सिस्टम के मजाक का करण बन गई जल सुनवाई, मोबाइल की टॉर्च से हो रही पानी की जांच

Amresh Kushwaha | Jan 21, 2026, 12:20 IST
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water quality investigation bhopal
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भोपाल में हुई जल सुनवाई ने प्रशासन की लापरवाही को सामने ला दिया है। पानी की गुणवत्ता की जांच मोबाइल टॉर्च से की गई। वहीं पानी की जांच करते वक्त यह भी सामने आया कि प्रशिक्षित कर्मचारियों की कमी है और जरूरी उपकरण भी नहीं थे।

News In Short

  • भोपाल में जल सुनवाई के दौरान पानी की जांच मोबाइल टॉर्च से की गई।
  • कर्मचारियों को केवल क्लोरीन जांच की ट्रेनिंग दी गई, अन्य जांच नहीं हुई।
  • आरोप है कि बिना वैज्ञानिक जांच के पानी की गुणवत्ता की गलत रिपोर्ट दी जा रही है।
  • विशेषज्ञ का कहना है कि अस्थाई कर्मचारियों से पानी की जांच कराना गलत है।
  • रिटायर्ड ईई ने प्रशिक्षित कर्मियों से जांच कराने की आवश्यकता जताई है।

News In Detail

इंदौर में दूषित पानी की वजह से कई मौतें हो चुकी हैं। इसके बाद मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने जल सुनवाई करने का आदेश दिया था। इसका मकसद पानी की गुणवत्ता की जांच करना और लोगों को साफ पानी देना था।

लेकिन, भोपाल में हुई जल सुनवाई के दौरान सिस्टम की लापरवाही साफ नजर आई। अब तो ये जल सुनवाई मजाक बनकर रह गई है।

मोबाइल की टॉर्च से की पानी की जांच

भोपाल के वार्ड 75, 68, 70 और 77 में जब एक न्यूज पेपर के रिपोर्टर्स ने जल सुनवाई का निरीक्षण किया, तो एक हैरान कर देने वाली सच्चाई सामने आई।

जल सुनवाई के दौरान कर्मचारियों के जरिए पानी की गुणवत्ता की जांच की जा रही थी, लेकिन हैरानी की बात ये थी कि ये जांच मोबाइल फोन की टॉर्च से की जा रही थी।

पानी में छोटे-छोटे कण देखकर कर्मचारी ने बिना कोई वैज्ञानिक जांच किए ही कह दिया कि पानी ठीक नहीं है। ये पूरी घटना इस बात का साफ सबूत है कि प्रशासन इस गंभीर समस्या को लेकर गंभीर नहीं है।

11 के निर्देश, लेकिन एक जांच की मिली ट्रेनिंग

इंदौर में दूषित पानी से हुई मौतों के बाद, सीएम ने 11 तरह की जांच करने का आदेश दिया था। लेकिन भोपाल में हर कर्मचारी सिर्फ एक ही जांच, यानी क्लोरीन टेस्ट करता नजर आया।

जब रिपोर्टर ने पूछा कि बाकी की जांच क्यों नहीं हो रही, तो कर्मचारियों ने बताया कि उन्हें सिर्फ क्लोरीन जांच की ट्रेनिंग दी गई है। इसके अलावा, रंग मिलाने और केमिकल डालने को लेकर भी कर्मचारियों को असमंजस था, जो वाकई चिंता की बात है।

बिना केमिकल की पानी की जांच

वार्ड 75 में जल सुनवाई के दौरान, रिपोर्टर ने नगर निगम के वार्ड ऑफिस में पानी की बोतल दी और जांच करने को कहा। कर्मचारी मोहन बोतल से पानी जार में डालकर मोबाइल फोन की टॉर्च नीचे रखकर देखने लगे। फिर उन्होंने कहा, "छोटे-छोटे कण दिख रहे हैं, पानी ठीक नहीं है।" बिना केमिकल डाले ही उन्होंने नतीजा दे दिया। जब रिपोर्टर ने केमिकल डालने की बात की, तो उन्होंने जवाब दिया, "मेरी किट दूसरा अफसर ले गया है।"

किताब से रंग मिलाकर बताया पानी में क्लोरीन

वार्ड 77 में जल सुनवाई के दौरान, कर्मचारी इरशाद सिद्दीकी पानी की बोतल लेते हैं। क्लोरीन जांच के लिए केमिकल डालते हैं। फिर वह एक किताब खोलकर उसमें दिए रंग से किट के रंग को मिलाने की कोशिश करते हैं। कुछ देर देखने के बाद वह कहते हैं- सर, यही वाला लग रहा है। हल्का पीला रंग दिखा तो बोले- पानी में क्लोरीन है।

अस्थाई कर्मचारी कर रहे पानी की जांच

रिटायर्ड ईई, पीएचई आर.बी. राय ने कहा कि पीने के पानी की जांच हमेशा Trained व्यक्ति को ही करनी चाहिए, जिसे पानी की गुणवत्ता और केमिकल के बारे में सही जानकारी हो। उन्होंने आगे कहा कि 29 दिन के अस्थाई कर्मचारियों को यह जिम्मेदारी देना एक बड़ी गलती है, क्योंकि यह सीधे लोगों की सेहत से जुड़ा मुद्दा है। इसके लिए केमिस्ट या कम से कम लैब असिस्टेंट की तैनाती जरूरी है।

Sootr Knowledge

जानें क्या है इंदौर का भागीरथपुरा कांड?

इंदौर के भागीरथपुरा इलाके में दिसंबर 2025 के आखिरी दिनों में दूषित पानी की वजह से एक बड़ा स्वास्थ्य संकट सामने आया। दरअसल, नर्मदा जल की पाइपलाइन में सीवेज और ड्रेनेज लाइन का पानी मिल गया था।

इससे फीकल कोलिफॉर्म और ई-कोलाई जैसे खतरनाक बैक्टीरिया फैल गए। इसके अलावा, इलाके के बोरवेल का गंदा पानी नर्मदा की पाइपलाइन में घुसकर पीने के पानी को जहरीला बना रहा था।

इस वजह से उल्टी और दस्त जैसी बीमारियां फैल गईं, और 3500 से ज्यादा लोग इससे प्रभावित हुए। इसे भागीरथपुरा में दूषित पानी की घटना के मुख्य कारण के तौर पर बताया जा रहा है।

भागीरथपुरा में अभी तक 34631 घरों का सर्वे किया है। अब तक 25 लोगों की मौत हो चुकी है, जिनमें बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग शामिल हैं। एक 6 महीने का बच्चा भी इस संकट का शिकार हो गया।

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