का समय, फरवरी में अगली सुनवाई

हाईकोर्ट ने नेशनल हेल्थ मिशन को चार सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। मामले की अगली सुनवाई 23 फरवरी 2026 से शुरू होने वाले सप्ताह में सूचीबद्ध की गई है, जहां अंतरिम आदेशों की आगे समीक्षा की जाएगी।

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राहत से ज्यादा बढ़ी चुनौती

कुल मिलाकर, सुभाष शुक्ला राहत पाने की उम्मीद में हाईकोर्ट पहुंचे थे। अदालत के आदेश के बाद उनकी मुश्किलें कम होने के बजाय नई चुनौती में बदल गई हैं। नौकरी पर फिलहाल संकट टल गया है, लेकिन अब 15 दिनों के भीतर 4.48 लाख रुपए जमा करना उनके लिए सबसे बड़ी परीक्षा बन गया है।

एक तरह से देखा जाए तो हाईकोर्ट से उन्हें राहत कम और और मुश्किल ज्यादा मिला है। क्योंकि जिस रकम को भरने से बचने के लिए वह यह सारी कवायत कर रहे थे उसका 50% अब उन्हें किसी भी हाल में 15 दिनों में जमा करना होगा।

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