अक्षय तृतीया पर धणी अनुष्ठान से तय होगा भविष्य का मिजाज, पता लगेगा कि अकाल रहेगा या सुकाल

Mukesh Sharma | Apr 17, 2026, 15:05 IST
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Ashish Bhardwaj (37)
Photograph: (the sootr)

राजस्थान के जोधपुर में अक्षय तृतीया पर घांची समाज का होने होने वाला धणी अनुष्ठान मारवाड़ की अनूठी सांस्कृतिक विरासत है। अबोध बालकों और प्राचीन मंत्रोच्चार के माध्यम से आने वाले वर्ष के मानसून, फसल की पैदावार और राजनीतिक स्थिरता की भविष्यवाणी की जाती है।

News In Short

  • अक्षय तृतीया पर 19 अप्रैल को जोधपुर में 'धणी' परंपरा से तय होगा भविष्य।
  • घांची समाज की 890 साल पुरानी है यह परंपरा, लोगों का इस पर विश्वास।
  • आयोजन जोधपुर के बाईजी का तालाब स्थित घांची समाज की बगीची में होगा।
  • यज्ञ वेदी के पास दो खंभ लगाए जाते हैं, जो देते हैं आगे के लिए संकेत।

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एक ओर आधुनिक विज्ञान सुपर कंप्यूटर और सैटेलाइट के ज़रिए बादलों की आवाजाही भांप रहा है। वहीं, राजस्थान की धरती पर आज भी आस्था का मौसम विज्ञान पूरी सटीकता के साथ भविष्य की इबारत लिख रहा है।

जोधपुर के घांची समाज की 890 साल पुरानी धणी परंपरा मात्र सामान्य अनुष्ठान नहीं है। इस पर मारवाड़ के जनमानस का अटूट विश्वास है। यह अनुष्ठान सदियों से अकाल-सुकाल और सत्ता के गलियारों में होने वाली हलचल का पूर्वाभास देता आया है।

19 अप्रेल को अक्षय तृतीया के दिन होने वाला यह आयोजन एक बार फिर तय करेगा कि आने वाले साल में बादलों की मेहरबानी कैसी होगी और देश की राजनीति किस करवट बैठेगी।

धणी अनुष्ठान की विधि

परंपरा के अनुसार यज्ञ वेदी के पास दो खंभ लगाए जाते हैं। दो अबोध बालकों को मंत्रोच्चार के साथ पवित्र कर उनके हाथ में बांस की दो पट्टिकाएं दी जाती हैं। एक पट्टिका पर कुमकुम (सुकाल का संकेत) और दूसरी पर काजल (अकाल का संकेत) लगाया जाता है।

बताया जाता है कि मंत्रोचार के साथ दोनों पट्टिकाएं स्वतः ऊपर-नीचे हिलने लगती हैं। खंभ पर बबूल का कांटा लगाया जाता है। यदि कुमकुम लगी पट्टी कांटे को छू ले तो वर्षा और शांति का संकेत माना जाता है। यदि काजल लगी पट्टी कांटे को तोड़े तो विपदाओं, आपदाओं और राजनीतिक संकट की आशंका मानी जाती है। हालांकि समाज के बुजुर्ग संकेतों के आधार पर अनुमान लगाते हैं और भविष्यवाणी करते है।

890 साल का इतिहास

घांची समाज से जुड़े लोग बताते हैं कि यह परंपरा सदियों से मारवाड़ की लोक संस्कृति का हिस्सा रही है। इसकी प्रक्रिया जितनी अनूठी है उतनी ही रोमांचक भी है। घांची समाज के अनुसार यह परंपरा समाज की स्थापना के समय से यानी लगभग नौ शताब्दियों से निरंतर चल रही है।

आधुनिक विज्ञान के युग में मारवाड़ के लोग आज भी इस प्राचीन पद्धति पर भरोसा करते हैं और इसे अक्सर सटीक पाते हैं। यह आयोजन जोधपुर के बाईजी का तालाब स्थित घांची समाज की बगीची में किया जाता है। इस वर्ष भी 19 अप्रैल अक्षय तृतीया को यह आयोजन होने जा रहा है। इसमें अगले एक वर्ष के भविष्य की तस्वीर साफ होगी।

अकाल-सुकाल का अनुमान

मई 2024 में अच्छी बारिश और सुकाल के संकेत मिले थे। मानसून के दौरान राजस्थान के कई हिस्सों में सामान्य से अधिक बारिश हुई और बांध लबालब भर गए थे।

कुछ साल पहले जब धणी में अकाल का संकेत मिला था। तब न केवल बारिश कम हुई थी बल्कि मारवाड़ के किसानों को टिड्डी दल के हमले का भी सामना करना पड़ा था और फसलों को भारी नुकसान हुआ था।

फसलों का पूर्वानुमान

धणी में रखे गए 7 अनाजों में से जिस अनाज पर बालक का हाथ पहले जाता है, उस वर्ष उस फसल की पैदावार अच्छी होती है। स्थानीय किसानों के अनुसार मूंग और बाजरे को लेकर की गई भविष्यवाणियां अक्सर सटीक निकलती हैं।

राजनीतिक और वैश्विक घटनाएं

यह परंपरा केवल बारिश तक सीमित नहीं है, बल्कि देश-दुनिया की बड़ी घटनाओं के प्रति भी आगाह करती है। अप्रैल 2025 की भविष्यवाणी में सीमा पर तनाव और युद्ध जैसी स्थिति के संकेत दिए गए थे। इसके साथ ही राजनीतिक उथल-पुथल की बात भी कही गई थी। मारवाड़ के बुजुर्गों का मानना है कि जब भी धणी में बालक विचलित या रोता हुआ दिखा है तो देश या प्रदेश की सत्ता में बड़े उलटफेर देखे गए हैं।

धणी परंपरा

जोधपुर के राजेंद्र भाटी कहते हैं कि यह प्रथा बहुत पुरानी है। इसमें एक धार्मिक अनुष्ठान होता है। इस प्रकिया में समाज के बुजुर्ग और जानकार कुछ संकेत के आधार पर अगले साल की राजनीति और काल सुकाल के साथ ही बीमारियों का कयास लगाते हैं। अभी तक करीब 80-90 फीसदी कयास सही निकले हैं। इनमें कोरोना को लेकर लगाए गए कयास भी सही निकले थे।

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